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सोशल मीडिया जरा बचके

Posted On June - 24 - 2019

रेशू वर्मा
कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें एक महिला उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को शादी का प्रस्ताव भेजने की बात कर रही थी। इस वीडियो को एक स्वतंत्र पत्रकार प्रशांत कनौजिया ने अपने ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट करते हुए योगी आदित्यनाथ का नाम लेते हुए लिखा, ‘इश्क छुपता नहीं छुपाने से।’ इसे मानहानि मानते हुए इसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करायी गयी और प्रशांत कनौजिया को गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि, सुप्रीमकोर्ट ने प्रशांत कनौजिया को राहत दे दी थी। सुप्रीमकोर्ट ने यह माना कि इस मसले पर गिरफ्तारी उचित नहीं है।
कुछ इसी तरह का मामला लोकसभा चुनाव के समय देखने को मिला, जब भारतीय जनता पार्टी की कार्यकर्ता प्रियंका शर्मा ने प्रियंका चोपड़ा के एक फोटो पर आधारित ममता बनर्जी का मीम यानी मनोरंजक फोटो बनाकर अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर पोस्ट कर दिया। प्रियंका शर्मा को गिरफ्तार कर लिया गया था। हालांकि, प्रियंका को भी सुप्रीमकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद छोड़ दिया गया था। हाल के इन दोनों मामलों में विवादों की जड़ सोशल मीडिया रहा। ऐसा क्या है कि सोशल मीडिया विवादों की जन्म-स्थली हो गया है? इसकी एक वजह यह है कि सोशल मीडिया लगभग बंधन मुक्त मीडिया है। यहां एक खास किस्म की आजादी है, जो इस मीडिया के यूजर्स को स्वच्छंद और कई बार गैर जिम्मेदारी की सीमा तक स्वच्छंद होने की सुविधा दे देती है।
खैर इस तरह की गिरफ्तारियां न तो पहली है और न ही आखिरी, लेकिन इस तरह की गिरफ्तारी इस बहस को आगे ले जाती है कि आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है क्या? और यह स्वतंत्रता कब किसी और के अधिकारों का हनन करने लगती हैं? संचार के अन्य माध्यमों में, फिर चाहे वह प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, कई स्तर के फिल्टर होते हैं। जैसे मुख्य धारा के किसी भी अखबार में कोई भी रिपोर्ट सीधे छपने के लिए नहीं जाती। उसकी एक या दो स्तर पर पड़ताल होती है कि क्या यह रिपोर्ट तथ्य के स्तर, मर्यादा के स्तर, भाषा के स्तर पर छापी जाने योग्य है या नहीं। मुख्यधारा के माध्यम जैसे अखबार या टीवी तमाम तरह के नियम कानूनों और कई आत्म-अनुशासन से बंधे होते हैं। वहीं, दूसरी ओर सोशल मीडिया एक ऐसा माध्यम है, जहां इस तरह की बहु-स्तरीय पड़ताल की व्यवस्था नहीं है। एक अर्थ में कोई भी अपने सोशल मीडिया अकाउंट (फेसबुक और ट्विटर) पर कुछ भी मनमानी बात कर सकता है, चाहे इसके परिणाम बाद में गिरफ्तारी या झगड़े की शक्ल में ही क्यों न निकलें। आशय यह है कि मुख्यधारा के मीडिया में तो कोई आपत्तिजनक बात छपेगी नहीं, लेकिन सोशल मीडिया पर छपना संभव है। बाद में उस पर विवाद भले ही उठता रहे। अखबार और टीवी चैनल में संपादक होता है। सोशल मीडिया में बंदा खुद ही रिपोर्टर, खुद ही संपादक है, इसलिए कई बार सोशल मीडिया पर मनमाने तरीके से सामग्री छपने के मामले सामने आते हैं। फेसबुक, ट्विटर पर जिसका जो मन आये, छाप सकता है। बाद में उस पर हल्ला हंगामा मचता है तो फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल उठने लगते हैं।
सवाल यह है कि जब अभिव्यक्ति की आजादी है, तो किसी को भी सोशल मीडिया पर कुछ भी कहने से क्यों रोका जाना चाहिए? यहां समझने की बात यह है कि कुछ भी छापने का हक तो मुख्य धारा के अखबारों और टीवी चैनलों को भी नहीं है। कोई बात अगर सत्य से परे है तो उसे नहीं छापा जा सकता है। कोई बात अगर किसी की मानहानि करती है तो उसे नहीं छापा जा सकता है। समझने की बात यह है कि क्या छापा जाये, या क्या न छापा जाये। यह तय करने का अधिकार एक तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संचालित होता है और दूसरी इस अधिकार पर बंदिशें भी लगती हैं-देश-काल के कानून से और आत्म-अनुशासन से। हर बात को कानून परिभाषित नहीं कर सकता, इसलिए कई बार अखबारों को टीवी चैनलों पर अपनी समझ से फैसले करने पड़ते हैं कि क्या छापा जाये, या क्या नहीं छापा जाये। ऐसे नीर क्षीर विवेक लिए पढ़ाई लिखाई, परिपक्वता की जरूरत होती है, जो मीडियाकर्मी बरसों के तजुर्बे के बाद अर्जित करते हैं। सोशल मीडिया की दिक्कत यह है कि उसने हरेक को मीडियाकर्मी बना दिया है कि जो मन करे छाप लो, पब्लिक तक पहुंचा दो। लेकिन मीडियाकर्मी को किन सावधानियों का पालन करना है, इसका ज्ञान हरेक सोशल मीडिया यूजर तक नहीं पहुंचा है। इसलिए इस तरह की दिक्कतें आ रही हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में क्या करने की छूट मिलनी चाहिए, यह सवाल लोकतंत्र में बहुत महत्वपूर्ण है और इसका जवाब हर अदालत अपने हिसाब से अलग-अलग दे सकती है। प्रियंका शर्मा के ममता बनर्जी पर बनाए मीम को लेकर भी ऐसा ही हुआ था। एक पक्ष इसे अपमानजनक करार दे रहा था तो दूसरा पक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मान रहा था। यह तय करना अदालत का काम है कि उस काम को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माने या अपमान करने की कोशिश।
प्रियंका शर्मा और प्रशांत कनौजिया के मामले में अदालत ने ममता बनर्जी पर बने मीम और योगी से जुड़े ट्वीट को स्वीकृति नहीं दी। यह नहीं कहा कि यह सब ठीक है। अदालत के आदेशों का आशय यह था कि इस तरह के काम के बावजूद व्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार बड़ा और महत्वपूर्ण अधिकार है। उसकी अवहेलना करके संबंधित व्यक्ति को जेल में नहीं डाला जा सकता। प्रकारांतर से कोर्ट यह कहना चाह रहा था कि सरकारों को, नेताओं को कुछ संयम का परिचय देना चाहिए। सीधे गिरफ्तारी पर नहीं उतरना चाहिए। लगभग हर महत्वपूर्ण अखबार या टीवी चैनल इस तरह के कानूनी मामलों का सामना करते हैं, जिनमें एक पक्ष उनकी रिपोर्ट को मानहानि बता रहा होता है। गौर करने वाली बात यह है कि अब इस तरह के मामले सोशल मीडिया से जुड़ी सामग्री को लेकर भी उठ रहे हैं। यूं सोशल मीडिया के एक महत्वपूर्ण प्लेटफार्म फेसबुक ने यह सहूलियत दी है कि अगर किसी को कोई कंटेंट आपत्तिजनक लगता है तो उस पर आपत्ति दर्ज करायी जा सकती है। अगर फेसबुक को वह आपत्ति सही लगी तो फेसबुक उस कंटेंट को ब्लॉक कर देगा। सोशल मीडिया और इंटरनेट को लेकर अभी देश में कानून और नियमों की कमी है, लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं कि हमारे यहां क़ानून हैं ही नहीं या उनका प्रयोग नहीं होता है। ऑनलाइन मसलों पर सबसे महत्वपूर्ण कानून सूचना प्रौद्योगिकी कानून वर्ष 2000 में आया था। इसके अलावा, दूसरे कानून भी इस तरह के मामलों में लागू होते हैं।
सियासी दलों का ट्रैक रिकार्ड
इन सारे मामलों से एक बात साफ होती है कि लगभग हर राजनीतिक दल ने अपने नेताओं के खिलाफ हुई किसी सोशल मीडिया पोस्ट के प्रति नकारात्मक रवैया दिखाया। यानी अगर वामपंथी दल इस बात की शिकायत करते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी या यूपी के मुख्यमंत्री योगी असहिष्णु हैं तो यह बात भी साफ है कि वामपंथी दलों का अपना ट्रैक रिकार्ड भी उदारता का नहीं रहा है। केरल के वामपंथी शासन में लगातार कई गिरफ्तारियां उन लोगों की हुई हैं, जिनकी सोशल मीडिया पोस्ट वामपंथी सरकार को रास नहीं आयीं। वामपंथी सरकारों के तानाशाही रवैये की आलोचना करने और पीएम नरेंद्र मोदी को गैर-लोकतांत्रिक बताने वाली ममता बनर्जी अपने खिलाफ किसी कार्टून या मीम को बर्दाश्त नहीं करतीं। ऐसा करने वालों को जेल में पहुंचाकर ही दम लेती हैं। तो कुल मिलाकर हर राजनीतिक दल को सिर्फ सकारात्मक सुनना ही अच्छा लगता है। सत्ता का चरित्र ही ऐसा होता है, ऐसा माना जा सकता है। लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करने वालों को यह पता होना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने आप में कई बंदिशें और दायित्व लेकर आती है। मीडिया, सोशल मीडिया में कुछ भी लिखने पढ़ने वाले को कानून की न्यूनतम जानकारी होनी ही चाहिए। यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपनी जगह है, लेकिन इसकी आड़ में तमाम ऐसे काम नहीं किये जा सकते, जो गैर कानूनी हैं। अब कोई कृत्य राजद्रोह है या अश्लीलता फैलाने का है या नहीं, यह तो अदालत ही तय कर सकती है। लेकिन सोशल मीडिया के यूजर्स को एक हद तक आत्मनियंत्रण का भी पालन करना चाहिए। भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन साथ ही संविधान और कानून यह भी सुनिश्चित करते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी अन्य व्यक्ति कि मानहानि न हो जाये। मानहानि का मोटा-मोटा आशय यही है कि किसी के मान-सम्मान पर चोट के लिए आधारहीन बात को बोलना, लिखना या किसी अन्य तरीके से व्यक्त करना। लेकिन इस बारे मे अंतिम फैसला अदालत का होता है। अदालत तक बात न जाये तो ही अच्छा है। इसके लिए 2 बातें जरूरी हैं- एक ताकतवर लोग खास कर राजनेता थोड़ी उदारता का परिचय दें और दूसरी, सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले खुद को ज्ञान, समझ और अनुशासन से परिपूर्ण करें। सोशल मीडिया ने आम आदमी को अपनी बात करने का जरिया दिया है, जो मुक्त है। लेकिन यही मुक्ति कई बार ऐसी स्वच्छंदता में बदल जाती है, जो किसी न किसी कानून के खिलाफ चली जाती है। तब अदालत की भूमिका आती है।
सोशल मीडिया और कानून
मीडिया और सोशल मीडिया पर लिखने-पढ़ने वाले हर व्यक्ति को देश के कानून के बारे में कुछ न्यूनतम ज्ञान तो रखना ही चाहिए जैसे-दंड विधियों की सर्वोच्च विधि भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी में भी प्रावधान हैं, जो ऑनलाइन और ऑफलाइन सभी तरह के अपराधों पर बराबर प्रभावी हैं।
राजद्रोह (124 ए) : अगर किसी कंटेंट में देश के खिलाफ बात हो। देश की एकता और अखंडता को चोट पहुंचाई गई हो। देश की संप्रभुता को चुनौती देने वाली बातें लिखी गई हों तो आईपीसी की धारा 124 ए के तहत मुकदमा दायर हो सकता है।
किसी संप्रदाय के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन (धारा 153 ए) : अगर किसी इलाके विशेष या संप्रदाय विशेष के लोगों के खिलाफ द्वेष से भरी बातें लिखी गई हों यानी किसी इलाके विशेष के लोगों पर रंग और जात-पात के नाम पर ताना दिया जाए तो आईपीसी की धारा 153 ए के तहत मुकदमा हो सकता है।
आपत्तिजनक भाषा (धारा 294) : कोई शख्स सोशल साइट या नेट के जरिये किसी के लिए आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करता है, अश्लीलता फैलाता है, अश्लील भाषा का इस्तेमाल करता है, गालियां देता है, कोई ऐसी बात करता है, जिससे किसी को पीड़ा पहुंची हो तो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 294 लगाई जा सकती है।
धार्मिक भावनाएं भड़काना (295ए) : अगर कोई शख्स जानबूझकर किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाता है। किसी धर्म के बारे में आपत्तिजनक बातें लिखता है। धार्मिक चिन्हों का अपमान करता है तो आईपीसी की धारा 295 ए के तहत मुकदमा दर्ज हो सकता है।
मानहानि (धारा 499 और 500) : अगर कंटेंट में किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ मानहानि से संबंधित बातें हों यानी किसी शख्स को कोई गाली दे या ऐसी बात करें, जिससे उसके मान-सम्मान को ठेस पहुंची हो तो आईपीसी की धारा 499 और 500 के तहत कार्रवाई हो सकती है।
अफवाह फैलाना (धारा 505) : ऐसा कंटेंट लिखना, जिससे जानबूझकर अफवाह फैलाने की कोशिश की गई हो, आईपीसी की धारा 505 के तहत अपराध है।
जान से मारने की धमकी (धारा 506) : ऐसे कंटेंट, जिसमें किसी को जान से मारने की धमकी दी जा रही हो तो आईपीसी की धारा 506 के तहत केस दर्ज हो सकता है।
इन मामलों में हुआ बवाल
कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी
कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को सितंबर 2013 में गिरफ्तार किया गया था, असीम पर आरोप था कि उन्होंने राष्ट्रीय चिन्हों का मजाक बनाया। असीम के कार्टून में संसद को टॉयलेट की तरह और अशोक की लाट में शेर की जगह भेड़िये दिखाए गये थे।
पालघर की लड़कियां
नवंबर 2012 पालघर में रहने वाली 2 लड़कियों में से एक ने पोस्ट डाली थी और दूसरी ने उसे लाइक किया था। यह पोस्ट बाल ठाकरे के निधन पर शिवसेना द्वारा बंद का आह्वान करने पर सवाल उठाती थी। इन लड़कियों पर धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में आईपीसी की धारा 295 ए और आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था।
अंबिकेश महापात्र और सुब्रत सेनगुप्ता
अप्रैल 2012 जादवपुर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा और सुब्रत सेनगुप्ता को पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के कार्टून को सर्कुलेट करने पर गिरफ्तार कर लिया गया था। यह कार्टून ममता द्वारा उस वक्त के रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को हटाने को लेकर बनाया गया था।
एयर इंडिया के कर्मचारी
मई 2012 एयर इंडिया के क्रूमेंबर्स मयंक मोहन शर्मा और केवीजे राव को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अन्य नेताओं पर अपमानजनक पोस्ट शेयर करने के लिए गिरफ्तार किया गया था। दोनों पर तिरंगे के अपमान का आरोप भी लगा था।
किश्तवाड़ के युवक
अक्तूबर 2012 किश्तवाड़ के 3 युवकों को गिरफ्तार कर 40 दिन के लिए जेल भेजा गया था, क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर ईशनिंदा का विवादित वीडियो फेसबुक पर अपलोड किया था।
रवि श्रीनिवासन
अक्तूबर 2012 बिजनसमैन रवि श्रीनिवासन को ट्विटर पर पी चिदंबरम के बेटे के खिलाफ आपत्तिजनक मैसेज लिखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
स्कूल छात्र
मार्च 2015 बरेली में 11वीं में पढ़ने वाले एक छात्र को यूपी के शहरी विकास मंत्री आजम खान के खिलाफ ‘आपत्तिजनक’ पोस्ट डालने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।


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