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वोट राजनीति का अर्थशास्त्र

Posted On June - 17 - 2019

संदीप जोशी

आलोक पुराणिक
मेट्रो में और दिल्ली की डीटीसी बसों में महिलाएं मुफ्त यात्रा करेंगी, ऐसी घोषणा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले की है। अरविंद केजरीवाल राजनीति में भ्रष्टाचार मिटाने आये थे। भ्रष्ट राजनेताओं को निपटाने आये थे। दिल्ली की जनता ने उनके भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को जमकर समर्थन दिया था और प्रचंड बहुमत के साथ केजरीवाल चुने गये थे। पर दूसरे कार्यकाल के खत्म होने के ठीक पहले वह अपनी राजनीतिक जिंदगी का पुनरोद्धार उन स्कीमों में तलाश रहे हैं, जो आम तौर पर मुफ्तखोरी की स्कीमें कही जाती हैं। जिनसे मुफ्तखोरी की संस्कृति मजबूत होती है और जिनसे सरकारी खजाने पर अलग तरह से बोझ पड़ता है। मेट्रो परियोजना की शुरुआत करने वाले मेट्रोमैन श्रीधरन ने इस तरह की मुफ्तखोरी की स्कीम को नामंजूर करते हुए प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखी है, जिसका आशय यह है कि केजरीवाल अगर महिलाओं को मुफ्त यात्रा कराना चाहते हैं तो इसके लिए जरूरी रकम वह महिलाओं को दे दें। मेट्रो को मुफ्तखोरी का केंद्र न बनाया जाये। केजरीवाल अकेले ऐसे राजनेता नहीं हैं, केजरीवाल पहले ऐसे राजनेता नहीं हैं, जो मुफ्तखोरी को राजनीतिक हथियार के तौर पर प्रयुक्त कर रहे हैं। उनसे पहले भाजपा, कांग्रेस, वामदलों समेत लगभग हर राजनीतिक दल ने मुफ्तखोरी को अपना राजनीतिक हथियार बनाया है और अकसर कामयाब राजनीतिक हथियार के तौर पर मुफ्तखोरी को इस्तेमाल किया है।
केजरीवाल की योजना के मुताबिक, दिल्ली में महिलाओं की मुफ्त बस यात्रा और मेट्रो यात्रा से महिलाओं की सुरक्षा की बेहतरी होगी। इस घोषणा के बाद उन्होंने दिल्ली के आटो रिक्शा की दर भी करीब 18 प्रतिशत बढ़ाने की घोषणा की, लेकिन मुफ्तखोरी के असर क्या होते हैं, यह जानने के लिए आटो रिक्शा दर की बढ़ोतरी के असर को समझा जा सकता है। अगर दिल्ली की आधी आबादी को मुफ्त का ट्रांसपोर्ट मेट्रो या डीटीसी बसों की शक्ल में उपलब्ध है, तो फिर आटो में जाने वाले यात्रियों की तादाद में कमी स्वाभाविक है। ऐसी सूरत में अगर आटो की दर बढ़ भी जाये और ग्राहक नहीं हैं, तो आखिर में क्या होगा। आखिर में यही होगा कि बाजार के नियम काम करेंगे, मांग और पूर्ति के नियम काम करेंगे। बढ़ी हुई दरें निरर्थक रहेंगी। दिल्ली में न्यूनतम वेतन करीब 14000 रुपये है, पर ऐसी खबरें आती हैं कि सीवर में बिना आवश्यक सुरक्षा इंतजामों के भी घुसकर काम करने को तैयार, यानी लगभग मरने को तैयार मजदूर 7-8 हजार रुपये महीने में मिल जाते हैं, क्यों? घोषणाएं चाहे जो भी हो जायें, आखिर में मांग और आपूर्ति के नियम चलते हैं। यानी 14 हजार कागज पर हैं, कोई देने वाला नहीं है, क्योंकि 7000 रुपये महीने में काम करने वाले इफरात में उपलब्ध हैं। इसलिए घोषणाओं से चुनाव जीते जाते हैं, लेकिन उससे बुनियादी अर्थशास्त्र नहीं बदलता। इसी ओर मेट्रो मैन श्रीधरन इशारा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब पहली बार मेट्रो शुरू हुई थी तो उन्होंने साफ कर दिया था कि किसी को भी मेट्रो में कोई रियायत नहीं दी जायेगी। यह इसलिए किया गया था कि ऐसा करके राजस्व को अधिकतम किया जा सकता है और मेट्रो किरायों को न्यूनतम रखा सकता है। श्रीधरन का तर्क है कि अगर दिल्ली में मेट्रो को महिलाओं के लिए मुफ्त किया जायेगा, तो दूसरे शहरों में भी ऐसी मांग उठेगी। दिल्ली में मुफ्त मेट्रो पर करीब 1000 करोड़ रुपये की लागत आयेगी, यह लागत आने वाले वक्त में बढ़ेगी ही।
मुफ्तखोरी प्रतिस्पर्धी होती है। अगर स्त्रियों को मुफ्त है, तो छात्रों ने क्या गुनाह किया है, उन्हें भी मुफ्त होनी चाहिए। और छात्रों को जब मुफ्त दे रहे हैं, तो 25000 रुपये प्रतिमाह से कम के वेतन वाले का भी हक बनता है दिल्ली में मुफ्त यात्रा का। ऐसी सूरत में कुल मिलाकर होता यह है कि किसी का भला हो या न हो, पर योजना बैठ जाती है। डीटीसी की स्थिति देखी जा सकती है, विकट घाटे में चल रही है। कोर्ट के आदेश हैं कि दिल्ली में 11000 बसें होनी चाहिए, लेकिन सिर्फ 5400 बसें हैं। बसें लगातार कम हुई हैं। डीटीसी के पास फंड नहीं है बस खरीदने के लिए। कुल मिलाकर मुफ्तखोरी की आखिरी स्थिति में होता यह है कि मुफ्त का खाना खिलाने में सबको मुफ्त-भोज में आमंत्रित कर लिया जाये, बस छोटी सी दिक्कत यह रह जाती है कि खाना है ही नहीं। जब आ जायेगा, जब इंतजाम हो जायेगा, तब मुफ्त दे दिया जायेगा। 11000 बसें हैं ही नहीं, कम हो रही हैं, फंड हैं नहीं, और कम हो जायेंगी। बसें नहीं हैं, पर मुफ्त हैं, जितनी हैं, उसी को मुफ्त ले लिया जाये। राजनेता बहुत होशियारी से पब्लिक को बेवकूफ बना जाते हैं। वादा है कि जब होगा, तब दे देंगे। दिल्ली में अगर मुफ्त यात्रा किसी वर्ग को मंजूर की जाती है, तो फिर यह भी संभव है कि सुबह वह वर्ग चढ़े मेट्रो में और शाम तक मेट्रो के एयरकंडीशंड वातावरण में घूमता ही रहे। उसे कानूनन उतारा नहीं जा सकता। मुफ्तखोरी का अर्थशास्त्र कई बार बहुत बेतुका हो जाता है। एक लाख रुपये प्रतिमाह कमाने वाली स्त्री भी मुफ्तखोरी की हकदार है, पर दस हजार कमाने वाला मजदूर इस मुफ्तखोरी का हकदार नहीं है। जिसे जरूरत है वहां तक वह सहायता नहीं पहुंच पायेगी, लेकिन पर महिलाओं के मुफ्त मेट्रो-बस बहुत चुस्त राजनीतिक नारा है।
बिना कुछ किये आय
अकेले केजरीवाल नहीं हैं इस तरह की राजनीतिक चुस्ती दिखाने वाले। लगभग हर राजनीतिक दल ने ऐसी चुस्ती दिखायी है। भारत में खेती किसानी की जो स्थिति है, उसे देखते हुए होना तो यह चाहिए कि किसान को उसकी उपज का लाभदायक मूल्य दिया जाये। पर तमाम वजहों से यह हो पाना संभव नहीं होता। बिचौलियों की बाजार पर पकड़ मजबूत है। आलू के चिप्स बनानेवाली कंपनियों के शेयरधारी मालामाल होते जाते हैं, पर आलू उगाने वाले कंगाल होते जाते हैं, वो लागत भी नहीं वसूल पाते। डूबते जाते हैं। तो उन स्थितियों को बदला जाये, जिनकी वजह से किसान को अपने आइटम लागत से भी कम कीमत में बेचने पड़ते हैं, लेकिन इन स्थितियों को बदलना मुश्किल काम है। आसान काम यह है कि कुछ रकम थमा दी जाये किसानों को। किसान सम्मान निधि ऐसी ही एक स्कीम थी और अब यह ज्यादा व्यापक तौर पर लागू कर दी गयी है।
2019-20 के अंतरिम बजट में छोटे और सीमान्त किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की घोषणा की गयी थी। इस योजना का लाभ 2 हेक्टेयर तक जोत वाले किसानों को मिलना था। योजना के तहत 6 हजार रुपये छोटे किसानों के खातों में 3 किस्तों में डाले जाएंगे। मोदी के नेतृत्व में दूसरी बार बनी राजग सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना का दायरा बढ़ा दिया है। आय सहायता योजना की शुरुआत लोकसभा चुनाव से ठीक पहले की गयी थी। इसमें सभी 14.5 करोड़ किसानों को उनके जोत के आकार पर गौर किये बिना सहायता राशि दी जायेगी। कुल 87 हजार करोड़ रुपये की इस योजना के तहत वर्ष के दौरान 3 समान किस्तों में किसानों के खाते में कुल 6 हजार रुपए का समय पर अंतरण किया जाएगा। 87 हजार करोड़ रुपये प्रति साल खर्च करके सरकार अगर खेती-किसानी की समस्याओं को निपटाने की कोशिश कर रही है, तो यह एक किस्म से अव्यावहारिक है। खेती-किसानी की समस्याओं को बुनियादी तौर पर दूर करना, खेती को बाजारोन्मुख बनाना उसके लिए सही बाजार उपलब्ध कराना ही सही रास्ता है। कई बार मुफ्तखोरी इतनी लोकप्रिय हो जाती है कि समस्याओं के सार्थक हलों की तलाश खत्म हो जाती है। लेकिन किसान सम्मान निधि को तो मोटे तौर पर ऐसी स्कीम के तौर पर चिन्हित किया जा सकता है, जिसमें अस्तित्व के संकट से जूझते एक विपन्न वर्ग को राहत देने की कोशिश है। लेकिन एक लाख रुपये प्रति माह अर्जित करने वाली महिला मेट्रो यात्री को मुफ्तखोरी कराने का प्रस्ताव मूलत राजनीतिक चतुराई है।
न्याय योजना
भाजपा की किसान सम्मान निधि के जवाब में कांग्रेस ने न्याय योजना का दाव फेंका था। राहुल गांधी गरीबी हटाओ-2 के तहत पांच करोड़ गरीब परिवारों को सालाना 72 हजार रुपये देने का वादा लेकर सामने आये थे। मोटा-मोटा अनुमान यह था कि इस योजना में हर साल करीब तीन लाख 60 हजार करोड़ रुपये का खर्च होगा। 3 लाख 60 हजार करोड़ की रकम कितनी बड़ी है, इसका अंदाज यूं लगाया जा सकता है कि जीएसटी संग्रह के करीब तीन महीने के कुल संग्रह से भी ज्यादा यह रकम बनती है। यानी इस रकम को जुटाना आसान नहीं है। वादा चाहे जो कर दिया जाये, वादों में शब्द जाते हैं, लेकिन वादों के क्रियान्वयन में राशि जाती है। राशि हवा से नहीं आती। राशि करों से आती हैं, जिनको बढ़ाये जाने की सीमा है। एक हद तक जनता भी इस तरह के राजनीतिक वादों को समझने लगी है कि इस तरह के वादों के क्रियान्वयन आसान नहीं है। 6 हजार रुपये महीने को हासिल करने के न्याय के वादे को जनता ने राजनीतिक तौर पर खारिज किया। यानी मुफ्तखोरी की राजनीति की सीमाएं भी लगातार साफ हो रही हैं, लेकिन राजनेता बहुत रचनात्मक लोग होते हैं। वे फिर किसी नये आइडिया के साथ आ सकते हैं। मुफ्तखोरी राजनीतिक विमर्श से जाने वाली नहीं है, क्योंकि तमाम राजनीतिक दलों को वोट हासिल करने हैं। उसकी मुफ्तखोरी के मुकाबले मैं किस किस्म की नयी मुफ्तखोरी ला सकूं, यह चिंता ही मूल राजनीतिक चिंता है। केजरीवाल अकेले नहीं हैं, मुफ्तखोरी के राजनीतिक लाभांश सभी ने खाये हैं और सभी खाने की इच्छा रखते हैं।
वोटर भी हुए समझदार
सरकारें कहीं से कुछ नहीं कमातीं, सब जनता का कर होता है। एक की जेब से लेकर दूसरे की जेब में डालने की कला ही राजनीतिक चातुर्य है। दिल्ली की जनता दिल्ली सरकार को कर देती है, उस कर से मेट्रो में महिलाओं की यात्रा मुफ्त होगी, जिसका फायदा गाजियाबाद उत्तर प्रदेश की महिलाएं भी उठायेंगी और हरियाणा के गुरुग्राम की महिलाएं भी उठायेंगी, क्योंकि मेट्रो एनसीआर के ऐसे इलाकों में चलती है, जिनमें हरियाणा और यूपी के हिस्से भी शामिल हैं।
केंद्र सरकार को भी जो कर मिलता है, उनका एक बड़ा हिस्सा मुफ्तखोरी की स्कीमों में जा रहा है। कर कौन दे रहा है और स्कीमें जा कहां रही हैं, इसकी अलग राजनीति है। राहुल गांधी की न्याय स्कीम के लिए रकम कहां से जुटायी जायेगी, इस सवाल के जवाब में कांग्रेस के एक रणनीतिकार ने जो जवाब दिया, उसका आशय था कि देश का मध्यवर्ग बहुत लालची और स्वार्थी किस्म का है उससे संसाधन जुटाये जायेंगे। पीएम मोदी इस बात को ले उड़े तमाम चुनावी सभाओं में वह कहते दिखे-कि देश का मध्यवर्ग बहुत ईमानदार है, कर देता है पर कांग्रेस पार्टी ने उसे स्वार्थी बताया है। यानी जिसकी जेब से कर निकलना है, या ज्यादा कर निकलना है, उसे सूचना तो हो गयी कि न्याय योजना के लागू होने का मतलब है कि कहीं न कहीं उनके कर बोझ में बढ़ोतरी हो जायेगी। पर न्याय स्कीम का फायदा जिन लोगों तक पहुंचना था-समाज के विपन्न वर्गों तक, वहां कांग्रेस पार्टी अपनी बात नहीं पहुंचा पायी कि ये स्कीम उनके लिए है। न्याय का अर्थशास्त्र और राजनीति कांग्रेस को रास नहीं आयी, न्याय योजना की घोषणा कांग्रेस ने की पर इसका लाभ मोदी की भाजपा को मिला। कुल मिलाकर लोकतंत्र में नेताओं और मतदाताओं के बीच एक कारोबारी रिश्ता पनप रहा है, जिसमें मतदाता अब लगातार पूछ रहा है-हमें क्या दोगे। राष्ट्र का विकास, बेहतरीन सड़कों का निर्माण इस तरह के मसले हैं, जो कहीं न कहीं मतदाता को सीधे तौर पर अपने लाभ के नहीं दिखते, वहीं अगर कोई नेता यह घोषणा करता है कि आपकी यात्रा मुफ्त, आपका स्कूल मुफ्त, आपका गैस सिलेंडर मुफ्त, आपको रंगीन टीवी मुफ्त, इस तरह की घोषणाएं सीधे असर करती हैं। भ्रष्ट नेता भी अगर मुफ्तखोरी कराये, तो लोकप्रिय हो जाता है। तमिलनाडु में जयललिता देश के भ्रष्टतम नेताओं की लिस्ट में शीर्ष पर होने की पात्रता रखती थीं, पर वह बहुत लोकप्रिय थीं। इसलिए कि उन्होंने मुफ्तखोरी को बहुविध आयाम दिये। मुफ्तखोरी की योजनाएं एक अर्थ में दोधारी तलवार भी हो जाती हैं, अगर उनके बारे में साफ खुलासा न किया जाये, तो इसका खामियाजा चुनाव में उठाना पड़ता है, जैसे कि कांग्रेस की न्याय योजना में हुआ। कुल मिलाकर मतदाता के लिए मुफ्तखोरी की स्कीमों को इस तरह से लेता है कि भ्रष्ट नेताओं से कुछ नहीं मिलना, जो भी थोड़ा बहुत मुफ्तखोरी की स्कीमों में मिलता है, उसे ले लेना चाहिए। भागते भूत की लंगोटी भली और भागते नेता से मुफ्तखोरी भली।


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