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लापता विमान की त्रासदी

Posted On June - 14 - 2019

वायुसेना के आधुनिकीकरण से थमेंगे हादसे
भारतीय वायुसेना की आधिकारिक घोषणा में लापता एएन-32 में सवार 13 बहादुर सैन्यकर्मियों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा गया है कि उनमें से कोई हमारे बीच नहीं रहा। अंतत: किसी के जीवित न बचने की घोषणा के साथ ही वे उम्मीदें दफन हो गईं, जो इन जांबाजों के परिजन लगा रहे थे। तीन जून को यह विमान एएन-32 असम के जोरहाट बेस से अरुणाचल प्रदेश के शियोमी जिले स्थित मेचुका के लिये रवाना हुआ था मगर बारह हजार फुट ऊंचे पहाड़ी इलाके में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह इलाका चीन की सीमा के निकट अरुणाचल के दूरस्थ इलाकों में से एक है। बिना आबादी वाला यह इलाका संचार की दृष्टि से अत्यंत जटिल क्षेत्र है, जिसके चलते लंबे समय तक दुर्घटनाग्रस्त जहाज का पता नहीं चल सका। भारतीय वायुसेना, सेना, नेवी तथा इसरो के व्यापक अभियान के बावजूद काफी समय तक इस निर्जन  इलाके में जहाज का कोई सुराग नहीं मिल पाया। भौगोलिक जटिलता के चलते बचाव व राहत का कार्य समय रहते संभव नहीं हो पाया। यूं तो यह देश की अपूरणीय क्षति है, मगर हरियाणा के लिये एक दुख यह भी है कि इस दुर्भाग्यशाली विमान में एयर ट्रैफिक सर्विस में तैनात सोनीपत के पंकज सांगवान, फरीदाबाद के फ्लाइट लेफ्टिनेंट राजेश थापा व पलवल के पायलट आशीष तंवर भी शामिल थे। अब वायुसेना  ने आधिकारिक तौर जवानों के परिजनों को उनकी शहादत की सूचना पहुंचा दी है। दरअसल, 11 जून को सियांग के जंगलों में विमान का मलबा तलाश लिया गया था। फिर बारह जून को राहत व बचाव के मकसद से पंद्रह जवानों  और पर्वतरोहियों की टीम उतारी गई। गुरुवार को टीम ने आठ क्रू सदस्यों समेत तेरह लोगों में से किसी के न बचने की घोषणा कर दी। विमान का ब्लैक बॉक्स हासिल कर लिया गया है। कालांतर इसके जरिये दुर्घटना के वास्तविक कारणों का पता लगाया जा सकेगा।
नि:संदेह साल-दर-साल लगातार होने वाली सैन्य विमान दुर्घटनाएं हमारी बड़ी चिंता होनी चाहिए। इससे जहां हमें अपने जांबाजों को खोना पड़ता है, वहीं हमारी आर्थिक व सुरक्षा तैयारियों को भारी नुकसान होता है। इस साल वायुसेना ने एक मिराज, एक जगुआर, एक हेलीकॉप्टर, दो हॉक विमान और दो मिग परिवार के विमानों को खोया है। यह देश की बड़ी क्षति है। हादसे हमें वायुसेना के बेड़े की गहन पड़ताल की जरूरत बताते हैं। साथ ही विमानों के आधुनिकीकरण व उन्नयन की आवश्यकता पर बल देते हैं। जहां तक एएन-32 श्रेणी के जहाजों का प्रश्न है तो वायुसेना के पास ये सौ से अधिक विमान हैं। यूक्रेन निर्मित इन विमानों के आधुनिकीकरण में इस देश की राजनीतिक अनिश्चितता बाधा बनी है। हालांकि भारत ने अमेिरका में बने उन्नत किस्म के चिनूक हेलीकॉप्टरों को वायुसेना में शामिल किया है  और बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान राफेल को खरीदने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है, मगर इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इसके लिये अधिक बजट और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को तेज करने की जरूरत है, अन्यथा दुर्घटनाओं का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बदलते वक्त के साथ युद्ध भूमि में हवाई लड़ाई की भूमिका निर्णायक होती है। ऐसे में किसी तरह की भी ढिलाई युद्धकाल में घातक साबित हो सकती है। इस मायने में यह और जरूरी हो जाता है कि हमारी सीमाओं को दो तरफ से गाहे-बगाहे चुनौती मिल सकती है। नि:संदेह सामरिक हितों के संरक्षण में वायुसेना की भूमिका निर्णायक होती है। हाल ही में बालाकोट में किये गये हवाई हमले ने क्षेत्र के सामरिक समीकरणों की नये सिरे से व्याख्या की है और सीमा पार से चलाये जा रहे आतंकवाद की कमर तोड़ी है। वहीं दूसरी ओर वायुसेना पैदल सेना का मनोबल बढ़ाने में निर्णायक भूमिका भी निभाती है। हमें वायुसेना के आधुनिकीकरण की दिशा में गंभीरता से सोचना चाहिए।


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