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लंका से कश्मीर आयी मां क्षीर भवानी

Posted On June - 9 - 2019

तीर्थाटन

सुरेश डुग्गर
श्रीनगर से 27 किलोमीटर दूर तुलमुल्ला गांव में स्थित क्षीर भवानी मंदिर कश्मीर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। मां क्षीर भवानी व दुर्गा को समर्पित इस मंदिर के चारों ओर चिनार के पेड़ और जलधाराएं हैं, जो इस स्थान की सुंदरता में चार चांद लगाते नज़र आते हैं। महाराग्य देवी, रग्न्या देवी, रजनी देवी, रग्न्या भगवती इस मंदिर के अन्य प्रचलित नाम हैं। यहां एक षट्कोणीय झरना है, जिसे लोग देवी का प्रतीक मानते हैं। स्थानीय लोगों में मान्यता है कि अगर झरने के पानी का रंग सफेद से काला हो जाये तो पूरे क्षेत्र में अप्रत्याशित विपत्ति आती है। इस मंदिर से जुड़ी किंवदंती है कि सतयुग में भगवान श्री राम ने यहां आराधना की। उनके कहने पर हनुमान जी ने यहां देवी की मूर्ति स्थापित की थी।
मौजूदा मंदिर का निर्माण 1912 में महाराजा प्रताप सिंह ने शुरू करवाया, जिसे बाद में महाराजा हरि सिंह ने पूर्ण कराया। मंदिर के नाम से ही स्पष्ट है कि यहां क्षीर अर्थात ‘खीर’ का विशेष महत्व है और इसका इस्तेमाल यहां प्रमुख प्रसाद के रूप में किया जाता है।
एक कथा के अनुसार, रावण की भक्ति से प्रसन्न होकर मां राज्ञा माता (क्षीर भवानी या राग्याना देवी) ने उन्हें दर्शन दिए थे। रावण ने उनकी स्थापना लंका की कुलदेवी के रूप में की थी। लेकिन, रावण के व्यवहार और बुरे कर्मों के कारण मां उससे रुष्ट हो गयीं। रावण के वध के बाद श्री राम के कहने पर हनुमान जी ने माता की इच्छानुसार कश्मीर में उनकी स्थापना की। मान्यता है कि हनुमान जी माता को जल स्वरूप में कमंडल में यहां लाए थे। यह भी कहा जाता है कि जिस दिन यहां
जलकुंड का पता चला, वह ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की अष्टमी का दिन था। इसलिए हर साल इसी दिन यहां मेला लगता है। माता को प्रसन्न करने के लिए दूध और शक्कर में पकाये चावलों का भोग चढ़ाने के साथ-साथ पूजा अर्चना व हवन किया जाता है। भक्तों का मानना है कि माता आज भी यहां जलकुंड में वास करती हैं। मान्यता है कि क्षीर भवानी माता किसी भी अनहोनी का संकेत पहले ही दे देती हैं और उनके कुंड यानी चश्मे के पानी का रंग बदल जाता है।
वर्तमान जलकुंड 60 फुट लंबा है। इसकी आकृति शारदा लिपि में लिखित ओंकार जैसी है। मंदिर के पुजारियों का विश्वास है कि चश्मे का पानी अगर साफ हो तो सबके लिए अच्छा शगुन है, यदि पानी मटमैला हो तो कष्ट और परेशानी आती है। जलकुंड के बीच में जगदंबा माता का भव्य मंदिर है। हर साल पूजा से पहले मंदिर के कुंड में दूध और खीर डालते हैं।


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