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मौत के बोरवेल

Posted On June - 12 - 2019

आपराधिक लापरवाही, तंत्र की विफलता
आखिर तमाम असहनीय कष्ट सहने के बाद अबोध फतेहवीर जिंदगी की जंग हार गया। कहना सहज नहीं है कि तीन साल पहले दस जून को इस दुनिया में यह बच्चा किसकी लापरवाही से मौत के मुंह में चला गया। उन बोरवेल मालिकों की, जिन्होंने तमाम ऐसी घटनाओं और उसके बाद सुप्रीमकोर्ट के निर्देशों को दरकिनार करके दस साल पहले खुदे बोरवेल को खुला छोड़ा। उन अभिभावकों की जो उसे खेत पर ले गये और उसका ख्याल नहीं रखा। उस प्रशासन की, जिसने निष्प्रभावी बोरवेल को बंद करवाने में कोताही बरती। उस प्रशासन की, जिसने पहले ही बचाव कार्य का जिम्मा सेना को नहीं सौंपा। या फिर एनडीआरएफ की, जिसकी कोशिशें विफल हुईं। क्या यह हमारे सत्ताधीशों की विफलता नहीं है जो मंगल व चंद्रमा पर पहुंचने की बात तो करते हैं मगर कोई स्वचालित सिस्टम देश को उपलब्ध नहीं करा पाये जो ऐसी घटनाओं के बाद तुरत-फुरत बच्चों को बोरवेल से निकालने की सुविधा मुहैया करा सके। कहा जाता है कि चीन व दुनिया के अन्य देशों के पास ऐसी तकनीकें हैं। विडंबना देखिये कि आखिरकार बच्चे को गांव के एक युवक ने प्रशिक्षित एनडीआरएफ टीम की विफलता के बाद जुगाड़ तकनीक से बाहर निकाला। अफसोस कि इसके बावजूद बच्चे को नहीं बचाया जा सका। बृहस्पतिवार को नौ इंच चौड़े 140 फीट गहरे वोरवेल में गिरा बच्चा 125 फीट की गहराई में अटक गया था। उसे बचाने के लिये जो समानान्तर सुरंग खोदी गई, उसकी दिशा-दशा ठीक नहीं रही। हजारों लोगों के हुजूम व सक्रियता के बावजूद बच्चे को नहीं बचाया जा सका। विडंबना यही रही कि उसे सिर्फ आक्सीजन ही दी जा सकी, कुछ खाने को नहीं दिया जा सका। इन तमाम लापरवाहियों के चलते आखिरकार संगरूर जिले के भगवानपुरा का तीन वर्षीय फतेहवीर असमय काल कवलित हो गया। बावजूद इसके कि उसे बचाने की कोशिश भी हुई।
यह सोचकर ही रूह कांपती है कि उस बच्चे ने उस अंधेरे बोरवेल में 109 घंटे कैसे सहे होंगे। भूखे-प्यासे, अंधेरा-घुटन, भय और असुरक्षा में अबोध बालक का रहना विचलित करता है। सार्वजनिक जीवन में आपराधिक लापरवाही करने वाले लोग ऐसे भयावह हादसों के बारे में नहीं सोचते। विडंबना देखिये कि कुरुक्षेत्र में वर्ष 2006 में प्रिंस के बोरवेल में गिरने व निकलने के घटनाक्रम ने देश को व्यथित किया था लेकिन तब से लगातार ऐसी घटनाओं का सिलसिला जारी है। आये दिन विभिन्न राज्यों से बच्चों के बोरवेल में गिरने की खबरें आती रहती हैं। वर्ष 2010 में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति के बाद सुप्रीमकोर्ट ने चिंता जाहिर करते हुए संज्ञान लिया था। वर्ष 2013 में सभी राज्यों को निर्देश दिये गये थे कि ऐसी घटनाओं को टालने के लिये गंभीरता दिखायी जाये। ग्रामीण क्षेत्रों में सरपंच व शहरी क्षेत्रों में ग्राउंड वाटर डिपार्टमेंट, स्वास्थ्य विभाग व नगर निगम के इंजीनियरों को निष्क्रिय बोरवेल को कंक्रीट से भरने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी मगर इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं हुआ। सरपंच व कृषि अधिकारी की देखरेख में बोरवेल की खुदाई,  खोदने वाली कंपनी का रजिस्ट्रेशन, खुदाई की जगह में चेतावनी बोर्ड लगवाने, ऐसी जगह को कंटीले तार से घेरने, आसपास दीवार खड़ी करने तथा गड्ढों को लोहे के ढक्कन से ढकना अनिवार्य किया गया था मगर इसके बावजूद परिणाम वही ढाक के तीन पात। हम किसी सुरक्षा उपाय को लागू करने के लिये नये हादसे का इंतजार करते हैं। घटना के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री ने राज्य के सभी खुले बोरवेलों के बारे में चौबीस घंटे में रिपोर्ट मांगी है। काश, वे कुछ दिन पहले ऐसी रिपोर्ट मांग लेते तो शायद फतेहवीर की जान बच जाती। घटना के बाद उपजा जनाक्रोश व आंदोलन बता रहा है कि सत्ताधीशों की काहिली अब और बर्दाश्त नहीं की जायेगी।


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