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मेरिट की रट और जिगर के टुकड़े

Posted On June - 13 - 2019

तिरछी नज़र

शमीम शर्मा
एक स्कूल ने रिजल्ट घोषित किये जाने वाले दिन मेन गेट पर बोर्ड लगवाया-बच्चो! खराब रिजल्ट देखकर कोई भी गलत कदम मत उठाना। मार्कशीट तो बस कागज़ का टुकड़ा है और तुम किसी के जिगर के टुकड़े हो। बच्चों को कितना ही समझा लो पर आये साल परीक्षा परिणाम घोषित होने पर दो-चार जिगर के टुकड़े ज़रूर ही मौत का आलिंगन करते हैं। पता नहीं पढ़ाई का प्रेशर है या असफलताओं को झेलने की असमर्थता।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि घर से लेकर स्कूल तक मेरिट-मेरिट की रट लगी हुई है। इस मेरिट के हाहाकार में जो बच्चा 500 में से 498 अंक लेकर पूरे देश में सेकंड आया है, वो भी उतना दुखी है, जितना भरी फसल पर ओले पड़ने से किसान व्यथित होता है।
सारी शिक्षण पद्धतियां हमें यह तो सिखाती हैं कि सफल होने के क्या रास्ते हैं पर एक भी अध्याय ऐसा नहीं है जो यह बताये कि असफल होने पर संतुलन कैसे रखा जाये। आगे बढ़ने की सौ राहें हैं पर पीछे रह जाने पर मन शान्त-स्थिर रखने का एक भी उपाय किसी पुस्तिका में दर्ज नहीं है। असफल बच्चों की पराजय को माता-पिताओं ने स्वीकार कर लिया हो, ऐसा नहीं है। सच्चाई यह है कि वे इस आशंका से सांस खींचकर रह जाते हैं कि कहीं लाडले-लाड़लियां मर ना मिटें।
बीए का रिजल्ट घोषित होने के बाद एक लड़के ने उलाहना देते हुए अपनी क्लासमेट से कहा- बैरण! तेरा थोबड़ा देखण रोज पच्चीस किलोमीटर तैं आया करता, अर जै इतनी किताब देख लेता तो बीए कती क्लीयर हो जाती। पर यह बात हमारे लाडलों को तब समझ में आती है जब उनकी नैया भंवर में पूरी तरह धंस चुकी होती है। मोबाइल और गर्लफ्रैंड-ब्वॉय फ्रैंड के चक्कर ने जितनी मेरिट निगली है, उतनी शायद और किसी ने नहीं। देश का कोई भूभाग हो पर अगर कोई लड़का इम्तिहान में फेल हो जाये तो उसकी मां तीन शब्द ही कहती है-और हांड ले कमीने! गर्लफ्रैंड भी तीन ही शब्द कहती मिलेगी-शर्म नहीं आयी? और दोस्त भी तीन शब्द कहते हैं पर वे दिल पर मरहम का काम करते हैं-रै तू भी?
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एक बर की बात है अक नत्थू का बाब्बू उस ताहीं भूंडी ढाल पीट रह्या था। पड़ौसी सुरजा बोल्या-रै तैं क्यां तै इसकी सौड़ सी भर रह्या है? नत्थू बोल्या- काल सवेरे इसका दसवीं का रिजल्ट आवैगा। सुरजा बोल्या- फेर आज क्यां तैं कूट्टण लाग रह्या है? नत्थू समझाते होये बोल्या-बात या है अक काल किसी काम तैं मन्नैं बाहर जाणा है।


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