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मुफ्त की योजनाओं के लाभांश

Posted On June - 17 - 2019

दक्षिण के राज्यों में मुफ्तखोरी के अलग आयाम हैं। रंगीन टीवी से लेकर मंगलसूत्र तक की व्यवस्था की जाती रही है। पर स्मार्ट नेताओं ने यह भी चिन्हित किया कि मुफ्तखोरी अंतत संस्थानों को तबाह करती है, तो मुफ्तखोरी के बजाय आइटमों की कीमत सस्ती रखने पर विचार किया गया। स्वर्गीय जया ललिता ‘अम्मा कैंटीन’ का विचार लेकर आयीं, जहां सस्ते में बेहतरीन खाना उपलब्ध कराया गया। पूर्णत मुफ्त किया जाना किसी वस्तु या सेवा को दुरुपयोग की ओर धकेलता है। हालांकि, पूर्ण मुफ्त किये जाने से राजनीतिक तौर पर बहुत लाभ हो जाता है। मुफ्तखोरी के विस्तृत आयामों की सीमा कर्ज माफी की योजनाएं भी आती हैं। 2017 में यूपी में विधानसभा चुनाव जीतने के भाजपा ने किसानों की कर्जमाफी का दांव खेला और करीब 36 हजार करोड़ की राशि इस कर्जमाफी से जुड़ी थी। पंजाब में भी कर्जमाफी को राजनीतिक नारा बनाकर चुनाव लड़ा गया था। कर्जमाफी और मुफ्तखोरी की राजनीतिक तर्क हमेशा उपलब्ध हैं। विजय माल्या 9 हजार करोड़ रुपये कर्ज लेकर भाग सकते हैं तो किसानों की कर्जमाफी में क्या दिक्कत है। किसानों की कर्जमाफी हो तो फिर कोई राजनीतिक दल लघु उद्यमियों की कर्जमाफी का मसला भी उठा सकता है। इसका राजनीतिक स्तर पर विरोध करते हुए दिखना भी मुश्किल है। फिर तमाम छात्रों ने जो कर्ज लिये हैं, वो भी माफ ही हों, यह नारा भी छात्र-समर्थक है। इसका विरोध करते हुए कोई राजनीतिक पार्टी नहीं दिख सकती। कल को कोई राजनीतिक दल मेट्रो में छात्रों की मुफ्त यात्रा की मांग लेकर आ जाये तो कोई राजनीतिक दल इसका खुला विरोध करते हुए नहीं दिखना चाहेगा। कोई राजनीतिक दल अगर यह मांग लेकर आ जाये कि 25 हजार रुपये महीने से कम पाने वाले हर व्यक्ति को मेट्रो में मुफ्त यात्रा का अधिकार होना चाहिए तो इस मांग का भी खुला विरोध करते हुए कोई राजनीतिक दल नहीं दिखना चाहेगा। मेट्रोमैन श्रीधरन मुफ्तखोरी का विरोध कर सकते हैं, क्योंकि उन्हे कोई चुनाव नहीं लड़ना है।


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