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बालक की सीख

Posted On June - 9 - 2019

बाल कहानी

सरोज गुप्ता
एक नगर में एक राजा राज करता था। उसका राज्य हर प्रकार से सुखी व सम्पन्न था। राजा को प्रकृति से विशेष प्रेम था। एक बार उन्होंने वन-विहार की योजना बनाई। राजा अपनी रानी एवं अंगरक्षकों के साथ सुन्दरवन में पहुंच गए।
राजा पूरी तरह प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद उठा रहे थे। पास ही एक छोटा-सा झरना भी था। रंग-बिरंगे फूलों की छटा चारों ओर बिखरी पड़ी थी।
फिर एक दिन टहलते हुए राजा ने एक वृक्ष पर एक सुन्दर घोंसला लटका हुआ देखा। राजा ने रानी से कहा, ‘रानी, क्यों न हम इस घोंसले को अपने महल में ले चलें। रानी की स्वीकृति देने पर राजा उस घोंसले को तोड़ने के लिए आगे बढ़े, पर यह क्या, तभी एक ग्रामीण बालक उनके सामने आकर खड़ा हो गया और कहने लगा, ‘यह आप क्या करने जा रहे हैं?’
राजा ने बालक की ओर देखा और उत्तर दिया, ‘बच्चे! हम यह घोंसला तोड़कर महल ले जाना चाहते हैं।’ ‘जी नहीं, आप इस घोंसले को नहीं तोड़ सकते और न ही इसे घर ले जा सकते हैं।’ बच्चे ने प्रत्युत्तर में कहा।
राजा हैरान होकर उस बालक को देखने लगा जो इस प्रकार आदेशात्मक स्वर में उनसे बात कर रहा था। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा, ‘ऐ बालक! क्या तुम जानते हो कि हम यहां के राजा हैं।’
‘ओह राजा साहब! तब तो यह घोंसला आपको बिलकुल भी नहीं तोड़ना चाहिए। दूसरों को आसरा देने वाला भला स्वयं किसी का आसरा कैसे छीन सकता है।’
अभी तक रानी चुप खड़ी थीं अब एकदम उन्होंने पूछा, ‘क्या मतलब है तुम्हारा?’
‘देखिए रानी साहिबा! आपको तो यह बात अच्छी तरह पता होनी चाहिए। मान लीजिए कि घर लौटने पर आपको आपके बच्चे बाहर बैठे मिलें और आपके महल पर किसी अन्य ने कब्जा कर लिया हो तो आपको कैसा अनुभव होगा। बेघर होकर आप एकदम बच्चों को लेकर कहां जाएंगी?’
रानी ने क्रोधित होकर कहा, ‘तुम्हारी यह हिम्मत कि तुम हमसे ऐसी उल्टी-सीधी बातें कर रहे हो।’
‘रानी जी! नाराज न होइए। मैं आपको केवल यह बताना चाहता हूं कि आप तो केवल अपना घर सजाने के लिए इस घोंसले को ले जाना चाहते हैं लेकिन सोचिए कि जिन पक्षियों का यह आसरा है वे जब शाम को आकर देखेंगे कि उनके बच्चे बेघर होकर असहाय पड़े हैं तो उन पर क्या बीतेगी। बताइये कि आप रानी होकर भी यह अन्याय करेंगी? मात्र अपने मनोरंजन की खातिर किसी का बसेरा उजाड़ देंगी।’
‘नहीं, नहीं हम ऐसा कभी नहीं कर सकते। बालक! तुमने हमारी आंखें खोल दी हैं। हम यह घोंसला हरगिज न ले जाएंगे। ऐसा अधर्म हम कदापि नहीं करेंगे कि बेजुबान पक्षियों का नीड़ उजाड़ दें।’
राजा ने मुस्कुराते हुए रानी से कहा, ‘रानी जी! यह बालक अल्प-शिक्षित होते हुए भी हमसे कहीं अधिक समझदार है, जिसने हमें एक गलत कार्य करने से रोका है। ऐसे बालकों की हमारे राज्य को आवश्यकता है।’ ऐसा कहकर राजा ने उस बालक की पीठ थपथपाई और उसे अपने राज्य में आने का निमंत्रण दिया।


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