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बाकी है अभी समग्रता में मूल्यांकन

Posted On June - 12 - 2019

सुनील मिश्र

दो दिन पहले मूर्धन्य लेखक, रंगकर्मी और अपनी शख्सियत के अलग ही विद्वान गिरीश कर्नाड का निधन हो गया। उनका योगदान असाधारण था, इसीलिए ही देश के मीडिया ने उनके नहीं रहने से उपजने वाले निर्वात को गम्भीरता से लिया। जिज्ञासा में ज्यादातर लेख पढ़ने में आये और सबमें वही सब एक था टाइगर की बात या टाइगर जिन्दा है कि बात, जिसमें उनकी उपस्थिति बमुश्किल दस-बारह मिनटों की थी। फिर लोगों ने मेरी जंग, इकबाल आदि फिल्मों की बात की और बताया कि इन फिल्मों में उनका काम खूब रहा।
मनोरंजन जगत की विडम्बना कि हमें राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के व्यक्तित्व का ठीक-ठीक रेखांकन करने में भी अपने ज्ञान की कमी पड़ती है। हम एक बड़े या विशिष्ट व्यक्तित्व को उसकी समग्रता में व्याख्यायित नहीं कर पाते हैं। हमारे पास मुहावरे ज्यादा हैं और तथ्य कम हैं। हम उसकी बात, उसकी बात कहकर नहीं करना चाहते बल्कि अपना आकलन प्रस्तुत करने लगते हैं। गिरीश कर्नाड का मतलब हिन्दी फिल्मों का वह कलाकार नहीं, जिसे मुम्बइया सिनेमा के फिल्मकार निर्देशक एक भी काबिलियत की भूमिका नहीं दे सके। गिरीश कर्नाड ने कभी नहीं चाहा कि वे इस तरह से पहचाने जायें। अक्सर हिन्दी सिनेमा में उनकी उपस्थिति या यदाकदा सक्रियता को लेकर बात करना उनको असहज ही लगता रहा क्योंकि वे स्वयं ही जानते थे कि यह एक समय बिताने जैसा काम है, जिसमें उत्कृष्टता या काबिलियत के प्रदर्शन जैसा कुछ नहीं है।
बासु चटर्जी की फिल्म स्वामी का नायक घनश्याम एक पारिवारिक मर्यादा वाला व्यक्ति है जो अपनी ऐसी पत्नी के मन में अपने संस्कारों और परिवेश में सदियों से बसर करने वाली परम्परा से अपनी जगह बनाता है, जिसके मन में उसका प्रेमी गहरे बसा हुआ है और वह हर अगले पल पति को छोड़कर प्रेमी के साथ चली जाना चाहती है। घनश्याम और सौदामिनी का विवाह भारतीय परम्परा की उस थाती को परिचित कराता है, जिसमें बंधन अटूट होते हैं और प्रेम सदैव परिभाषित नहीं किया जा सकता। गिरीश कर्नाड ने यह भूमिका करते हुए अपने आपको वैसा ही रखा था, जैसे वे थे। स्वामी एक सादगी भरी फिल्म है जो आकर चली जाती है और इसका नायक घनश्याम कहीं हमारे जहन में ठहर कर रह जाता है। हमारे दर्शकों को कौन बतायेगा कि गिरीश कर्नाड ने नेशनल अवार्ड के मंच पर दस बार जाकर अपनी क्षमता का सम्मान प्राप्त किया!
एक कलाकार जो मृत्युपर्यन्त कम से कम पांच फिल्मों में तब काम कर रहा था जब उसका सांस लेना दूभर था। इनमें से एक तेलुगू और चार कन्नड़ फिल्में थीं। गिरीश कर्नाड का भारतीय सिनेमा में वह सम्मान था कि निर्देशक उनके साथ अब भी केवल उनका मन रमा रहे, इसलिए काम करना चाहते थे। गिरीश कर्नाड इसलिए सिनेमा के लिए अनमोल हैं क्योंकि उनके नाम से सत्तर के दशक में प्रवाह की तरह आया सार्थक सिनेमा आन्दोलन जाना जाता है। वे सिनेमा के सृजन में आकण्ठ डूबे सर्जक थे जो अपने ही जैसे गुणी लोगों श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, सत्यदेव दुबे और अमोल पालेकर के साथ लीक से अलग हटकर काम कर रहे थे।
कैमरा वही होता है, तकनीक वही होती है, उस समय की बात कहें तो प्रयुक्त होने वाला रॉ-मटेरियल वही होता है, फिर कैसे कोई गिरीश कर्नाड होता है! अगर सिनेमा एक पाठ है तो उस पाठ की स्याही, अक्षर, मात्राएं और वर्तनी गिरीश कर्नाड जैसे लोग हैं। श्याम बेनेगल ने गिरीश कर्नाड को ही केन्द्र में रखकर मंथन फिल्म बनायी थी। उसमें एक प्रतिबद्ध व्यक्ति को दृश्य में जरा देखिए, वह संगीत सुनिए-समझिए जो डॉ. राव और बिन्दु के एक-दूसरे को देखने और देखने से ध्वनित होने वाली अन्तरंग लय से उत्पन्न होता है! इस फिल्म को गिरीश कर्नाड जैसे बनाना चाहते थे, एक एपिक की तरह वैसे ही बनाने की पूरी स्वतंत्रता फिल्म के निर्माता शशि कपूर ने उनको प्रदान की।
कन्नड़ सिनेमा गिरीश कर्नाड के उत्कृष्ट सिनेमायी सृजन के लिए उनका सदैव ऋणी रहेगा। उनका ऋणी तो भारतीय रंगमंच भी रहेगा, जिसमें उनके लिखे क्लासिक नाटकों की एक बड़ी शृंखला है, जिसे मूल कन्नड़ में उन्होंने लिखा और देश को उसका हिन्दी रूपान्तर उपलब्ध कराया। शीर्ष स्थानीय रंगकर्मियों ने गिरीश कर्नाड के नाटकों के बिना भारतीय रंगमंच के बारे में सोचा तक नहीं है। दरअसल हमारे बीच सचमुच यह नाम एक ऐसे जीनियस व्यक्तित्व का था, जिसकी दृष्टि, अनूठी और अथाह विचार सम्पदा और सिद्धान्तों के बारे में तब तक जानना आसान न होता था जब तक आपका उनसे लम्बा संवाद या शास्त्रार्थ न हो। गिरीश कर्नाड का बचपन अनेक अभावों और कष्टों में व्यतीत हुआ था लेकिन अनेक विडम्बनाओं के बीच अपने भरेपूरे परिवार में वे जिस तरह के दैदीप्यमान प्रकाश पुंज बनकर देश-दुनिया में प्रतिष्ठापित और सम्मानित हुए, वह यश बहुत कम लोगों को हमारी सभ्यता में प्राप्त हुआ है।


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