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फ्लैशबैक

Posted On June - 29 - 2019

हिंदी फीचर फिल्म एक चादर मैली-सी
शा. रा.
पंजाब व पंजाबी रवायतों पर बहुतेरा साहित्य लिखा जा चुका है। कई पंजाबी रचनाकारों की कृतियां तो बाकायदा तस्वीरें भी बन चुकी हैं। नानक सिंह की ‘पवित्र पापी’, अमृता प्रीतम की ‘पिंजर’ और मोहन राकेश लिखित कहानी पर आधारित ‘उसकी रोटी’ पर बनी फिल्मों के नाम बानगी के तौर पर लिये जा सकते हैं, लेकिन जो संजीदगी ‘एक चादर मैली-सी’ में है, कोई भी निर्देशक अन्य फिल्मों में विषय को इतना करीब से पकड़ने में उतना सफल नहीं हुआ। शायद लेखक राजिन्दर सिंह बेदी ने उपन्यास ही इतना सटीक और संजीदा लिखा है। फिल्म में ग्रामीण परिवेश की पुरानी रवायतों से टक्कर लेती स्त्री के किरदार को हेमा मालिनी ने उसी संजीगदी के साथ अभिनीत किया है, जैसा तसव्वुर इस किरदार के बारे में लेखक ने किया था। जो दर्शक तथा फ्लैश बैक के पाठक हेमा मालिनी को केवल ड्रीम गर्ल के रूप में याद करते हैं, उन्हें यह फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए। पंजाबी परिवारों की ‘राणो’ ऐसी ही तो होती है। भरे-भरे जिस्म वाली मैली-कुचैली राणो, जो अपने पति त्रिलोक की ही पत्नी नहीं, उसका ब्याह तो सारे परिवार, रीति-रिवाजों से हुआ है। वह हाड़-मांस की जीती-जागती इंसान नहीं, बल्कि वस्तु मात्र है, जिसे जो चाहे, जैसे मर्जी इस्तेमाल करे। खासकर पति की मृत्यु के बाद तो उसकी स्थिति और भी दयनीय हो जाती है। दरअसल ‘एक चादर मैली-सी’ इसी लोकाचार की प्रस्तुति है जो पंजाब की पुरातन रिवायत ‘चादर अंदाज़ी/चादर चढ़ाना’ पर परोक्ष रूप से कमेंट करती है। यह रवायत पंजाब के जट्ट तबके में कभी खूब चलती थी। आजकल गरीब-गुरबे परिवारों में कहीं-कहीं देखने को मिल जाती है। यह रवायत दरअसल जट्ट परिवार की आर्थिकी से जुड़ी है। घर में बड़े बेटे की मृत्यु के बाद छोटे बेटे द्वारा अपनी भाभी से शादी करने को ही चादर चढ़ाना कहते हैं। दरअसल इसका मकसद एक तो पारिवारिक संपत्ति को बंटने से रोकना है, दूसरा यह रवायत विधवा विवाह को तरजीह देने की वकालत करती है लेकिन कालांतर इस रवायत का जो रूप विद्रूप हुआ, यही इस फिल्म का सेंट्रल आइडिया है। सही मायने में ‘राणो’ के पति ऐसे ही होते हैं, जो सारा दिन कमाकर आते हैं और रात को पऊआ पीने के बाद पत्नी पर धौल भी जमाते हैं और नशे में गाली-गलौज भी कर देते हैं। तीसरा किरदार राणो के देवर मंगल का है जो बड़े भाई के निधन के बाद राणो पर चादर चढ़ाकर ब्याह करने को विवश किया जाता है। मंगल एक बंजारा लड़की (पूनम ढिल्लों) से प्यार करता है और जल्दी से वैवाहिक बंधन में भी बंधना चाहता है लेकिन असामयिक बड़े भाई की मृत्यु के बाद वह लोकाचार के तकाजे के आगे घुटने टेक कर अपनी मां स्वरूपा भाभी से शादी को मजबूर हो जाता है क्योंकि परिवार का पेट पालने के लिए राणो घर के बाहर मजदूरी करने जाती है, जहां गांव के अमीरजादे उस पर आंख रखते हैं लेकिन राणो क्या करे? उसके सामने भूख से बिलखते बच्चे हैं, तानाकशी करती सास है, तमाशबीन समाज है। फिर भी जब समाज के पंडित उसकी देवर से शादी कर देते हैं तो ऊहापोह में पड़े शराब के नशे में धुत देवर को वह इस बंधन से आज़ाद करती है। वह दूसरी शादी करने पर जवान बेटी के सवालों के तीर भी सहती है। हालांकि, इसमें उसका कोई कसूर नहीं। कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब राणो के पति की हत्या करने वाला युवक पश्चाताप स्वरूप राणो की बेटी का हाथ मांगने आ जाता है। दोनों की शादी होने के बाद फिल्म का खत्म होना दर्शक वर्ग को अखरता है। इस ट्विस्ट के बाद अगर कहानी में एक ओर ट्विस्ट होता तो फिल्म और भी जीवंत हो उठती। ग्राम्य जीवन और सरल जीवन जीते किरदारों की प्रस्तुति में निर्देशन की मंझावट प्रतिपादित होती है। इसके बाद उन्होंने ग्रेसी सिंह को लेकर ‘चूड़ियां’ फिल्म भी बनाई थी लेकिन सुखवंत ढड्डा को ख्याति इसी फिल्म से मिली। कहानी, निर्देशन के अलावा यह फिल्म एक और वजह से भी जानी जाती है, वह है सिनेमैटोग्राफी। राजेंद्र सिंह बेदी के उपन्यास को पढ़कर जो छवियां दिमाग में बनती हैं, लगता है सिनेमैटोग्राफी ने हूबहू उन्हें कैद कर लिया है।
1986 में रिलीज इस फिल्म की कहानी को पहले राजिन्दर सिंह बेदी स्वयं पर्दे पर उतारना चाहते थे लेकिन गीता बाली की असामयिक मृत्यु ने इस प्रोजेक्ट को सिरे नहीं चढ़ने दिया। अगर 1960 में इसे राजिन्दर सिंह बेदी बनाते तो इसमें धर्मेंद्र और गीता बाली मुख्य भूमिकाओं में होते। करीब ढाई दशक बाद राजिन्दर सिंह बेदी का सपना निर्देशक ढड्डा ने फलीभूत किया। ‘एक चादर मैली-सी’ राजिन्दर सिंह बेदी का उर्दू उपन्यास था, जिसे 1965 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।
निर्माण टीम
प्रोड्यूसर : जीएम सिंह निन्दरजोग
निर्देशक : सुखवंत ढड्डा
मूलकथा : राजिन्दर सिंह बेदी
पटकथा : फणी मजूमदार माक्खन सिंह तथा राजिन्दर सिंह बेदी
संवाद : मदन जोशी
सिनेमैटोग्राफी : साजी.एन. करुण
संगीतकार : अनु मलिक
सितारे : हेमा मालिनी, ऋषि कपूर, कुलभूषण खरबंदा, पूनम ढिल्लों
गीत
माता रानी दे दरबार : दिलराज कौर
लोग तो मंदिर मस्जिद जाएं : आशा भौंसले, शब्बीर कुमार
मर गयी, मर गयी : आशा भौंसले, गुरचरण कौर
इस दुनिया में औरत : आशा भौंसले
मैं माफी मांगने आया : शब्बीर कुमार


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