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न्यायिक पहल के बाद केंद्र की जवाबदेही

Posted On June - 13 - 2019

जनसंख्या नियंत्रण

अनूप भटनागर
लोकसभा चुनाव संपन्न होने के तुरंत बाद ही देश में बढ़ती आबादी का मुद्दा गरमाने लगा है। मांग है कि जनसंख्या पर नियंत्रण के लिये कानून में संशोधन किया जाये। साथ ही संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिये गठित आयोग के सुझाव के अनुरूप संविधान में अनुच्छेद 47-ए जोड़ा जाये। देश की बढ़ती जनसंख्या की वजह से संसाधनों पर पड़ रहे दबाव को लेकर पिछले कई दशकों से चिंता व्यक्त की जाती रही है लेकिन इसमें कोई ठोस सफलता नहीं मिली है।
दिलचस्प पहलू यह है कि बाबा रामदेव द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के लिये कानून में संशोधन करके तीसरी संतान को मतदान के अधिकार और सरकारी नौकरी से वंचित करने की मांग का केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने तत्काल ही समर्थन कर दिया। दूसरी ओर, भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने इसी दौरान जनहित याचिका दायर की, जिस पर उच्च न्यायालय ने केन्द्र और विधि आयोग से जवाब भी मांग लिया। इस याचिका में ‘हम दो हमारे दो’ के सिद्धांत का पालन करने पर जोर दिया गया है। हालांकि, उच्च न्यायालय में यह मामला तीन सितंबर को अब आगे सुनवाई के लिये सूचीबद्ध है लेकिन लगता है कि संवेदनशील विषय पर सियासत गरमाने का प्रयास किया गया है।
हालांकि इससे पहले कम से कम तीन अवसरों पर उच्चतम न्यायालय जनसंख्या पर नियंत्रण पाने के लिये संसद और विधानसभा के चुनावों के लिये दो संतानों का फार्मूला लागू करने का निर्वाचन आयोग को निर्देश देने से इनकार कर चुका है। शीर्ष अदालत ने अभी पिछले साल मई में ही भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की इसी तरह की जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था। इसी याचिका में भी वेंकटचलैया आयोग की 31 मार्च, 2002 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया था कि इस विषय पर केन्द्र सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाये। यही नहीं, न्यायालय ने 17वीं लोकसभा के चुनाव से ठीक पहले भी अश्विनी उपाध्याय की एक अन्य जनहित याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें राजनीतिक दलों को दो से अधिक संतान वाले व्यक्तियों को पार्टी का उम्मीदवार नहीं बनाने का अनुरोध किया गया था।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नयी सरकार के गठन के पहले ही इस मुद्दे को उछाल कर जनसंख्या के विषय पर राजनीति को एक दिशा देने का प्रयास किया गया है। इसका संकेत एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की तीखी प्रतिक्रिया से मिलता है। देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश एमएन वेंकटचलैया की अध्यक्षता में गठित आयोग ने अपनी रिपोर्ट में संविधान में अनुच्छेद 47-ए जोड़ने और जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने का सुझाव दिया था। इस मामले में याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने तर्क दिया है कि देश में बेरोजगारी, गरीबी, लगातार बढ़ रहे बलात्कार, घरेलू हिंसा और इसी तरह के दूसरे संगीन अपराधों, प्रदूषण और जल, स्वच्छ वायु, जंगल और इसी तरह के अन्य संसाधनों के तेजी से खत्म होने की मुख्य वजह बढ़ती आबादी है। उनका तर्क है कि जनसंख्या पर प्रभावी तरीके से नियंत्रण पाये बगैर स्वच्छ भारत और बेटी बचाओ जैसे अभियान पूरी तरह सफल नहीं हो पायेंगे। यही नहीं, उपाध्याय ने सरकारी नौकरियों, सब्सिडी और मदद के लिये दो संतानों का मानक निर्धारित करने और इसका पालन नहीं करने पर मत देने का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, संपत्ति में अधिकार, आवास का अधिकार और मुफ्त कानूनी सहायता जैसे विधायी अधिकार वापस लेने का सरकार को निर्देश देने का उच्च न्यायालय से अनुरोध किया है।
जनसंख्या पर नियंत्रण के उद्देश्य से नरसिंह राव सरकार के कार्यकाल में 79वां संविधान संशोधन विधेयक राज्यसभा में पेश किया गया था। इस विधेयक में प्रस्तावित किया गया था कि दो से अधिक संतानों वाला व्यक्ति संसद के किसी भी सदन या राज्यों के विधानमंडल का चुनाव लड़ने के अयोग्य था। इस बीच, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और ओडिशा सहित कई राज्यों ने अपने यहां पंचायत स्तर के चुनावों में दो संतान वाले व्यक्ति को ही चुनाव लड़ने की पात्रता रखने संबंधी कानून बना दिया है।
हरियाणा में पंचायत चुनावों में दो से अधिक संतान वाले व्यक्ति को चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने का प्रावधान करने संबंधी कानून को वैध करार देते हुए उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि देश में तेजी से बढ़ रही आबादी पर कानून के माध्यम से अंकुश लगाना राष्ट्र हित में है। अक्तूबर, 2018 में ओडिशा के मामले में तो यहां तक कहा गया था कि यदि तीसरी संतान को गोद दे दिया जाये तो भी ऐसा व्यक्ति चुनाव लड़ने के अयोग्य होगा। नि:संदेह जनसंख्या नियंत्रण के बारे में केन्द्र सरकार के रुख को देखना दिलचस्प होगा।


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