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तख्ती-कलम का मोह

Posted On June - 30 - 2019

स्कूल में पहला दिन

अनिल कौशिक
ऊंचे टीले पर किलानुमा भवन। प्रवेशद्वार के दायीं ओर पांच विशाल कमरे। खुले प्रांगण के मध्य अज्ञात सिद्ध महात्मा का समाधि स्थल। बायीं ओर पीपल, नीम, वट के हरे-भरे छायादार वृक्ष अपने बड़प्पन की कहानी बयां करते हुए मौन खड़े थे। गेट के बगल में ही प्यास बुझाने का यंत्र था नल। मैं अपनी बड़ी बहन की उंगली थामे सपाट चढ़ाई पार कर राजकीय प्राथमिक पाठशाला, क्योड़क के कमरे में पहुंचा। सामने रौबीले चेहरे के धनी राधाकृष्ण कुर्सी पर विराजमान थे। औपचारिकता निभाने के बाद उन्होंने मेरा नाम एक बड़ी-सी कॉपी (रजिस्टर) में दर्ज किया। लगातार पाठशाला आने का वादा कर हम घर लौट आये। मैं, अगली सुबह निडर, खुशी और उत्सुकता के साथ स्कूल में एक नई शख्सियत के सामने खड़ा था। मेज पर रखी चाकू से तरासी पौरे की कलम, काली स्याही से भरी लोहे की दवात व एक तख्ती थी। गुरुजी ने तख्ती पर पेंसिल से चार लंबी लाइनें दोनों तरफ लगाईं। एक ओर वर्णमाला के अक्षर, दूसरी ओर मात्राएं कीलीं। फिर उन्होंने स्वयं हाथ में कलम पकड़, उसे दवात में डुबोकर, अक्षरों और मात्राओं के ऊपर लिखने की विधि समझायी। इसके बाद अन्य बालकों के पास बैठकर बार-बार सोच्चारण लेखन करते रहना बताया गया। स्कूली दिनचर्या के इस दोहरे उपक्रम ने मुझे तख्ती-कलम का स्नेही बना दिया। इसके साथ-साथ कच्ची पहली का सचित्र कैदा (छोटी पुस्तक) भी मेरे समझने-सिखलाने में पूर्णत: सहयोगी रहा। महीनेभर की सतत मेहनत-लगन के आकलन में, सही वाचन, पाठन, लेख-सुलेख, श्रुतलेख में मेरी पकड़ ने अन्य सहपाठियों की अपेक्षा गुरुजी को लुभा लिया। इस प्रकार हिन्दी के साथ-साथ अन्य विषयों पर भी समयानुसार सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ता गया। मैट्रिक, स्नातक, स्नातकोत्तर आदि योग्यताएं प्राप्त कर सरकारी विद्या मंदिर की उच्च-उच्चतर कक्षाओं में हिन्दी राष्ट्रभाषा की गरिमा को आगे बढ़ाने का दायित्व मुझे मिला। तख्ती पर कलम से लिखा-सीखा-पढ़ा लिपि वर्णमाला का ज्ञान, आज भी मुझे अतीत-वर्तमान की याद बखूबी कराता है।


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