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ट्रेड वार को अवसर में बदले भारत

Posted On June - 14 - 2019

हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि यदि चीन और भारत ने अमेरिका के उत्पादों औऱ सेवाओं पर आयात शुल्क में उपयुक्त कमी नहीं की तो अमेरिका अपने बाजार में इन दोनों देशों से आने वाले उत्पादों पर आयात शुल्क और बढ़ाने की नीति पर आगे बढ़ेगा। ट्रंप के ऐसे कठोर वक्तव्य से वैश्विक ट्रेड वार के गहराने की आशंका बढ़ गई है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों 8 एवं 9 जून को जापान के शहर फुकुओका में आयोजित हुए जी-20 देशों के वित्तमंत्रियों और केंद्रीय बैंक के प्रमुखों की शिखर बैठक में सभी ने एकमत से यह स्वीकार किया कि विश्व में व्यापार तनाव बढ़ता जा रहा है और इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था का जोखिम बढ़ा है। इस बात को स्वीकार किया गया कि आर्थिक वृद्धि नीचे बनी हुई है तथा इसके और नीचे जाने का जोखिम इसलिए है क्योंकि अमेरिका तथा चीन दोनों लगातार एक-दूसरे को आयात शुल्क बढ़ाने की चेतावनी दे रहे हैं। अमेरिकी वित्त मंत्री स्टीवन न्यूचिन ने कहा कि अगर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस महीने के अंत में होने वाले जी-20 देशों के राष्ट्र प्रमुखों के शिखर सम्मेलन के दौरान किसी सहमति पर पहुंचने में सफल नहीं रहते हैं तो अमेरिका चीन पर अतिरिक्त शुल्क लगा सकता है।
इस शिखर बैठक में अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की प्रमुख क्रिस्टीन लेगार्ड ने कहा कि अमेरिका और चीन के द्वारा एक-दूसरे पर शुल्क वृद्धि से वर्ष 2020 में वैश्विक जीडीपी में 0.5 प्रतिशत या करीब 455 अरब डॉलर की कमी आ सकती है। भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि टिकाऊ तरीके से व्यापार को बढ़ावा देने तथा रोजगार सृजन तेज करने के लिए विकासशील देशों में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) को समर्थन देने की जरूरत है। विकासशील देशों में एमएसएमई की बेहतर भागीदारी को समर्थन देना रोजगार एवं आय सृजन के लिए महत्वपूर्ण है। इस शिखर बैठक में वैश्विक मतभेदों के बीच गहन परिचर्चा के बाद जी-20 के वित्तमंत्रियों और केंद्रीय बैंक के प्रमुखों ने अंतिम बयान में कहा कि वे 2020 तक ट्रेड वार को रोकने की सहमति के आधार पर समाधान के लिए प्रयासों में तेजी लाने का हरसंभव प्रयास करेंगे।
नि:संदेह जी-20 देशों के वित्तमंत्रियों और केन्द्रीय बैंक के प्रमुखों की इस शिखर बैठक के बाद यह स्षष्ट दिखाई दे रहा है कि व्यापार युद्ध से वैश्विक अर्थव्यवस्था में जोखिम बना हुआ है। इसी परिप्रेक्ष्य में हाल ही में विश्व बैंक ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की परिदृश्य रिपोर्ट में कहा है कि अमेरिका और चीन के बीच गहराते ट्रेड वार के कारण 2019 के लिए दुनिया की पूर्व निर्धारित विकास दर 2.9 फीसदी से घटकर 2.7 फीसदी रह जाएगी और भारत की विकास दर भी पूर्व निर्धारित 7.5 फीसदी से घटकर 7 फीसदी रह जाएगी। उल्लेखनीय है कि अमेरिका ने पिछले वर्ष जनवरी 2018 में कुछ चीनी उत्पादों पर आयात शुल्क लगाकर व्यापार युद्ध की शुरुआत की। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी वस्तुओं पर आयात शुल्क लगा दिए। इस व्यापार युद्ध से भारी हानि की आशंका को देखते हुए अमेरिका व चीन ने 24 अगस्त, 2018 के बाद लगातार समाधान वार्ता आयोजित की।
लेकिन 10 मई तक इस वार्ता का कोई समाधान नहीं निकला और इस वार्ता को टूट के कगार पर देखकर अमेरिका ने 10 मई से चीन से आयातित 200 अरब डॉलर की वस्तुओं पर शुल्क की दर मौजूदा 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दी। इस पर चीन ने भी अमेरिका से आयात होने वाले 60 अरब डॉलर मूल्य की 5140 वस्तुओं पर आयात शुल्क 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 फीसदी कर देने की स्पष्ट चेतावनी दी।
ऐसे में अमेरिका और चीन के बीच तेजी से बढ़ते ट्रेड वार के खतरों से भारत को बचाना मोदी-2 सरकार की एक बड़ी चुनौती है। एक ओर चीन अपने उन उत्पादों को भारतीय बाजार में तेजी से भेजना चाहेगा, जिन पर अमेरिका में आयात शुल्क बढ़ गया है। दूसरी तरफ अमेरिका भी 5 जून से भारत को जीएसपी के लाभों से वंचित करने के बाद अब भारत के उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाकर भारत को ट्रेड वार की चपेट में ले सकता है। ऐसे में जरूरी होगा कि मोदी-2 सरकार भारत को ट्रेड वार के इन नए खतरों से बचाने और अमेरिका तथा चीन में निर्यात बढ़ने की नई संभावनाओं के मौकों को मुट्ठी में लेने की नई रणनीति बनाए।
दुनिया के अर्थ विशेषज्ञ यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि यद्यपि अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार से वैश्विक सुस्ती बढ़ेगी, लेकिन अमेरिका और चीन में भारत से निर्यात बढ़ने की संभावनाओं के नए मौके निर्मित होंगे। वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ की यह अध्ययन रिपोर्ट प्रस्तुत हुई है कि चालू वित्त वर्ष 2019-20 में अमेरिका व चीन के ट्रेड वार के कारण इन दोनों देशों में भारत से 3.5 फीसदी निर्यात बढ़ेंगे। विदेश व्यापार विशेषज्ञों का मत है कि अमेरिका से चीन में अमेरिकी सामानों की आवक घटने पर भारत चीन को करीब 100 उत्पादों की आपूर्ति बड़े पैमाने पर कर सकता है। इनमें तंबाकू, ताजा अंगूर, रबर, गोंद, ल्युब्रिकेंट्स, सोयाबीन, आयल, अलाय स्टील, कॉटन, बादाम, अखरोट, कृषि उत्पाद, विभिन्न रसायन आदि शामिल हैं।
उल्लेखनीय है कि पिछले कई वर्षों से चीन के साथ छलांगें लगाकर बढ़ता हुआ व्यापार घाटा भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। पिछले वर्ष भारत से चीन का निर्यात बढ़कर 18 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो वर्ष 2017-18 में 13 अरब डॉलर था। इतना ही नहीं, चीन से भारत का आयात भी 75 अरब डॉलर से कम होकर 70 अरब डॉलर रह गया। ऐसे में अमेरिका और चीन के ट्रेड वार के बीच भारत से चीन को निर्यात बढ़ने की संभावनाओं से भारत-चीन व्यापार घाटे में और कमी आएगी। इसी तरह अमेरिका में चीनी उत्पादों पर आयात शुल्क संबंधी प्रतिबंधों के कारण अमेरिका में चीनी उत्पादों की आमद घट जाएगी। ऐसे में भारत अमेरिका में मशीनरी, इलेक्िट्रकल उपकरण, वाहन, परिवहन कलपुर्जे, रसायन, प्लास्टिक, रबड़ जैसे उत्पादों का बड़े पैमाने पर निर्यात बढ़ा सकता है। भारत अमेरिका को टेक्सटाइल, गारमेंट और जेम्स-ज्वैलरी का निर्यात भी बढ़ा सकता है।

जयंतीलाल भंडारी

यद्यपि अमेरिका में भारत के निर्यात की नयी संभावनाएं हैं लेकिन यह जरूरी है कि भारत के अमेरिका के साथ व्यापार मतभेदों का उपयुक्त समाधान हो। भारत अभी अमेरिका का 13वां बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट है। जबकि भारत का सबसे ज्यादा निर्यात अमेरिका को होता है। नि:संदेह भारत का यह एक सराहनीय कूटनीतिक कदम है कि भारत में अमेरिका से आयातित बादाम, अखरोट और दालों समेत 29 वस्तुओं पर जवाबी शुल्क लगाने की समय सीमा को लगातार आगे बढ़ाया गया है। ऐसे में भारत-अमेरिका के बीच कारोबारी तनाव को कम करने के लिए व्यापार वार्ता को आगे बढ़ाना होगा और एक उचित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना होगा।
उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसी जून माह के अंत में होने वाले जी-20 देशों के राष्ट्र प्रमुखों के शिखर सम्मेलन में दुनिया को वैश्विक व्यापार युद्ध से बचाने के लिए प्रयासरत दिखेंगे। यदि वैश्विक ट्रेड वार रुकने की संभावनाएं नहीं बन पाईं तो मोदी-2 सरकार भारत को ट्रेड वार के खतरों से बचाने तथा अमेरिका और चीन में निर्यात बढ़ाने के लिए सुनियोजित रणनीति के साथ आगे बढ़ेगी।

लेखक ख्यात अर्थशास्त्री हैं।


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