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टीचर का स्नेह भरा स्पर्श

Posted On June - 16 - 2019

सविता स्याल
उम्र के इस पड़ाव पर, जब जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव याद करती हूं तो नये विद्यालय में पहली कक्षा का प्रथम दिवस आज भी मेरे स्मृति पटल पर ऊभर आता है तथा मेरे चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कुराहट दे जाता है । मुझे रात को ही मां ने सुबह जल्दी उठने का निर्देश दे डाला और मैं शायद आधी नींद में थी तभी मुझे नहला धुला कर घुटनों तक लम्बी युनिफॉर्म पहना दी गयी ।
मेरे तेल से चुपड़े बालों में लाल रिबन लगाकर, दो चोटियां बना दी गयीं । उस दिन मां को मुझ पर कुछ अधिक प्यार आया तो उन्होंने तेल से सना हाथ मेरे चेहरे पर भी फेर दिया यानि बाल और चेहरा दोनों चमक रहे थे ।
मां ने उस दिन अपने हाथों से मुझे एक परांठा, चीनी वाली दही (जो मेरा मनपसंद खाना हुआ करता था) खिलाया तथा दो आलू के परांठे, आम के अचार के साथ टिफिन में डाल दिये । मैं सोच रही थी कि मुझे स्कूल में क्या रात तक रहना है, जो इतना सारा खाना दे दिया है । उस दिन मेरे बड़े भाई मुझे साइकिल पर बिठाकर छोड़ने गये । वहां इतने सारे बच्चे और अध्यापिकाओं को देख मैं डर गयी। इससे पहले मैं भाई साहब से घर वापिस जाने की ज़िद करूं, वह साइकिल समेत आंखों से ओझल हो गये ।
हमसे कक्षा का नाम पूछ कर पहले हमें उस कक्षा में बिठाया गया फिर एक घंटी बजी और हमें लाइन बनवा कर प्रार्थना सभा के लिये खड़ा कर दिया गया । लाइन में मैं चौथे नम्बर पर खड़ी थी, इतने में एक मोटी सी लड़की आयी और मुझे धक्का दे मेरे आगे खड़ी हो गयी । मुझे गुस्सा आया लेकिन चलने से पहले मां की दी हुई सीख याद आ गयी, उस दिन मैंने अपने स्वभाव के विपरीत उसे धक्का नहीं दिया और संभल कर खड़ी हो गयी ।
प्रार्थना सभा में प्रिंसिपल मैडम ने लम्बा चौड़ा भाषण दिया जो मुझे समझ नहीं आया । मैं इधर , उधर, चारों और अज़नबी चेहरे देख डर रही थी । लग रहा था मम्मी, पापा ने मुझे जंग के मैदान में अकेला छोड़ दिया है। मैं मन ही मन सोच रही थी, शायद मैं कभी कभी उनकी बात नहीं मानती थी इसलिए सज़ा के रूप में मुझे यहां भेज दिया गया है ।
कक्षा में आकर मैने अपने बस्ते को कसकर पकड़, गोदी में रख लिया उस समय बस वही अपना लग रहा था । मैडम ने हाज़िरी लेनेे के लिये हमारे नाम पुकारने आरम्भ किये । अपना नाम सुन मैने कांपती आवाज में उतर दिया । मैडम ने नज़र उठा कर मुझे देखा और काम में जुट गयीं।
थोड़ी देर बाद उन्होंने अपना रजिस्टर बंद किया और अपनी सीट से उठ क्लास का चक्कर लगाना आरभ्भ कर दिया। वह मुस्कुराते हुए सबसे परिचय लेतीं, बच्चे का नाम, वह कहां रहता है, पापा क्या करते हैं आदि । उन्होंने प्यार से मेरे सिर पर भी हाथ फेरा फिर से मेरा नाम पूछा । मैडम के इस स्नेह भरे स्पर्श से मेरा सारा डर न जाने कहां उड़न छू हो गया। उस दिन कोई विशेष पढ़ाई नहीं हुई । अगले दिन क्या- क्या पुस्तकें लानी हैं, बताया गया । मैं खुशी, खुशी घर लौट आयी ।
कालान्तर शिक्षा समाप्त होने पर मैं भी अध्यापिका और उसके पश्चात प्रिसिंपल बनी।
मैने स्वयं भी इस बात का ध्यान रखा तथा अपनी सहकार्मियों को भी यही समझाया कि विद्यालय के प्रथम दिनों में अपने प्रेम एवं स्नेहमयी व्यवहार से विद्यार्थियों के डर दूर करें, उन्हें सहज अनुभव करवाये फिर शिक्षित करें ।

स्कूल का पहला दिन सभी के लिए खास होता है। लापरवाह बचपन की बेपरवाह दिनचर्या से अनुशासित जीवन की शुरुआत। आप रोये भी होंगे या पहले ही दिन नन्हे-मुन्ने सहपाठियों से हिल-मिल गये होंगे। अगर आप भी स्कूल के प्रथम दिन की कुछ ऐसी खट्टी-मीठी यादें लहरें के पाठकों से शेयर करना चाहते हैं तो हमें लिखिए। हमारे ई-मेल पते पर अपना फाेटो-चित्र संलग्न करना न भूलें। शब्द -संख्या 250-300 रहेगी। हमारा पता :
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