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छोटी फिल्में बड़ा दबदबा

Posted On June - 8 - 2019

असीम चक्रवर्ती
पिछले एक साल में बरेली की बर्फी, उरी, स्त्री, बधाई हो, बदला, अंधाधुन, लुका-छिपी फिल्मों की सफलता ने सबको चौंका दिया। कम बजट मूवीज़ से कामयाब हुए अभिनेता आयुष्मान खुराना भी मानते हैं कि ज्यादातर छोटी फिल्में अपने कंटेंट की वजह से बहुत कमज़ोर होती हैं तो ऐसी ही फिल्में अपने कंटेंट की वजह से हिट भी होती हैं। खुराना बताते हैं, ‘बड़ी फिल्मों का सबसे उल्लेखनीय पक्ष इसके सितारे होते हैं। दर्शकों की नज़र इनके कंटेंट की बजाय सितारों पर होती है। अमूमन सितारों का आकर्षण कई फिल्मों की कमज़ोरियों को छिपा लेता है।’
फिल्म छोटी या बड़ी नहीं
खुराना की बात बिल्कुल सही लगती है। 130 करोड़ का बिजनेस आसानी से पार करने वाली अक्षय की फिल्म ‘केसरी’ की सफलता तो यही दर्शाती है। दूसरी ओर, किसी तरह से रिलीज़ की नैया पार करने वाली इरफान की फिल्म ‘कारवां’ अच्छी फिल्म होने के बावजूद बहुत पीछे रह जाती है। ऐसे में यह सहज सवाल उठता है कि क्या बड़ी फिल्में छोटी फिल्मों पर हावी हो रही हैं।
ट्रेड विश्लेषक आमोद मेहरा इस बात को सिरे से खारिज कर देते हैं, ‘छोटी और बड़ी फिल्मों की इस तरह की कोई तुलना ही गैर-जरूरी है। असल में कोई फिल्म छोटी या बड़ी नहीं होती है। आप इन्हें अच्छी या खराब फिल्म कह सकते हैं। फिल्म अच्छी होती है तो उसे चलने से कोई रोक नहीं सकता। जहां 80 करोड़ में बनी ‘केसरी’ मात्र 130 करोड़ की कमाई कर पाती है, वहीं मुश्किल से 25 करोड़ में बनी ‘उरी’ और 20 करोड़ में बनी ‘स्त्री’ जैसी फिल्में 100 करोड़ से ज्यादा की कमाई आसानी से कर लेती हैं। ‘उरी’ ने तो 250 का बिजनेस करके अभी तक सभी को हैरान कर रखा है।’
मार्केटिंग का खेल
असल में सारा खेल मार्केटिंग का है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि फिल्म बड़े सितारों के साथ बनती तो उसकी कमाई का आंकड़ा कुछ और होता। जैसे कि ‘टोटल धमाल’ जैसी फिल्म यदि बड़े सितारों के साथ न बनती तो उसे अपने बजट के मुताबिक मुनाफा कमा कर ही संतुष्ट हो जाना पड़ता। ट्रेड पत्रिका के संपादक कहते हैं, ‘असल में फिल्मों की कमाई का गणित पिछले कुछ साल में बहुत बदला है। बॉक्स ऑफिस के चहेते हीरो की फिल्मों का टिकट खिड़की पर एक अलग ही क्रेज होता है। अगर उनकी फिल्मों में जरा भी दम हुआ तो वह अच्छी कमाई का डंका पीट कर चली जाती हैं।’ ठीक भी है फिल्मों का वह दौर अब नहीं रहा है जब एकदम नए हीरो ‘अमोल पालेकर’ की छोटी-सी बात सिल्वर जुबली मनाती थी तो दूसरी और ‘शोले’ की विजययात्रा भी जारी रहती थी।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि उस दौर में धर्मेन्द्र, शर्मिला, अमिताभ और जया जैसे बड़े सितारों की फिल्म ‘चुपके-चुपके’ को भी बड़ी फिल्म की बजाय अच्छी फिल्म कहा जाता था। दूसरी अच्छी आम फिल्मों की तरह इनकी सफलता का आंकलन भी एक अच्छी फिल्म के तौर पर होती थी।
आयाराम-गयाराम
फ्रॉड सैंया, सरबजीत, क्रेजी कुक्कर फैमिली, इश्क फॉरएवर, लवशुदा, सनम रे, सनम तेरी कसम, इश्क, जुनूनियत, नील बटा सन्नाटा, रमन राघव, हॉट तेरी दीवानगी, हवस की इंतेहा किन-किन फिल्मों का जिक्र करें। पिछले सालों में ऐसी ढेरों छोटी फिल्में हैं जो कब आई कब चली गईं, ज्यादातर सिने-प्रेमियों को याद नहीं है। छोटे बजट की फिल्म ‘उरी-द सर्जिकल स्ट्राइक’ का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन सभी को चौंका जाता है। अब तो इसके सीक्वल पर भी काम शुरू हो चुका है। वरना ज्यादातर छोटी फिल्मों की हालत आयाराम-गयाराम जैसी हो गईं। कई बार तो 2 से 5 करोड़ में बनी इन फिल्मों की लागत भी वापस नहीं आती है। मल्टीप्लेक्स के इस दौर में कई ट्रेड विश्लेषक इसके लिए काफी हद तक थियेटर वालों को जिम्मेदार ठहराते हैं।
ट्रेड पंडित बताते हैं, ‘सीमित प्रचार के साथ रिलीज होने वाली ऐसी फिल्में अमूमन माउथ पब्लिसिटी के ज़रिए ही चलती हैं। इसके लिए थोड़ा वक्त तो होना चाहिए जो ऐसी छोटी फिल्मों को बहुत कम मिलता है। खास तौर से यदि किसी बड़ी फिल्म की रिलीज डेट होती है तो ऐसी छोटी फिल्मों को बहुत बेदर्दी के साथ थियेटर से उतार दिया जाता है।’ जैसे ‘जीरो’ या ‘कलंक’ जैसी बड़ी फिल्में रिलीज़ होती हैं तो छोटी फिल्मों को दो दिन पहले ही थियेटर से उतार लिया जाता है। मगर ‘उरी’ या ‘बधाई हो’ जैसी छोटी फिल्में फिर भी बॉक्स ऑफिस के मोर्चे पर डटी रहती हैं।
बॉक्स ऑफिस पर संघर्ष
देश में जल्द ही त्योहारों का मौसम शुरू हो जाएगा। भारत के बाद पागलपंती, कबीर सिंह, सुपर-30, मेंटल है क्या, बाटला हाउस जैसी एक दर्जन से ज्यादा बड़ी फिल्में इसी साल रिलीज़ होंगी। ऐसे में छोटी फिल्मों को अपना अस्तित्व बचाने के लिए बहुत संघर्ष करना होगा। अनुराग कश्यप, दिवाकर बनर्जी आदि अलग-थलग फिल्मों के निर्देशक भले ही बड़े-बड़े दावे करते रहें उनकी फिल्में तभी चलेंगी, जब दर्शकों को पसंद आएगी। सिर्फ डिज़ाइनर क्रिटिक्स से अच्छी फिल्मों का तमगा हासिल करने से उनकी फिल्में चलने से रहीं। तमाम अच्छे सर्टिफिकेट हासिल करने के बावजूद जब कोई फिल्म नहीं चलती है तो मल्टीप्लेक्स वाले एक झटके में शो कैंसिल कर उसकी जगह ‘भारत’ या ‘कबीर’ सिंह जैसी फिल्मों को देना पसंद करेंगे। यदि आयुष्मान खुराना या कार्तिक आर्यन जैसे किसी दूसरे हीरो की कोई छोटी फिल्म चल पड़ती है तो उसका शो भला क्यों कैंसिल होगा?
विश्लेषक कहते हैं, ‘यही बात छोटी फिल्मों के निर्माताओं को अच्छी तरह से गांठ बांध लेनी चाहिए कि उनकी फिल्में क्रिटिक्स के साथ ही दर्शकों को भी पसंद आनी चाहिए।’
विषय-वस्तु का खोखलापन
वैसे छोटी फिल्मों के कई सजग दर्शक फिल्म न चलने को लेकर बहुत चिंतित है। उनके मुताबिक इन फिल्मों के विषय का खोखलापन अब खुलकर सामने आ गया है। उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा है कि वे क्यों ऐसी फिल्में बना रहे हैं। मिरानी कहते हैं, ‘पिछले एक साल में सिर्फ लव टाइटल पर एक दर्जन से ज्यादा फिल्में बन चुकी हैं। इन फिल्मों में न ही विषय-वस्तु का कोई नयापन है न ही प्रस्तुति का फिर दर्शक इन फिल्मों को क्यों देखने जाए।’ दरअसल, नये दौर के फिल्मकार अलग-थलग फिल्मों के नाम पर विषय-वस्तु की दुहाई देते रहते हैं लेकिन आम दर्शक इन्हें देखना पसंद नहीं करता है क्योंकि उसमें सिर्फ उनकी कोरी बौद्धिकता होती है जो अमूमन आम दर्शकों के सिर के ऊपर से गुज़र जाती है। यह वही दर्शक है जो ऐसी फिल्मों की बजाय ‘कबीर’ सिंह या ‘भारत’ को देखना पसंद करता है क्योंकि उन्हें ‘भारत’ जैसी शुद्ध कमर्शियल फिल्म में भी कंटेंट का अभाव महसूस नहीं होता है।
अच्छी स्कि्रप्ट की कमी
वैसे फिल्मों में अच्छी स्कि्रप्ट की कमी को शिद्दत से महसूस किया जा रहा है। फिल्मकार गुलज़ार का इस विषय पर जवाब बहुत रोचक है, ‘साहित्य के साथ सिनेमा का जुड़ाव एकदम खत्म हो गया है। हिंदी ही नहीं, आंचलिक भाषा में भी ऐसा साहित्य है, जिन पर बहुत खूबसूरत फिल्म बन सकती है।
असल में इस समय हम फिल्म तकनीक के मामले में जितना आगे बढ़े हैं, सोच के मामले में उतने आगे नहीं बढ़ पाये हैं। एक कठिन कैमरा एंगल, एक जोरदार शॉट या एडिटिंग के कमाल का मतलब सिनेमा नहीं होता है। आज फिल्म की गति एकतरफा हो गयी। निर्माण मूल्य आगे बढ़ रहा है लेकिन सोच नहीं।
लेखक की चुनौतियां
पुराने दौर में जब भी कोई लेखक किसी फिल्म की स्कि्रप्ट तैयार करता था तो दर्शकों की बात उसके जेहन में सबसे ऊपर होती थी। गुलज़ार भी इस बात को मानते हैं कि सारी फिल्में सभी दर्शकों के लिए नहीं होती हैं। उनके मुताबिक आपको पहले ही यह तय कर लेना होगा कि उक्त फिल्म आप किसके लिए बना रहे हैं। अब जैसे कि आर्ट फिल्मों को ले लीजिए, इसका एक अलग दर्शक वर्ग है। आर्ट फिल्में नहीं चलती हैं, यह कहना ठीक नहीं होगा। ऐसी फिल्में, जिनके लिए बनाई जाती हैं, उनके बीच ज़रूर चलती हैं।
वह कहते हैं, ‘जहां तक मेरी फिल्म का सवाल है, उसका टारगेट दर्शक मध्य वर्ग होता है। चूंकि मैं इसी श्रेणी में जन्मा और पला-बढ़ा। मैं उन्हें ही बहुत अच्छी तरह से जानता हूं। वे ही मुझे महसूस कर सकते हैं।’


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