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चले आइये अरुणाचल

Posted On June - 8 - 2019

अलका कौशिक
इस वर्ष बैसाख की एक सुबह मेरी ज़िंदगी में अरुणाचल का पैगाम लेकर आयी थी और धुर पूरब में बसे अरुणाचल को इस दफे जो देखा तो देखते ही रह गए हम! ‘सियांग रश 2019’ के बहाने इसके जाने कितने पहलुओं से मिल लिये। कितने मुगालते दूर हुए, कितनी गलतफहमियों से मुक्त हुए हम। सियांग पर राफ्ट लेकर उतरे और उसकी खतरनाक भंवरों में अटकते-मटकते रहे। ठीक उस पल बावरा मन पहुंच चुका था तिब्बत के कैलास पर्वत पर, जिसकी ढलानों पर से अठखेलियां करती एक धारा इसी सियांग की तो है। कुदरत भी कितनी उदार होती है न, तिब्बत में न सही, यहीं अपने हिन्दुस्तान के अरुणाचल में ही उस धारा से मिलन का योग बना दिया, जिससे पांच साल पहले कैलास परिक्रमा के दौरान मिली थी। वहां इसका नाम यारलुंग त्सांग्पो है और यहां अरुणाचल में सियांग या दिहांग जो असम में ब्रह्मपुत्र हो लेती है, फिर बांग्लादेश में जमुना (यह हमारी यमुना से अलग है) और आगे चलकर खुद को गंगा (जो पद्मा कहलाती है) में समा देती है। अपने अंतिम पड़ाव में यह मेघना हो जाती है, बांग्लादेश की मेघना और फिर अपने वजूद को भुलाकर बंगाल की खाड़ी से मिलन को आतुर हो लेती है। वैसे देश के धुर पूरब यानी अरुणाचल की यात्रा ऐसी कितनी ही नदियों की जीवन यात्रा से रूबरू कराती है। कहीं कुछ खास करने का मन हो, तो चले आइये अरुणाचल…
एक या दो उड़ानों के बाद पूर्वोत्तर के प्रवेशद्वार यानी गुवाहाटी या डिब्रूगढ़ तक पहुंचने के बाद शुरू होता है उबड़-खाबड़ सड़कों पर, कमर-तोड़ू यात्राओं का लंबा सिलसिला। पब्लिक ट्रांसपोर्ट की उम्मीद बेकार है। शेयर्ड जीप या प्राइवेट कैब से सफर आम है।
मखौल नहीं पूर्वोत्तर पहुंचना
आंखों में नींद की खुमारी और दिल में उठती हिलोरों को किसी तरह लादे हमने गुवाहाटी हवाई अड्डे के लिए परवाज़ भरी। मालूम था कि सफर लंबा होने जा रहा था, मखौल नहीं है पूर्वोत्तर पहुंचना। सवेरे सात बजे की उड़ान ढाई घंटे आकाश में टहलने के बाद गुवाहाटी लायी थी और यहां से आगे इनोवा की सवारी पहले से तय थी। ईटानगर तक पहुंचने में पूरा दिन लग गया और रात के 8 बजे जब होटल में शरण ली तो अंधेरा खूब गाढ़ा हो आया था। दरअसल, पूरब की इस धरती पर शाम के साढ़े चार बजते-बजाते सूरज बाबा की पालकी उठ लेती है और पांच बजे तक तो पूरी रात घिर आती है। दिन और रात के पहर यहां आते ही गडमड हो लेते हैं। उस पर वह क्षितिज के उस पार डूबा सूरज का गोला भी तो ठीक बारह घंटे गायब रहने के बाद मचलने लगता है और सवेरे चार-सवा चार बजे तक नए दिन का घंटा बजा देता है। शुरू के 4-5 दिन तो सूरज की मनमानियों को समझने में ही गुजर जाते हैं और आप सहज ही पूछ बैठते हैं कि आखिर इस धरती पर एक अलग टाइमज़ोन क्यों नहीं होना चाहिए?
धुर पूरब में कुदरत ने सौंदर्य का जो रूप धरा है, वैसा और कहां! उस पर वहां तक पहुंचने की जद्दोजहद, दूरियां, आधी-अधूरी जानकारी जो सही कम, गलत ज्यादा होती है और मौसमों से लेकर रिवायतों तक पर पड़े वैसे ही कुहरे-कुहासे जैसे इस तरफ पूर्वी हिमालय की पहाड़ियों पर यकायक जमा होते हैं, पूरे सफर के रोमांच को चौगुना कर डालते हैं। पूर्वोत्तर की सात सखियों में से अरुणाचल हमने चुन लिया था जो हिन्दुस्तान का इकलौता ऐसा राज्य है, जिसमें घुसने के लिए हम हिन्दुस्तानियों को भी परमिट लेना पड़ता है! हालांकि, यह काम ज्यादा मुश्किल या महंगा नहीं है, लेकिन खामख्वाह की ज़रूरत तो है जो हमारी आवारगी शुरू होने से पहले ही हमसे आ लिपटी थी। बहरहाल, टूर ऑपरेटर को अपना परिचय-पत्र, ईमेल से भेजकर इसका आसानी से इंतज़ाम हो जाता है। वरना, पूर्वोत्तर के प्रवेशद्वार यानी असम में गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ या अरुणाचल प्रदेश में ईटानगर के नज़दीक नाहरलगुन स्टे‍शन पर पहुंचकर भी इसे बनवाया जा सकता है।
उत्सवों-रीतियों की धरती पर
बैसाखी पर ईटानगर पहुंचने का कोई जोड़-तोड़ शायद किस्मत मेरे नाम कर चुकी है। असम से सटा होने की वजह से राजधानी का यह हिस्सा बिहु राग गुनगुना रहा था। मेरी कार की खिड़की के उस पार परंपराओं में लिपटे बदन थे जो फसल कटाई के प्रतीक इस बिहु उत्सव के उल्लास में नृत्य-गीत में मगन थे। यूं तो हमारी मंजि़ल उस रोज़ एक बौद्ध मंदिर थी, जहां सोंगरान देखने का वादा खुद से लिया था। दरअसल, यह उत्तर वालों की होली से मिलता-जुलता बौद्ध पर्व है। मठ में कतारबद्ध पुरुष श्रद्धालु बौद्ध की प्रतिमाओं को मंदिर से बाहर उठाकर ला रहे थे और देखते ही देखते छोटी-बड़ी करीब छह सौ प्रतिमाएं प्रांगण में पहुंच चुकी थी। अब पानी और फूलों से भरी अपनी नन्ही बाल्टियों से औरतें-बच्चे भगवान बुद्ध संग होली खेलने में रत थे। थाईलैंड से यहां ईटानगर तक बौद्ध परंपराओं की इस अमिट लकीर को देखकर मैं सुख के अहसास में भीग रही थी, पर्वों की धार कैसे हमें जोड़ती है सुदूर धरती से।
अब तक अरुणाचल के जनजातीय संसार से रूबरू होने की तलब बढ़ चुकी थी। हमारा कारवां आगे पापुम पारे की तरफ बढ़ चला था जो न्यीशी बहुल है। उस रोज़ संयोग से न्यीशी जनजाति का उत्सव न्योकुम मनाया जा रहा था। भाषा का अनजानापन तो था मगर न्यीशी युवतियों और युवकों की पारंपरिक पोशाकें, उनकी बेलौस हंसी, आंखों में चमक लिये आइसक्रीम-कुल्फी के स्टॉल की तरफ दौड़ लगाते बच्चों की छवियों ने मोहकता का एक अलग जाल फैलाया था। अगला पड़ाव लोअर सुबंसरी की पोन्यार नदी किनारे बसा गांव था और यहां भी न्योकुम की रौनक थी। गांव क्या था किसी संग्रहालय में सजा आदर्श ठौर था। दरअसल, पूरा का पूरा गांव ऑर्गेनिक है, घर-घर में ऑर्गेनिक खेती होती है और साफ-सफाई ऐसी कि गली-गली चकाचक है। गांव का फेरा लगाने का ख्याल बुरा नहीं था। कमोबेश हर घर के आंगन में एकाध कब्र थी। जनजातीय समाज के इन लोगों ने धर्मांतरण के बाद ईसाई धर्म अपना लिया है और मृतकों को दफन करने की परंपरा उनकी इसी आस्था का इशारा थी।
इस बीच, हम टहलकदमी करते हुए पोन्यार नदी के किनारे आ लगे थे, यहां से उस पार सड़क पर जाने के लिए बांस का झूला सेतु पर से गुजरने का ख्याल बुरा नहीं था। पूरा गांव हमें विदाई देने इस किनारे जमा था और झूलते पुल पर हमें आधे रास्ते तक छोड़ने खुद गांव प्रधान का युवा बेटा साथ हो लिया था। सत्कार की इस गर्मजोशी को संग लिए हम आगे बढ़े थे।
आपातीनी और गालो ट्राइब्स‍ की दुनिया
उस रोज़ हमारी मंजि़ल ज़ीरो घाटी थी जो अपनी पर्यावरण अनुकूल पारंपरिक खेतीबाड़ी के लिए यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची के लिए नामांकित है। ईटानगर से ज़ीरो तक करीब 120 किलोमीटर का फासला यूं तो 4-5 घंटे का है लेकिन जब राह गुजरती हो जिंदगी की रंगीनियों से होते हुए, जिसमें तीज-त्योहार और परंपराओं से साक्षात‍् मिलना तय हो तो रास्ता पूरे दस घंटे लंबा हो जाता है। ज़ीरो ने अपने संगीत उत्सव को लेकर नाम कमाया है। मगर, हम तो इसके कुदरती उत्सव से नैन-मटक्का करने चले आए थे। बारिश का उत्सव चालू हो चुका था और खेतों में दुहरी कमर झुकाए औरतों के सिलसिले भी जब-तब दिखने लगे थे। यहां आते-आते एक नई जनजाति से रूबरू होने का वक्त था। हम मिल रहे थे आपातीनी ट्राइब से, जिसकी बुजुर्ग औरतें अपनी नाक में बड़े-बड़े काले नोज़-प्लागों और माथे से ठोढ़ी तक पर गुदवाए गोदने को लेकर जानी जाती हैं। वैसे फोटोग्राफरों की पहली पसंद है ज़ीरो की आपातीनी औरतें और यहां के धान के खेत। इन धान के खेतों में ही मछली पालन भी होता है। है न दिलचस्प सस्टेनेबिलिटी मॉडल। यात्रा का अगला चरण सेंट्रल सियांग था, जहां एक गालो ट्राइबल परिवार के होमस्टे में रुकना तय था। कितना कुछ बोलता था वह घर। बांस और ताड़-पत्रों से तैयार पारंपरिक घर, घर के सामने खड़ी एसयूवी। पारंपरिक गाले में घर की मालकिन और बिंदास वेस्टर्न वियर में मालिक जो अगले दिन विदाई के वक्त पारंपरिक हैडगियर भी लगा चुके थे। पता चला कि हॉर्नबिल की चोंच और जंगली सूअर के लंबे, धारदार दांतों की सजावट वाला उनका हैडगियर करीब सौ वर्ष पुराना है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस विरासत को संजोए हुए है उनका परिवार। इसे इन आदिवासी समाजों के पुरुष पहना करते थे। अब सिर्फ तीज-त्योहारों के मौकों पर पहना जाता है।
दुर्गम यात्रा का प्रसाद अरुणाचल
यात्राएं ऐसी ही दुर्गम होनी चाहिए जैसी कि अरुणाचल की सड़कों को नापते हुए की जाती हैं। और उस पर अगर आप हमारी तरह जिद पकड़ लेंगे यहां की जनजातियों से, उनके घरों में जाकर मिलने की तो समझो हर दिन करीब 8-10 घंटे सड़कों पर रहना पड़ सकता है। हमारी आवारगी के हौसले तो देखिए कि पूरे दस दिन तक यूं ही सड़कों पर फिरते रहे, और हासिल? पूर्वोत्तर में मौसम की पहली बारिश में भीगे और जंगलों में जोंकों से घिरे। दिनभर नदियों की धाराएं हमसाए की तरह साथ टहला-टहली करतीं और हिमालय की सरपरस्ती में हमारा कारवां आगे बढ़ता। और फिर आखिर में जंगल में मंगल करने वाला अपना ठौर मिला पासीघाट में–एबर कंट्री रिवर कैंप, जो सियांग रश 2019 की मंजिल भी था। कौन कर सकता है सियांग किनारे खड़े घनघोर जंगल में ऐसे खुशनुमा ठिकाने की कल्पना? मगर यात्राएं मिलवाती हैं हर उस मुकाम से, जो कभी हमारी सोच में भी नहीं पहुंचा होता। दस दिनों तक हम पहाड़ों की पीठ पर टंगे जंगलों के सीनों से गुजरती पहाड़ी सड़कों पर बेखौफ बढ़ते रहे थे। कस्बाई हदों से निकलते-निकलते मोबाइल के सिग्नल दम तोड़ चुके होते थे और ऐन उस घड़ी कुदरत के दिलफरेब नज़ारे आंखों के रास्ते रूह में उतरने चले आते।
कैसे पहुंचें
हवाई मार्ग से : देश के प्रमुख शहरों से असम के गुवाहाटी या डिब्रूगढ़ के लिए उड़ानें हैं, यहां से आगे सड़क मार्ग से यात्रा
रेलमार्ग से : गुवाहाटी से नाहरलगुन तक रेलयात्रा और आगे सड़कों पर कैब से सफर
सड़क मार्ग से : अरुणाचल प्रदेश में सड़कों का जाल जरूर है, लेकिन कमर तोड़ू यात्रा के लिए तैयार रहें
कब जाएं
सर्दियां : अक्तूबर/नवंबर से फरवरी/मार्च तक
बारिश : मई/जून से सितंबर तक
गर्मियां : मार्च से मई/जून
हमारी सुनें : अरुणाचल में बारिश नहीं आसमान बरसता है, और पूरी धरती तर-बतर हो जाती है। ऐसे में लैंडस्लाइड, टूटी सड़कें, प्रमुख आकर्षणों के बंद हो जाने,जंगलों-झरनों तक पहुंचने के रास्ते खुले नहीं होने और जोंक के अलावा कीटों-सांपों आदि के खतरों के चलते ट्रैकिंग समेत पर्यटन लगभग थम जाता है। आरामदायक यात्रा के लिए गर्मियों का मौसम ठीक रहता है और तापमान 20-35 डिग्री से. के बीच रहता है।
अरुणाचल में सफर करना महंगा है। हर दिन करीब 10 से 11 हजार रुपये कैब के हवाले आसानी से हो जाते हैं। उस पर दूरियां भी जालिम हैं। यहां हर दिन 8 से 10 घंटे का सड़क मार्ग से सफर मामूली है और खानपान, रहने-ठहरने की सुविधाएं लगभग बेसिक हैं। वेजीटेरियन हैं तो दिक्कतें कुछ और बढ़ जाती हैं।


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