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क्षेत्रीय दलों की सीमाएं और संभावनाएं

Posted On June - 12 - 2019

केंद्रीय सत्ता के लिए हुए सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव के परिणाम हार-जीत से इतर भी कुछ राजनीतिक संकेत देते हैं, जिन्हें निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दबाजी के बिना भी समझने की जरूरत है। चुनाव पूर्व से लेकर मतगणना तक कई क्षत्रप और क्षेत्रीय दल जिस तरह किंग या किंगमेकर बनने की कवायद करते रहे, उससे एक बार फिर वैसी गठबंधन सरकार की आशंका गहराने लगी थी, जिसका आधार न्यूनतम कार्यक्रम कम, अधिकतम लूट की छूट ज्यादा रहता है। सरकार अब भी गठबंधन यानी राजग की ही बनी है, लेकिन भाजपा को फिर अकेलेदम ही बहुमत मिल जाने के बाद सहयोगी दलों के दबाव की संभावना लगभग खत्म हो गयी है। बेशक पिछली बार महज दो सीटों पर सिमट गये जद-यू को राजग में वापसी के बाद इस बार 16 लोकसभा सीटों पर जीत मिली है। भाजपा के सबसे पुराने राजनीतिक मित्रों में शुमार शिवसेना को भी 18 सीटें मिली हैं। उधर कांग्रेस के साथ गठबंधन करने वाले द्रमुक ने तमिलनाडु में शानदार प्रदर्शन किया है तो भाजपा की तमाम कोशिशों के बावजूद बंगाल में भी लोकसभा सीटों का बड़ा हिस्सा ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की ही झोली में गया है। लगातार पांचवीं बार ओडिशा का मुख्यमंत्री बनने वाले नवीन पटनायक के बीजू जनता दल ने विधानसभा के साथ-साथ लोकसभा में भी अच्छा प्रदर्शन किया है, लेकिन शेष देश में चुनाव परिणाम क्षेत्रीय दलों के लिए खतरे की घंटी बजाने वाले हैं।
निश्चय ही पांच राज्यों में क्षेत्रीय दलों के दमदार चुनावी प्रदर्शन के मद्देनजर सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव परिणामों को क्षेत्रीय राजनीति का विदाई संकेत मानना जल्दबाजी होगी। इसलिए भी कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस अब भी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में नजर नहीं आती, लेकिन देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब तक, खासकर उत्तर भारत में क्षेत्रीय दलों को मतदाताओं ने जिस तरह नकारा है, वह बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेतक लगता है। उत्तर प्रदेश पर दो दशक से भी ज्यादा समय तक सपा-बसपा सरीखे क्षेत्रीय दलों का राजनीतिक वर्चस्व रहा। दोनों ही दल कम से कम एक-एक बार अकेलेदम ही बहुमत हासिल कर भी सत्ता में आये। लगा कि केंद्रीय सत्ता का रास्ता जिस उत्तर प्रदेश से निकलता रहा, उसने राष्ट्रीय दलों को अलविदा कह दिया है, लेकिन वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर ने तमाम सामाजिक-राजनीतिक समीकरण ध्वस्त कर राज्य की कुल 80 लोकसभा सीटों में से अकेलेदम 71 और सहयोगियों के साथ मिलकर 73 सीटें जीत लीं। सत्तारूढ़ सपा महज पांच सीटों पर सिमट गयी तो बसपा का खाता तक नहीं खुला। वह मतदाताओं के बदलते मूड का ही संकेतक था, लेकिन मोदी लहर में उसे पढ़ने-समझने की अपेक्षित कोशिश नहीं की गयी। आश्चर्यजनक रूप से वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भी मोदी लहर सपा-बसपा के परंपरागत जनाधार पर भारी पड़ी।
हालांकि इस बार लोकसभा चुनाव में वैसी मोदी लहर नहीं दिख रही थी, लेकिन उपचुनाव नतीजों में गठबंधन के प्रयोग से उत्साहित सपा-बसपा ने मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया। राष्ट्रीय दल होने के चलते महज दो सीटों की पेशकश को कांग्रेस ने तो अपमानजनक माना, पर अजित सिंह का रालोद तीन सीटें लेकर इस गठबंधन में शामिल हो गया, लेकिन उपचुनाव के उलट आम चुनाव में यह गठबंधन जनादेश पाने में नाकाम रहा। प्रधानमंत्री पद की स्वयंभू प्रत्याशी मायावती ने आश्चर्यजनक रूप से पता भी लगा लिया कि सपा का वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं हुआ। जबकि सच यह है कि सपा पिछले चुनाव जितनी पांच सीटों तक ही सीमित रही, जबकि बसपा शून्य से 10 सीटों पर पहुंच गयी। अपने विश्लेषण के आधार पर ही मायावती ने एकतरफा ऐलान कर दिया कि लंबे अंतराल के बाद बसपा उपचुनाव न सिर्फ लड़ेगी, बल्कि अकेले ही लड़ेगी। ऐसे में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के पास भी अकेले ही उपचुनाव लड़ने के जवाबी ऐलान के अलावा विकल्प भी क्या बचा था। हां, रालोद ने उसे सांत्वना देते हुए अवश्य कहा है कि उसका गठबंधन सपा के साथ था, और रहेगा।
बड़े गठबंधन की विफलता के बाद छोटा गठबंधन या अकेली बसपा क्या करिश्मा कर पायेगी? दरअसल यह सवाल इसलिए भी कि उत्तर प्रदेश ही नहीं, बिहार में भी महागठबंधन और भी बुरी तरह नाकाम रहा। वहां लालू यादव के राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन में कांग्रेस के अलावा उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा और जीतन राम मांझी का हम भी शामिल था, लेकिन खाता तक नहीं खुला। राज्य की 40 में से 39 लोकसभा सीटों पर राजग ने कब्जा कर लिया। इनमें से 16 सीटें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दल-यूनाइटेड और 6 सीटें रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी को मिली हैं। जनता दल के अंतर्कलह का फायदा उठाते हुए दिग्गजों को पछाड़ कर 1990 में बिहार का मुख्यमंत्री बने लालू यादव ने 1997 में 17 सांसदों के साथ अपना अलग राष्ट्रीय जनता दल बना लिया था। उसके बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि बिहार में उनके दल को एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली। राजद का यह हश्र तब और भी चौंकाने वाला लगता है, जब विधानसभा में 81 सीटों के साथ वह अब भी सबसे बड़ा दल हो।
अब जरा हरियाणा-पंजाब का हाल देखिए। वर्ष 2014 में मोदी लहर के चलते लोकसभा की 10 में से सात सीटें जीतने के चार महीने बाद भाजपा ने अकेलेदम हरियाणा की सत्ता हासिल कर सभी को चौंका दिया था, लेकिन तब भी 10 साल तक सत्ता में रही कांग्रेस को हाशिये पर धकेल कर इनेलो लोकसभा की दो सीटें और फिर विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा पाने में सफल रहा था। हालिया लोकसभा चुनाव में पासा पूरी तरह पलट गया। भाजपा सभी 10 लोकसभा सीटें जीतने में सफल रही। नौ सीटों पर कांग्रेस ने उसे टक्कर दी, जबकि सत्ता महत्वाकांक्षाओं के चलते इनेलो और चौटाला परिवार टूटने से अस्तित्व में आयी जजपा मात्र एक सीट पर उसे टक्कर दे पायी। शेष सभी सीटों पर इनेलो और जजपा, दोनों के ही प्रत्याशियों की जमानत भी जब्त हो गयी। इन दोनों से बेहतर प्रदर्शन तो भाजपा के बागी सांसद राजकुमार सैनी की लोसुपा और मायावती की बसपा के गठबंधन का रहा, जो अब टूट चुका है। दिल्ली में ऐसा ही हश्र सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी का हुआ, जो जीत तो दूर, सात में से मात्र एक लोकसभा सीट पर ही मुख्य मुकाबले में आ पायी। उधर पंजाब में 10 साल तक भाजपा के साथ मिलकर गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर चुका शिरोमणि अकाली दल इस बार महज दो लोकसभा सीटों पर सिमट गया। पिछले विधानसभा चुनाव में हार के साथ ही अकाली दल मुख्य विपक्षी दल की दौड़ में भी आम आदमी पार्टी से पिछड़ गया था, जबकि सत्ता कैप्टन अमरेंद्र सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस के हिस्से आयी थी।

राजकुमार सिंह

कभी सत्ता शीर्ष पर रहे क्षेत्रीय दलों का ऐसा नकार क्या मतदाताओं, खासकर युवाओं द्वारा इनकी परिवार केंद्रित राजनीति तथा जाति, वर्ग, क्षेत्र की संकीर्ण सोच को खारिज कर दिया जाना ही नहीं है? प्रथम दृष्टया ऐसा ही लगता है, लेकिन जद-यू, लोजपा, बीजद और तृणमूल की चुनावी सफलता अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से रोकती है, पर सही निष्कर्ष के लिए इन क्षेत्रीय दलों में भी फर्क समझना होगा। पासवान को फिलहाल अपवाद मान लें तो नीतीश और ममता पर अभी जाति, वर्ग, क्षेत्र की संकीर्णता का ठप्पा नहीं लगा है, जबकि नवीन पटनायक की राजनीतिक एवं प्रशासनिक कुशलता किसी के लिए भी बड़ी चुनौती है, लेकिन क्षेत्रीय दलों-क्षत्रपों के लिए यह आत्मचिंतन की घड़ी तो निश्चय ही है।

journalistrksingh@gmail.com


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