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कार्यस्थल पर सुरक्षित माहौल

Posted On June - 16 - 2019

मधु गोयल
वैसे तो महिलाएं हर क्षेत्र में कामयाबी दर्ज करा रही हैं। बदलते वक्त के साथ उनकी भूमिकाएं भी बदली हैं। फिर भी काफी महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं हैं। ज्यादा से ज्यादा महिलाएं सार्वजनिक क्षेत्रों में सक्रिय रूप से भाग ले पाएं इसके लिये वर्कप्लेस पर उनकी सुरक्षा विशेष रूप से ज़रूरी है। इसी को ध्यान में रखते हुए सेक्सुअल ह्रासमेंट ऑफ वीमेन एक्ट वर्कप्लेस (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) एक्ट 2013 बनाया गया है। आइए जानते हैं एडवोकेट सुमित बत्रा (हाईकोर्ट, दिल्ली) से इसके बारे में।
महिलाओं के लिए इस एक्ट की क्यों जरूरत पड़ी?
वर्कप्लेस पर महिलाओं से होने वाली छेड़खानी यह सेक्सुअल ह्रासमेंट को रोकने के लिए यह एक्ट बनाया गया है। शुरू में तो यह सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गाइडलाइंस के रूप में बनाया गया था लेकिन बाद में केंद्रीय सरकार ने 2013 में कानून बना दिया जिसके तहत बहुत सी सीमाएं तय की गई।
वह सीमाएं क्या है?
सीमाओं के तहत आते हैं- एंप्लॉयर की जिम्मेदारी, ऐसे किसी भी केस के खिलाफ कार्रवाई करने की। कार्रवाई किसी भी रूप में हो सकती है चाहे वह अनुशासनात्मक हो या कानूनी।
सेक्सुअल ह्रासमेंट में किस तरह का व्यवहार असहज माना जाएगा ?
शारीरिक छेड़छाड़, स्पर्श करना, सेक्सुअल फेवर की मांग करना, महिला से जबरदस्ती, अश्लील बातें, इशारे, वीडियो दिखाना या किसी भी तरह का आपत्तिजनक व्यवहार,जो महिला को असहज लगे, इसमें शामिल है!
यह कार्य प्रणाली किस प्रकार कार्य करेगी ?
इस प्रकार की प्रणाली में हर ऑफिस में ज़रूरी है कि वह एक इंटरनल कंप्लेंट कमेटी बनाए। जिसकी अध्यक्ष या हेड महिला अधिकारी हो और यह सुनिश्चित करना होगा कि कमिटी में महिलाओं की संख्या आधे से कम न हो।
यह कौन देखेगा कि कार्य प्रणाली, सुनवाई सब कुछ सुचारू रूप से हो रहा है या नहीं ?
जिस कमेटी का गठन होगा उसका कार्य है कि साल भर में कितनी शिकायतें आईं और उनके सिलसिले में क्या कार्रवाई हुई, इसके बारे में सरकार को रिपोर्ट जमा कराना।
क्या कोई तय सीमा होती है शिकायत दर्ज कराने की ?
सेक्सुअल ह्रासमेंट की शिकायत घटना के 3 महीने के भीतर या अगर जि़लेवार तरीके से घटना घट रही है तो आखिरी घटना के 3 महीने के भीतर भी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। यदि किसी कारणवश आप उन 3 महीने के अंदर शिकायत नहीं दर्ज करा पाये तो अगले 3 महीने भी दिए जा सकते हैं।
क्या गर्भवती महिला के भी कुछ अधिकार हैं?
गर्भवती महिला को किसी भी प्रकार के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। न उसे नौकरी निकाला जा सकता है, न ही मेटरनिटी लीव लेने पर उसकी सैलरी रोकी जा सकती है। नए कानून के अनुसार, मां बनने वाली कामकाजी महिला, एम्प्लॉयर से 24 हफ्ते की पेड लीव की हकदार है।
इंटरनल कमेटी के अलावा महिला कहीं और शिकायत कर सकती हैं?
किसी भी तरह के अन्याय के खिलाफ पीड़ित महिला, राज्य महिला आयोग या राष्ट्रीय महिला आयोग का दरवाजा खटखटा सकती है।
महिलाओं के लिये और कौन सा कानूनी प्रावधान है?
महिला किसी भी तरह की फ्री कानूनी मदद पाने की हकदार है।
वह अदालत से सरकारी खर्च पर वकील की याचिका भी दर्ज करा सकती है।


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