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एवरेस्ट जानलेवा जुनून

Posted On June - 9 - 2019

अभिषेक कुमार सिंह
इंसान के धैर्य व सहनशक्ति की परीक्षा लेने वाली दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी—एवरेस्ट एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हाल ही में सामने आए तथ्य से पता चला कि इस सीजन की शुरुआत में ही एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले पर्वतारोहियों में से 10 की मौत हो गई थी। इनमें 4 भारतीय थे, जबकि नेपाल, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के एक-एक पर्वतारोही ने वहां जान गंवाई। यह मई का तीसरा हफ्ता था। इससे अगले हफ्ते तक थकान, कमजोरी और ऑक्सीजन की कमी के कारण एवरेस्ट पर लगे जाम में फंसकर हुई मौतों की तादाद बढ़कर 18 हो गई। इन मौतों की एक बड़ी वजह नेपाल की तरफ से एवरेस्ट पर जाने वाले पर्वतारोहियों की भीड़ है, जिस कारण वहां ‘ट्रैफिक जाम’ जैसे हालात बन गए। इस वजह से उतरने में हुई देरी और मौजूद सिलेंडर में से ऑक्सीजन खत्म हो जाने से पर्वतारोहियों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। इन ज्यादातर पर्वतारोहियों की मौत पर्वतारोहण से जुड़ी समस्या के कारण नहीं, बल्कि एवरेस्ट पर अपने नाम का झंडा गाड़ने के बाद उतराई के दौरान हुई। उतरते वक्त लगे जाम में फंस जाने के कारण अतिशय थकान उन्हें मौत के मुंह में ले गई क्योंकि वहां की विरल हवा और भयानक ठंड वाली आठ किलोमीटर से ज्यादा ऊंचाई पर उन्हें कई घंटे एक ही जगह खड़े-खड़े गुज़ारने पड़ गए।
एवरेस्ट पर जमा भीड़ का जो दृश्य है, हाल में वह एक पर्वतारोही निर्मला पुरजा की ली गई तस्वीरों से दुनिया के सामने आया है, जिसमें एवरेस्ट के रास्ते में लंबी कतारें नज़र आ रही हैं। इससे पहले वर्ष 2012 में भी ऐसी ही एक तस्वीर जर्मनी के पर्वतारोही राल्फ दुज्मोवित्स ने सामने रखी थी। एवरेस्ट पर भीड़ जुटने की दो अहम वजहें हैं। पहली यह है कि नेपाल की तरफ से इस पर्वत चोटी को फतह करना आसान है और दूसरे, अपनी अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाने के लिए नेपाल किसी पर्वतारोही को वहां जाने से रोकता नहीं है। बता दें कि इस साल नेपाल ने प्रति परमिट 11 हजार डॉलर के हिसाब 381 परमिट जारी किए हैं, जो वहां लगे ट्रैफिक जाम की मुख्य वजह है। एक अन्य कारण यह है कि एवरेस्ट पर चढ़ाई के लिए साफ मौसम मिलना बड़ा संयोग होता है। इस वजह से ज्यादातर पर्वतारोही एक ही वक्त में एवरेस्ट के लिए कूच करते हैं।
बेशक, एवरेस्ट का आरोहण नेपाल की अर्थव्यवस्था का अहम आधार है पर दुर्घटनाओं और प्रकृति से छेड़छाड़ के मुद्दे पर इस इंसानी जि़द की आलोचना होती रही है और मांग उठती रही है कि अब एवरेस्ट पर रहम करना चाहिए। हादसे एवरेस्ट के लिए नए नहीं हैं। ट्रैफिक जाम के अलावा कई अन्य कारणों से भी लोग एवरेस्ट की राह में जान गंवाते हैं। जैसे छह साल पहले 18 अप्रैल, 2014 को इसके बेस कैंप पर ही 16 शेरपाओं की हिमस्खलन से मौत हो गई थी। इसके अलावा देश-विदेश के कई पर्वतारोही इसके रास्तों से लापता बताए गए थे। इसके बाद वर्ष 2015 में आए भूकंप में जहां पूरे नेपाल में करीब 9000 मौतें हुई थीं तो एवरेस्ट के बेस कैंप के एवलांच में दबने से 18 पर्वतारोहियों और गाइडों ने जान गंवाई थी। हालांकि, इन घटनाओं की वजह से वर्ष 2015 में नेपाल के कुल पर्यटन में 31 फीसदी की कमी आई थी तो एवरेस्ट पर जाने वालों की संख्या में भी 95 प्रतिशत तक गिरावट आ गई थी। लेकिन जिस एवरेस्ट को सर एडमंड हिलेरी और शेरपा तेनजिंग ने 1953 में फतह कर लिया था, उस पर आरोहण के संकल्प को दुनिया छोड़ने को तैयार नहीं है। पर्यावरणविद लगातार चेता रहे हैं कि एवरेस्ट पर बढ़ रहे दबाव, पर्यावरण के साथ हो रही छेड़छाड़ के नतीजे हैं कि ग्लेशियर टूट रहे हैं और जलजलों की ज़मीन तैयार हो रही है।
हर कोई कर रहा है चोटी का रुख़
असल में, इंसान जिन महान चुनौतियों को पार कर जाना चाहता है, उनमें से एवरेस्ट अव्वल नंबर पर आता है। आज से 65-70 साल पहले एवरेस्ट को छूना अवश्य कठिन था, लेकिन अब पहाड़ पर चढ़ने वाला कोई शौकिया पर्वतारोही भी अगर चाहे, तो ऐसा कर सकता है। सिर्फ आर्थिक बाधाएं ही उसका रास्ता रोक सकती हैं। एक बार इस चोटी को छू लिए जाने के बाद दुनिया जान गई है कि एवरेस्ट पर पहुंचना उतना कठिन नहीं है, जितना पहले सोचा जाता था। तकनीकी विकास ने पर्वतारोहियों की मुश्किलें आसान की हैं, लेकिन इसका नतीजा यह निकला है कि एवरेस्ट की ओर दौड़ लगाने वालों की संख्या में हैरतअंगेज इजाफा ही होता रहा है। तमाम दुर्घटनाओं के अलावा पर्वत पर चढ़ने और उतरने के दौरान 300 से ज्यादा जि़दगियां लीलने वाली ‘मौत के मैदान’ की संज्ञा पा चुकी इस पर्वत चोटी पर लगने वाली भीड़ कम होने की जगह दिनोंदिन बढ़ती ही गई है। सबसे युवा, सबसे वृद्ध, बिना ऑक्सीजन के और सबसे कम समय में एवरेस्ट की चुनौती को अंगूठा दिखाने और नए से नए रिकॉर्ड रचने की लालसा वहां ट्रैफिक जाम का दृश्य उपस्थित कर रही है। 8,850 मीटर ऊंची इस पर्वत चोटी पर आज की तारीख में चार दर्जन से अधिक देशों के करीब 2 हजार लोग अपने पांवों की छाप जरूर छोड़ चुके हैं, लगभग रोज़ ही इस पर पहुंचने के नए से नए कीर्तिमान भी बन रहे हैं, लेकिन क्या मानव को इसी मुकाम की तलाश थी?
पैसा बनाम कचरा
एवरेस्ट अभियान पर जाने वाले प्रत्येक पर्वतारोही से परमिट के 11 हजार डॉलर लेने के अलावा कई अन्य खर्चों से नेपाल की अर्थव्यवस्था को फायदा होता है। साथ में सामान ढोकर ले जाने वाले शेरपाओं की भरपूर कमाई होती है, खुद नेपाली शेरपा भी दर्जनों बार इस कारण एवरेस्ट को फतह कर डालते हैं। हाल ही में, 49 साल के कामी रीता शेरपा ने 1994 के बाद से अब तक 24 बार एवरेस्ट पहुंचने का रिकॉर्ड बना डाला है। जहां तक कमाई का प्रश्न है तो एवरेस्ट जाने वालों की वजह से नेपाल को सच में बड़ी राहत मिलती होगी। लेकिन एवरेस्ट फतह की यह लालसा प्रकृति के साथ खिलवाड़ भी है। सन‍् 1996 तक करीब 300 टन कचरा और एवरेस्ट की राह में काल-कलवित हो गए 70-90 पर्वतारोहियों के शव वापस लाए जाने के बाद भी सौ टन से ज्यादा कचरा इसकी ढलानों पर बिखरा हुआ है। यहां-वहां बिखरे खाली ऑक्सीजन सिलेंडर, मास्क, कपड़ों के चिथड़े, दस्ताने, खाद्य-सामग्री के डिब्बों के खोल, बोतलें और अलग-अलग तरह का दूसरा कूड़ा-कबाड़ कुछ पर्वतारोहियों की नादानी का ही विद्रूप प्रदर्शन लगता है। अत्यधिक ठंड के कारण यह कचरा सड़ता नहीं है, ऐसे में एवरेस्ट के लिए व्यावसायिक अभियानों व पर्वतारोहियों द्वारा फैलाये जा रहे कचरे से दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत की आबोहवा बिगड़ रही है। इस स्थिति को पर्यावरण-प्रेमी चिंताजनक बता रहे हैं। इस कचरे के निस्तारण की कोई अंतिम व्यवस्था नहीं हो पाई है। यह स्थिति तब है, जबकि नेपाल सरकार किसी भी छह सदस्यीय एक दल से चार हजार डॉलर इसकी साफ-सफाई के उद्देश्य से ही अग्रिम राशि के तौर पर सुरक्षित रखती है।
नौसिखिये भी चढ़ रहे हैं एवरेस्ट पर
यह समस्या बड़ी परेशानी इसलिए पैदा कर रही है, क्योंकि अब एवरेस्ट पर ऐसे नौसिखिए भी तकनीक और साधनों के बल पर चढ़ने का प्रयत्न करते हैं, जिनका दम शायद अपने बूते पर किसी छोटे पहाड़ पर चढ़ने पर ही फूल जाए। ऐसे अधिकांश पर्वतारोही नहीं जानते हैं कि प्रकृति और पर्वतों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। उन्हें सिर्फ अपने सपने से लगाव है। इन चिंताओं से 1953 में पहली बार एवरेस्ट पर पहुंचने वाले सर एडमंड हिलेरी और 1975 में इस पर्वत को पार करने वाली दुनिया की पहली महिला पर्वतारोही जापान की जंको ताबेई भी वाकिफ हैं। इसी कारण वे दोनों नेपाल सरकार को कुछ साल के लिए एवरेस्ट अभियानों पर पाबंदी लगाने की सलाह दे चुके हैं।
रहम करो
एवरेस्ट की तरह कई और शीर्ष हैं, जिन्हें आदमी ने अपने पराक्रम के आगे नत-मस्तक होने को मजबूर किया है। लेकिन सवाल यह है कि इनसे उसे हासिल क्या हुआ? चांद को उसने छू तो लिया, लेकिन चांद का अभियान कितनों के निवाले छीन गया। क्या इसका हिसाब कभी लगाया गया है। जो धन पराक्रम की सनक के प्रदर्शन में बह गया, क्या उससे किसी बेघर की छत और उसकी दो जून रोटी का इंतजाम नहीं हो सकता था? इस तर्क को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं कर दिया जाना चाहिए कि कुछ शिखरों को छूना इसलिए जरूरी होता है कि इससे मानव की ताकत और उसके साहस का ठीक-ठीक मापन हो जाता है। प्रकृति के कुछ रहस्य बूझ लिए जाते हैं और तिलिस्मों का तोड़ निकाल लिया जाता है। यह तर्क सही नहीं है। क्योंकि ऐसा ही हुआ होता, तो आज हम यह भली-भांति जानते कि चक्रवाती तूफानों को रोकने का सही उपाय क्या है?
पर्यावरणविदों की चिंता
इस बारे में तेनजिंग नोर्गे के पुत्र जामलिंग ने अपने पिता के एक बयान को एक जगह उद्धृत किया है कि ‘मैं पर्वत पर इसलिए चढ़ता हूं, ताकि मेरे बच्चों को कभी इस पर न चढ़ना पड़े।’ अपने बच्चों के अच्छे जीवन की लालसा में कहे गए इस वक्तव्य से साफ है कि मानव का असली लक्ष्य बेहतर जीवन की तलाश है। इंसान के धैर्य व सहनशक्ति की परीक्षा लेने वाली दुनिया की सबसे ऊंची चोटी का मूल स्वरूप बरकरार रखना सबसे बड़ी चुनौती है। इसके लिए दुनियाभर के पर्यावरणविद् चिंतित भी हैं। सही मायनों में इस शिखर की विशिष्टता कायम रहनी चाहिए। इसके व्यावसायिक दोहन की प्रवृत्ति पर अंकुश तो लगाया ही जाना चाहिए। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कुदरत के नियमों में व्यवधान का खमियाज़ा आखिरकार इंसान को भुगतना पड़ता है।
यह भी तो हमला है
इंसान का अहंकार कितना बड़ा हो सकता है? इस दार्शनिक से लगते सवाल का एक प्रैक्टिकल जवाब वर्ष 2007 में चीन से मिला था, जिसने ओलंपिक आयोजन को सबसे भव्य, सबसे हैरतअंगेज़ और यादगार बनाने के लिए एवरेस्ट को भी झुकाने की कोशिश की थी। चीन ने एवरेस्ट के बेस कैंप तक 17,060 फीट की ऊंचाई पर एक पक्की रोड बना डाली थी। पहले वहां कच्चा रास्ता था, जिस पर ट्रैकिंग करते हुए पर्वतारोही बेस कैंप तक पहुंचते थे। इसी तरह अब चीन नेपाल को सड़क व रेल से जोड़ने के लिए एवरेस्ट के भीतर से ट्रैक बिछाना चाहता है। इससे पहले उसने ल्हासा (तिब्बत) तक दुनिया का सबसे ऊंचा रेल मार्ग बनाया, जिसे किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता। अब वही शगल उसे एवरेस्ट से टकराने के लिए उकसा रहा है और दुनिया के सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या किसी देश की महत्वाकांक्षा को दुनिया के हितों से भी बड़े हो जाने की छूट मिलनी चाहिए? यह रोड चीन का घरेलू मामला नहीं है, क्योंकि एवरेस्ट किसी देश की मिल्कियत नहीं है। वह कुदरत की देन है और पूरी दुनिया के लिए है। हिमालय बेहद कमउम्र और कच्ची पर्वत शृंखला है। उसकी इकोलॉजी बेहद नाजुक है और संरचना इतनी कोमल कि हल्की-सी छेड़छाड़ भी संतुलन गड़बड़ा सकती है। संसार की सबसे ऊंची चोटी की तलहटी पर सड़क बनाने और रेल ट्रैक बिछाने का मतलब है ऐसा हंगामा, जो हिमालय की छाती चीर डालेगा। आज हिमालय के ग्लेशियर सिमट रहे हैं, पहाड़ों पर दरारें पड़ रही हैं और ज़मीन खिसक रही है। इसीलिए दुनियाभर में माउंटेनियरिंग के कायदे सख्त किए जा रहे हैं, दुर्गम इलाकों में आवाजाही रोकी जा रही है और कचरा साफ करने की मुहिम चलाई जा रही है। ग्लोबल वॉर्मिंग का खतरा भी गंभीर होता जा रहा है, जो बर्फीले भूभागों को सबसे पहले निशाना बनाएगा। ऐसे में चीन के मन में ऐसे हैरतअंगेज ख्याल आ रहे हैं। इसलिए तमाम सरकारों और दुनियाभर के पर्यावरणविदों, संगठनों और जागरूक नागरिकों को फौरन एकजुट हो जाना चाहिए। एवरेस्ट के आसपास बसे भारत जैसे देशों को तो इसका पुरजोर विरोध करना ही चाहिए।
‘पीक XV’ बना एवरेस्ट
माउंट एवरेस्ट को कभी ‘पीक XV’ कहा जाता था। लेकिन वर्ष 1830 से 1843 के बीच सर्वेयर जरनल ऑफ इंडिया रहे वेल्स के जियोग्राफर कर्नल सर जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर इस पर्वत चोटी का नया नामकरण हुआ।
सबसे तेज़ चढ़ाई
एवरेस्ट पर सबसे तेज़ चढ़ाई का श्रेय ऑस्ट्रेलिया के क्रिस्टीन स्टैनगल को जाता है, जिन्होंने 2006 में इसके तीसरे बेस कैंप से शिखर तक की चढ़ाई महज़ 16 घंटे और 42 मिनट में पूरी कर ली थी। इसी तरह चोटी से बेस कैंप सबसे ज्यादा तेज़ी से वापस आने का रिकॉर्ड फ्रांस के जीन-मार्क बोइविन के नाम है। उन्होंने यह कारनामा 1988 में कर दिखाया था। उन्होंने सिर्फ 11 मिनट में ऐसा करके दिखाया था, पर यह काम उन्होंने पैरा-ग्लाइडिंग के ज़रिये किया था।
महिलाओं का दमखम
भारत की बछेंद्री पाल ने एवरेस्ट को 1984 में फतह किया था। हालांकि, ऐसा करने वाली वह दुनिया की पहली महिला नहीं हैं। यह खिताब जापान के जंको ताबेई के पास है, जो 16 मई, 1975 को एवरेस्ट पर पहुंची थीं।
यहां भी हो रहे हादसे
14 मई को शुरू हुए एवरेस्ट के सफर के इस सीज़न में अब तक कई लोग दम तोड़ चुके हैं। इनमें से 4 भारतीय हैं। एवरेस्ट ही नहीं हमारे देश की दुर्गम चोटियों पर चढ़ने के दौरान होने वाले हादसों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। हाल ही में उत्तराखंड के नंदादेवी में आठ पर्वतारोहियों का एक दल लापता हो गया। बाद में वायुसेना के तलाश अभियान के दौरान इनमें से 5 के शव पूर्वी चोटी पर मिले। ब्रिटेन के मशहूर पर्वतारोही मार्टिन मोरान के नेतृत्व में यह टीम उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में 7434 मीटर ऊंचे नंदा देवी पूर्वी चोटी पर लापता हो गई थी। जून 2018 में पश्चिम बंगाल के 9 ट्रैकर्स का एक दल रूद्रप्रयाग के पनपतिया ग्लेशियर में फंस गया था, ट्रैकर्स के साथ 12 पोर्टर और 2 गाइड भी थे, जिनमें से बाकी को तो एसडीआरएफ की टीम ने रेस्कयू कर लिया था लेकिन तब तक एक की मौत हो गई थी। 25 मई 2019 को हिमाचल के किन्नौर जिले में ट्रैकिंग पर गये 2 दल बर्फीले तूफान में फंस गये, जिनमें से कोलकाता के रहने वाले एक ट्रैकर की मौत हो गई। अप्रैल में भी ट्रैकर का एक दल कुल्लू जिले में हादसे का शिकार हो गया। इसमें गाज़ियाबाद के एक ट्रैकर की मणिकर्ण घाटी के खीरगंगा रूट पर खाई में गिरने से मौत हो गई।


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