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एकदा

Posted On June - 14 - 2019

देने का संस्कार

एक संत ने एक द्वार पर दस्तक दी और आवाज लगाई-भिक्षां देहि। एक नन्ही बालिका बाहर आई और बोली-बाबा, हम गरीब हैं, हमारे पास देने को कुछ नहीं है। संत बोले-बेटी, मना मत कर, अपने आंगन की धूल ही दे दे। लड़की ने एक मुट्ठी धूल उठाई और भिक्षा पात्र में डाल दी। शिष्य ने पूछा-गुरु जी, धूल भी कोई भिक्षा है? आपने धूल देने को क्यों कहा? संत बोले-बेटे, अगर वह आज ना कह देती तो फिर कभी नहीं दे पाती। आज धूल दी तो क्या हुआ, देने का संस्कार तो पड़ गया। आज धूल दी है, कल फल-फूल भी देगी।

प्रस्तुति : निशा सहगल


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