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आध्यात्मिक पर्यटन का बढ़ता क्रेज़

Posted On June - 30 - 2019

अभिषेक कुमार सिंह
इस साल उत्तराखंड के प्रसिद्ध धर्मस्थल केदारनाथ की आध्यात्मिकता काफी चर्चा में रही। वर्ष 2013 की 16-17 जून को हुई त्रासदी के बाद पुनर्निर्माण कार्यों की वजह से कई वर्षों तक यहां तीर्थयात्रियों की आमदरफ्त को लेकर संशय बना रहा, लेकिन बीते एकाध वर्षों में जब कुछ अवसरों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मंदिर के कपाट खुलने के दौरान वहां मौजूद रहे तो इससे यह धर्मस्थल पुनः चर्चा में आ गया। 19 मई, 2019 को उनका केदारनाथ धाम पहाड़ियों से एक किलोमीटर ऊपर स्थित रुद्र ध्यान गुफा में करीब 17 घंटे रुककर ध्यान लगाना दुनिया की निगाहों में रहा। ज्यादा चर्चा में आने के कारण गढ़वाल मंडल विकास निगम के अंतर्गत आने वाली इस गुफा की बुकिंग कुछ समय के लिए रोकी गई, लेकिन बाद में न सिर्फ गुफा में रहने और ध्यान लगाने की दरें बढ़ा दी गईं, बल्कि यह भी कहा गया कि तीर्थयात्रियों की बढ़ती मांग के मद्देनजर यहां एक ऐसी ही एक अन्य गुफा का निर्माण किया जाएगा। बढ़ी मांग का ही तकाज़ा था कि इस गुफा में ठहरने के लिए आरंभ में 990 प्रति रात किराया देना पड़ता था, लेकिन बाद में यह किराया बढ़ाकर 1500 रुपया प्रति रात से 2100 रुपये तक कर दिया गया। इस किराये के बदले यात्री को गुफा में नाश्ते- खाने समेत कई सहूलियतें भी मिलती हैं। मामला सिर्फ केदारनाथ और वहां स्थित इस रुद्र ध्यान गुफा का नहीं है, बल्कि यह ट्रेंड हमारे देश में आध्यात्मिक पर्यटन के बढ़ते महत्व का है।
गुफा का कौतूहल
पर्यटन का यह स्वरूप अरसे तक उपेक्षित रहा है और अक्सर ऐसे तीर्थस्थल इस मायने में आलोचना झेलते रहे हैं कि वहां अध्यात्म को प्रेरणा देने वाले तत्वों और आगंतुकों की आवगभत व सुख-सुविधाओं का अभाव रहता है। लेकिन अब आध्यात्मिक पर्यटन अपने पूरे रंग में है, जिसकी मिसाल इस वर्ष केदारनाथ बना जहां सीजन में साढ़े सात लाख तीर्थयात्रियों के पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।
जहां तक प्रधानमंत्री के केदारनाथ भ्रमण का मसला है, आम चुनावों के दौरान एक मौका ऐसा भी आया था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बदरीनाथ-केदारनाथ जाने और प्राकृतिक गुफा में ठहरने को सियासत करार देकर विपक्ष (तृणमूल कांग्रेस) ने चुनाव आयोग से मामले में कार्रवाई करने को कहा था, पर यदि इस वाकये को राजनीति से अलग करके देखें, तो आध्यात्मिक पर्यटन के संबंध में इसका महत्व समझ में आ जाता है।
धार्मिक महत्व की जगहों का प्रचार-प्रसार
धार्मिक महत्व की जगहों और तीर्थों का इस किस्म का प्रचार-प्रसार खालिस आध्यात्मिक ब्रांडिंग का मसला बनता है, जिससे जोड़कर कुछ अन्य प्रसिद्ध धर्मस्थलों-तीर्थों की ब्रांडिंग की मांग उठाई जाती रही है। असल में पिछले कुछ वर्षों में केदारनाथ को एक बड़े आध्यात्मिक ब्रांड के रूप में पेश करने की कोशिशें की जाती रही हैं। जैसे वर्ष 2018 में वहां भव्य लेजर शो की मार्फत केदार घाटी के पुनर्निर्माण कार्यों पर रोशनी डालने के अलावा केदारपुरी में भगवान शिव की उपस्थिति के महत्व को दर्शाया गया था। आध्यात्मिक ब्रांडिंग की जरूरत के संबंध में एक सवाल पिछले साल यूपी की योगी सरकार ने 12 अप्रैल, 2018 को जारी एक दस्तावेज में उठाया गया था कि हरिद्वार या वाराणसी की तरह भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या एक ‘बड़ा आध्यात्मिक ब्रांड’ क्यों नहीं बन पाई। पूछा गया था कि अध्यात्म का प्रमुख केंद्र होने के बावजूद इसे ‘ब्रांड इक्विटी’ के रूप में कभी प्रदर्शित क्यों नहीं किया जाता। इसका नुकसान यह बताया गया कि बदरी-केदार या हरिद्वार-ऋषिकेश की तरह अयोध्या में विदेशी ही नहीं, देश के बहुसंख्यक पर्यटकों की कोई खास दिलचस्पी नहीं है। इस मामले का खुलासा तब हुआ था, जब यूपी सरकार ने अयोध्या को अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों के लिए एक केंद्र के रूप में प्रचारित करने के लिए एक सलाहकार की नियुक्ति की थी। सलाहकार की राय पर हुए विश्लेषण से पता चला कि वर्ष 2017 में 1.7 करोड़ पर्यटक अयोध्या आए थे, जिनमें से सिर्फ 24 हज़ार विदेशी थे। इसके पीछे अहम खामी यह नज़र आई है कि अयोध्या को हरिद्वार या वाराणसी की तरह एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक ब्रांड के तौर पर नहीं लिया जाता। हरिद्वार ‘पाप धोने’ और वाराणसी ‘आध्यात्मिक मुक्ति’ दिलाने वाली जगह के रूप में मशहूर है। ऋषिकेश भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर ध्यान, योग और साधना का अहम आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है और केदारनाथ प्रधानमंत्री मोदी की वजह से काफी चर्चित हो गया, लेकिन यह ख्याति अन्य तीर्थों को प्राप्त नहीं है। हालांकि, इसकी काफी हद तक भरपाई योगी सरकार ने वर्ष 2019 में प्रयागराज में आयोजित अर्धकुंभ में कर डाली थी।
कुंभ की ब्रांडिंग
अयोध्या के लिए भी यूपी सरकार ने ऐसी ही एक परियोजना पर काम शुरू किया है, जिसका उद्देश्य अयोध्या की आध्यात्मिक ब्रांडिंग करते हुए वहां ‘हरिद्वार जैसा माहौल’ पैदा करना है। इस संबंध में राज्य सरकार के दस्तावेज़ में सुझाव दिया गया हरिद्वार की ‘हरि की पौड़ी’ की तरह है कि अयोध्या में सरयू के तट पर ‘राम की पौड़ी’ का निर्माण किया जाए। इसकी कल्पना की गई है कि सरयू नदी के किनारे राम की पौड़ी नदी तट पर लुभावना दृश्य प्रस्तुत करेगी। खासतौर पर रात की रोशनी में घंटों की आवाज़ के साथ और मंदिरों की एक पंक्ति के पीछे छिपे हुए सुंदर उद्यान अयोध्या की खूबसूरती को और बढ़ा देंगे। उल्लेखनीय है कि योगी सरकार ने 330 करोड़ रुपये की लागत से सरयू नदी के तट पर भगवान श्रीराम की 100 फीट ऊंची प्रतिमा का निर्माण कराया है और सरयू के दाहिने किनारे पर 350 करोड़ की लागत से न्यू अयोध्या क्षेत्र का विकास कार्य किया जा रहा है। इसके साथ अयोध्या में पंचकोसी परिक्रमा के लिए भी योजना तैयार की जा रही है।
तेज विकास के लिए आध्यात्मिक ब्रांडिंग
तीर्थों की आध्यात्मिक ब्रांडिंग को असल में इस नजर से देखने की जरूरत है कि इससे किसी क्षेत्र विशेष का तेज विकास होता है। देसी-विदेशी पर्यटकों की निगाह में आने से वहां रोजी-रोजगार के और सरकार की आय के विभिन्न स्रोत पैदा होते हैं। इसके कुछ और पहलू भी हैं, जिन्हें उत्तराखंड की चारधामों (बदरी, केदार, गंगोत्री, यमुनोत्री) के विकास और चारधाम यात्रा के संदर्भ में देखा जा सकता है। यूं उत्तराखंड की चारधाम यात्रा का महात्म्य सदियों से कायम है और इसी का अनुभव पाने के लिए श्रद्धालु भी इन धामों की यात्रा करते रहे हैं। हालांकि, पहले तीर्थाटन का उद्देश्य विशुद्ध धार्मिक और आध्यात्मिक था। इस प्रवृत्ति के वशीभूत हो तीर्थाटन करने वाले लोग पैदल ही चारधाम यात्रा किया करते थे। अपने पैरों से ही पर्वतों को नापने के इनाम के तौर पर तीर्थयात्रियों को अनेक प्राकृतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अनुभवों की पूंजी भी मिलती थी। तब यातायात के साधन नहीं थे। बल्कि तीस-चालीस वर्ष पूर्व तक श्रद्धालुजन चारधाम यात्रा को तभी पूर्ण मानते थे, जब वे इन पवित्र स्थानों की पैदल यात्रा कर आएं। लेकिन अब ये रीतियां प्रचलन में नहीं हैं। अब तो परिवहन व्यवसाय के कारण तीर्थाटन का तर्क भी विसंगत हो चुका है। कमाई के लालच में लोगों को वस्तुओं की तरह मोटर वाहनों में लाद कर ले जाने और लाने की प्रवृत्ति ने चारधाम यात्रा का मूल धार्मिक उद्देश्य नष्ट-भ्रष्ट हो गया है। बल्कि दावा किया जाता है कि केदारनाथ की 2013 की त्रासदी के पीछे इस किस्म का आक्रामक पर्यटन ही जिम्मेदार था। आध्यात्मिक पर्यटन से रोजगार भी पैदा हो, लेकिन प्रकृति का विनाश भी न हो, तो इसकी एक कोशिश केदार की उस गुफा में प्रधानमंत्री मोदी के एकांतवास में नज़र आती है, जिसके मूल स्वरूप को प्राकृतिक रखते हुए उसे खाने-पीने और अटेंडेंट जैसी आधुनिक सहूलियतों से जोड़ा गया है।
उत्तराखंड का विकास और चारधाम यात्रा
रोजगार के मौके पैदा करने में और स्थानीय खरीदारी को बढ़ावा देने के मामले में धार्मिक पर्यटन की काफी बड़ी भूमिका रहती है। उत्तराखंड जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था में तो प्रख्यात चारधाम यात्रा का बड़ा भारी योगदान है। ऐसे में विचार इसका होना चाहिए कि ऐसा क्या किया जाए, जिससे देश के कई तीर्थ-धर्मस्थल बड़े आध्यात्मिक ब्रांड बन जाएं और देश अपने आर्थिक विकास के लिए धार्मिक पर्यटन को अपने मुख्य एजेंडे में ले आए। इस मामले में समस्या यह है कि धार्मिक पर्यटन के खाते में आने वाली ज्यादातर जगहों पर ऐसे अभावों की एक लंबी फेहरिस्त है, जिन्हें अगर एजेंडे में लेकर सुधारा नहीं गया तो आध्यात्मिक-धार्मिक पर्यटन की सूरत शायद ही कभी बदले। यूं भारत को विभिन्न धर्मों और मतावलंबियों की मौजूदगी के कारण धर्मस्थलों का देश कहा जाता है पर इस उपाधि से जुड़ी विडंबना यह है कि हमारे ज्यादातर धर्मस्थल हर मामले में उपेक्षित ही रहे हैं। उनमें से कुछ को छोड़कर न तो वहां आने-जाने की उचित व्यवस्था की गई और न ही तीर्थयात्रियों की सुख-सुविधा के आधुनिक इंतज़ाम किए गए हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में सरकार चारधाम को रेल नेटवर्क से जोड़ने की योजना पर तेजी से काम करती दिखाई दी है लेकिन इस काम में अनेक बाधाएं आती रही हैं। इसी तरह राजस्थान के नाथद्वारा, महाराष्ट्र के शिरडी और बिहार के बोधगया जैसे प्रमुख तीर्थों के लिए कोई रेल संपर्क नहीं है। समस्या केवल रेल नेटवर्क की ही नहीं है, अभी भी धर्मस्थलों पर आने वाले यात्रियों की सहूलियत के मद्देनजर पर्याप्त प्रबंध नहीं किए जाते हैं।
तीर्थस्थलों पर मेडिकल सुविधाएं
ज्यादातर धार्मिक तीर्थस्थलों पर इस तरह के नज़ारे बेहद आम हैं। ऐसी जगहों पर मेडिकल सुविधाओं का न होना सबसे अहम समस्या है। हरिद्वार में हर की पैड़ी, राजस्थान में पुष्कर तीर्थ, दक्षिण में सबरीमाला मंदिर, यूपी में पूर्णागिरी मंदिर आदि दर्जनों ऐसे तीर्थ और धार्मिक स्थल हैं जहां पूरे साल लोगों का तांता लगा रहता है। लेकिन इन सभी जगहों पर आने वाले यात्रियों की संख्या के लिहाज से चिकित्सा के प्रबंध नहीं होते। प्राय: ज्यादातर श्रद्धालु बुजुर्ग होते हैं, जिन्हें पहाड़ों पर चढ़ते वक्त हृदय संबंधी समस्या हो जाना बेहद आम बात है। यदि चढ़ाई पर चढ़ते समय ऐसी कोई समस्या पैदा हो जाए, तो वहां भूले-भटके उपलब्ध होने वाले चिकित्सकों के पास गिनीचुनी दर्द निवारक टैबलेट ही होती है। यहां तक कि ब्लड प्रेशर नापने का यंत्र भी कई स्थानों पर नहीं होता। इस कारण होने वाली समस्याओं का एक अंदाजा इस साल 18 जून, 2019 तक चारधाम यात्रा पर गए श्रद्धालुओं में से 45 की यात्रा के दौरान हुई मौतों से हो जाता है। इनमें से ज्यादातर मौतें ऑक्सीजन की कमी और ऊंचाई व ठंड के कारण हार्ट फेल्योर से हुईं।
वित्तीय गड़बड़ी और गंदगी
देश में ज्यादातर धर्मस्थल वित्तीय गड़बड़ियों के भी शिकार रहे हैं। वहां आने वाले श्रद्धालुओं को चढ़ावे के बदले मामूली सुविधाएं तक हासिल नहीं होतीं। सबसे बड़ी बात यह है कि कुछ अपवादों को छोड़ कर जब भी इनके ट्रस्टों और बोर्डों पर सरकार अंकुश लगाने की कोशिश करती है तो वे इसे धार्मिक आस्था में दखल का मामला बताकर खारिज करने की कोशिश करते हैं। खास तौर से हिन्दू धर्मस्थलों के ट्रस्ट व बोर्ड ऐसी कोशिशों से काफी नाराज रहते हैं। वे तर्क देते हैं कि पिछले सैकड़ों वर्षों से जो पुजारी परिवार और ट्रस्ट मंदिरों की देखभाल और श्रद्धालुओं की सुविधा के इंतजाम करते रहे हैं, उन पर पहले तो कभी विवाद नहीं रहा। ऐसे तर्क देकर धार्मिक ट्रस्ट दान और चढ़ावा पाने और उनके मनमाने इस्तेमाल का अपना अधिकार नहीं खोना चाहते। इसके अलावा एक सवाल यह भी है कि क्या वे इस पैसे का इस्तेमाल आने वाले श्रद्धालुओं की सहूलियत के संबंध में करते हैं? इस संबंध में ज्यादातर ट्रस्टों और धार्मिक बोर्डों का रिकॉर्ड खराब ही है।
सफाई बने प्राथमिकता
ज्यादातर तीर्थस्थलों पर गंदगी होना भी एक अहम समस्या है। इससे हवा और पानी काफी हद तक प्रदूषित हो जाता है। लाखों-करोड़ों का चढ़ावा हासिल करने वाले धार्मिक ट्रस्टों का साफ-सफाई के मामले में भी लचर रवैया शायद इसलिए कायम है क्योंकि उन्हें लगता है कि यात्रियों की सहूलियत का जिम्मा उठाना उनका नहीं, प्रशासन का काम है। इन सारी समस्याओं का एक इलाज यह है कि एक ओर सरकार मंदिरों के कुप्रबंधन को देखते हुए उनका मैनेजमेंट अपने हाथों में ले और दूसरी तरफ उनके पर्यटन के जरिये मिलने वाले राजस्व को धर्मस्थलों के विकास में खर्च करे। इस मामले में जब सरकार विदेशी टूरिस्टों के लिए भी समान संवेदनशील रुख अपनाएगी तो इससे भारत की धार्मिक व आध्यात्मकि पर्यटन छवि को काफी फायदा होगा और प्रमुख धर्मस्थलों को आध्यात्मिक ब्रांड के रूप में स्थापित करने की उसकी कोशिशें फलीभूत हो सकेंगी। उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी के गुफा पर्यटन से देश में आध्यात्मिक पर्यटन की एक नई टेर छिड़ेगी और सैकड़ों धर्मस्थलों, तीर्थों की हालत में सुधार आएगा।


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