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अबकी बार पचास डिग्री के पार

Posted On June - 14 - 2019

तिरछी नज़र

सुधीर कुमार चौधरी
सूरज के तेवर बेहद तीखे हैं। उसकी धूप आग में तबदील हो रही है। सूरज की इस घोर असहिष्णुता से प्रकृति परेशान है। इसकी आंच में झुलसते लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। सूरज है कि पसीजने के लिए तनिक भी तैयार नहीं है।
दुनिया के सबसे गर्म 15 शहरों में से 10 भारत के हैं। शायद सूरज ने ठान लिया है कि अबकी बार पचास डिग्री पार। जिस गति से पेड़ों पर विकास की आरी चलाई गयी है, उसी गति से बेरोमीटर का पारा चढ़ रहा है। इस भीषण गर्मी में झुलसते मनुष्य को अभी भी काटे गए पेड़ों की कराहटें सुनाई नहीं दे रही हैं। सीमेंट-कंक्रीट के पिंजरों में कैद मानव को लुप्त होते जंगलों की चीखें सुनाई नहीं दे रही हैं। नदियों को प्रदूषण का जहर देकर मारता इनसान सूरज को कोसने में लगा हुआ है, लेकिन उसका जहर देना निरंतर जारी है।
अभी देश चुनाव की गर्मी से गुजरा है। अब सूरज की गर्मी से बेहाल है। अभी तक भाषणों, बयानों और गालियों के अंगारे झरते थे। अब निष्ठुर सूरज लू बरसा रहा है। तपती धरती के जख्मों पर हरियाली का मरहम लगाने वाला कोई नहीं है। सरकारी पेड़ कागजों पर ज्यादा उगते हैं। इनसे नेता-अफसरों के बंगलों में जरूर हरियाली छा जाती है लेकिन वसुंधरा की कोख सूनी ही रहती है। इनसान ड्राइंग रूम में बोन्साई पनपा कर प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है।
वातनुकूलित कमरों में कैद इनसान सूरज पर जीत का जश्न मनाने की मूर्खता करता रहता है लेकिन उसे यह समझ में नहीं आता कि किसी नगर को वाई-फाई तो किया जा सकता है लेकिन समूचा शहर एयरकंडीशंड नहीं हो सकता। विकास के अहंकार में उसे यह समझ में नहीं आता है कि पेड़ प्रकृति के नैसर्गिक एयरकंडीशनर हैं। इन्हें धराशायी करना आत्महत्या करने के समान है।
वास्तव में पेड़ धरती के प्रति मनुष्य के अपराधों के चश्मदीद गवाह होते हैं। नदियों के पास मानव की हिंसक प्रवृत्ति के सबूत होते हैं। हवाओं के भीतर इनसानी बर्बरता के विरुद्ध आक्रोश खदबदाता है। प्रकृति के कानून की गिरफ्त से बचने के लिए मानव पेड़, नदी और हवा के साक्ष्यों को मिटाने की कुचेष्टा में लिप्त रहता है। यह सब देख सूरज का पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। प्रकृति के प्रति इनसानी निष्ठुरता ने सूरज को असहिष्णु बना दिया है।
सूरज गुस्से से तप रहा है। ममतामयी प्रकृति बादलों की फुहारों से उसका रोष ठंडा करने की तैयारी में है। उधर मगरूर और स्वार्थी इनसान को आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की कोई चिंता नहीं है। वह पेड़ों की छांह, नदियों की शीतलता और हवा के आंचल की शरण में जाने की बजाय एयरकंडीशंड दड़बों में बोन्साई के तले बैठकर विकास की बेसुरी बांसुरी बजाने में तल्लीन है।


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