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लोकतंत्र के अंधेरे

Posted On May - 15 - 2019

जब हम जागेंगे तभी होगा सवेरा
देश के चुनाव पर नजर रखने वाली संस्था एडीआर-इलेक्शन वॉच द्वारा जुटाये गये तथ्यों के निष्कर्ष भारतीय लोकतंत्र के हर आस्थावान को परेशान करने वाले हैं। जो न केवल सभी राजनीतिक दलों को कठघरे में खड़ा करते हैं बल्कि यह भी बताते हैं कि अब राजनीति सेवा नहीं, मेवा हासिल करने का जरिया बन गई है। भले ही देश की विकास दर सात से आठ प्रतिशत के इर्द-गिर्द घूमती रही हो, मगर निवर्तमान सांसदों की आय में 41 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। लोकतंत्र का सबसे ज्यादा डराने वाला सच यह है कि इस बार लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों में 19 फीसदी गंभीर आपराधिक मामलों में लिप्त हैं। कुल 7928 उम्मीदवारों द्वारा चुनाव आयोग को दिये गये दस्तावेजों से संस्था द्वारा जुटाये गये आंकड़ों से पता चलता है कि 1500 उम्मीदवारों के खिलाफ गंभीर केस दर्ज हैं। इनमें 55 के खिलाफ हत्या तथा 184 के खिलाफ हत्या के प्रयास के मामले दर्ज हैं। वर्ष 2009 में जहां पंद्रह फीसदी प्रत्याशियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे, इस साल उसमें चार फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। यानी हर पांच में से एक प्रत्याशी पर गंभीर आपराधिक केस दर्ज है। दागियों को टिकट देने में भाजपा, कांग्रेस, सपा, एनसीपी व बसपा  आदि कमोबेश सभी राजनीतिक दल आगे हैं। चिंता की बात यह है कि कुल 1070 उम्मीदवारों के खिलाफ दुष्कर्म, हत्या, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे संगीन मामले उल्लेखित हैं। चिंता की बात यह है कि सत्रहवीं लोकसभा के लिये चुनाव में अब तक के सबसे ज्यादा दागी उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। यह किसी भी लोकतंत्र के लिये चिंता की बात होनी चाहिए। ये ही नेता कालांतर आपराधिक गतिविधियों को संरक्षण देकर कानून के रखवालों का मनोबल गिराते हैं। इस आसन्न संकट को लेकर जनता को ही जागरूक किया जा सकता है क्योंकि यह स्थिति कमोबेश हर राजनीतिक दल में विद्यमान है।
रिपोर्ट का दूसरा चिंताजनक पहलू यह है कि सासंदों की आमदनी दिन दूनी-रात चौगुनी गति से बढ़ी है, जिसमें सत्ता पक्ष व विपक्ष के सांसदों की बराबर की भागीदारी है। सासंदों का आर्थिक विकास 41 फीसदी की द्रुत गति से हुआ है। इस चुनाव में करीब 29 फीसदी प्रत्याशी करोड़पति हैं। वर्ष 2009 में इनका प्रतिशत 16 था। एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि लोकसभा का चुनाव लड़ रहे 338 सांसदों में 335 की औसत संपत्ति साढ़े 23 करोड़ है। यानी पिछले पांच सालों में सांसदों की औसत संपत्ति पौने सात करोड़ बढ़ी है। इस बार के आम चुनाव में भाजपा के 79 तथा कांग्रेस के 71 फीसदी उम्मीदवार करोड़पति हैं वहीं बसपा के 17 व सपा के आठ प्रत्याशी करोड़पति हैं। यानी भले ही देश के आर्थिक विकास को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष द्वारा अपने-अपने दावे किये जा रहे हों पर हकीकत यह है कि हमारे माननीय लोकतंत्र के आंगन में खूब फले-फूले हैं। हमें यह सोचना होगा कि कैसे जनप्रतिनिधियों के लिये राजनीति सेवा की जगह कमाई करने का जरिया बन गई है। यह भी कि हमारी चुनाव प्रणाली इतनी खर्चीली क्यों हो गई है। क्या चुनाव खर्च की कोई सीमा निर्धारित होनी चाहिए ताकि माननीयों को यह कहने का मौका न मिले कि वे  तो खर्चीले चुनाव के लिये संसाधन जुटाते हैं। जाहिर है कि राजनीति में कमाने की मंशा से आने वाले नेता व्यवस्था के छिद्रों का दुरुपयोग करके ही अथाह धन-संपदा जुटाते हैं। जिस पर नियंत्रण के लिये पारदर्शी सिस्टम देश की जनता की जागरूकता और अदालतों की सक्रियता से ही संभव है। यह मतदाताओं का भी आत्ममंथन का विषय होना चाहिए कि हम जातिवाद, क्षेत्रवाद व प्रांतवाद की संकीर्णताओं में फंसकर ऐसे दागियों को संसद की दहलीज तक पहुंचाते हैं जो कालांतर हमारे हितों पर ही कुठाराघात करते हैं जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में निरंतर गिरावट की वजह बनती है। बतौर एक जिम्मेदार नागरिक हमें इस जटिल समस्या के निदान के प्रति गंभीरता से सोचना होगा।


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