अंबाला में उड़ान भरते समय लड़ाकू जहाज का फ्यूल टैंक बाउंडरी वाल में फंसा, हडक़ंप  !    फरीदाबाद में जिम के बाहर कांग्रेस नेता को मारीं ताबड़तोड़ गोलियां, मौत !    जरनैल सिंह हत्याकांड में वांछित 2 और गिरफ्तार !    नगर निगम के जगाधरी जोन में 1.64 करोड़ के टेंडर जारी !    डाक कर्मचारी ने किया 16 लाख का गबन !    लारवा मिलने पर 11 को नोटिस !    बोरियों के नीचे जा छिपे 2 ठगों को लोगों ने दबोचा !    पीएमवाई के तहत नहीं मिली राशि, लोगों में रोष !    भाजपा ने किया प्रदेश को बर्बाद : तंवर !    दुष्कर्म का झूठा केस दर्ज कराने का डर दिखाकर रुपये ऐंठने वाली 2 महिलाएं, 2 युवक काबू !    

मुद्दे बनाम मोदी चुनाव में ध्रुवीकरण

Posted On May - 15 - 2019

लोकसभा चुनाव का सातवां और आखिरी चरण 19 मई को होने के बाद मतगणना 23 मई को होगी। जाहिर है, तभी पता चलेगा कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के मतदाताओं ने क्या जनादेश दिया है। आदर्श स्थिति तो यही है कि सभी राजनीतिक दल-नेता चुनाव परिणाम की प्रतीक्षा करें और फिर जनादेश के अनुरूप नयी सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो, पर चुनाव प्रचार में न्यूनतम शिष्टाचार और मर्यादा को तार-तार कर देने वालों से आदर्शों की अपेक्षा कैसी? नवगठित छोटे राज्य तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की भाजपा विरोधी ध्रुवीकरण की उतावली देखते ही बनती है। जिस आंध्र प्रदेश में से पृथक तेलंगाना राज्य बना, उसके मुख्यमंत्री एवं तेलुगू देशम के मुखिया चंद्रबाबू नायडू भी भाजपा विरोधी ध्रुवीकरण का अगुआ बनने का कोई मौका नहीं चूकना चाहते। नरेंद्र मोदी सरकार के शुरुआती वर्षों में तेलुगू देशम राजग का घटक रह चुका है। के. चंद्रशेखर राव की भी मोदी सरकार के शुरुआती दौर में भाजपा से नजदीकियां गोपनीय नहीं रहीं।
चंद्रशेखर राव तेलंगाना के चुनाव से फ्री होते ही स्वत: स्फूर्त भाव से विपक्षी एकता की कवायद में जुट गये हैं तो नायडू भी चाहते हैं कि 23 मई को मतगणना का इंतजार किये बिना, 19 मई को आखिरी चरण के मतदान के बाद ही सभी गैर भाजपा दलों की बैठक हो, लेकिन विपक्ष के दो दिग्गजों : मायावती और ममता बनर्जी ने उन्हें चुनाव परिणामों तक रुकने की सलाह दी है। फिर भी चुनाव प्रक्रिया के बीच ही नये समीकरण बनाने, दोस्त तलाशने की कवायद से कुछ स्वाभाविक सवाल तो उठते ही हैं। रही होगी कभी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की राजनीतिक-विचारधारा, नीति, सिद्धांत आधारित- पिछले कुछ दशकों से तो यह महज सत्ता का खेल बनकर रह गयी है। एक ऐसा खेल, जिसमें बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा जुटाना ही अंतिम लक्ष्य है। वह आंकड़ा नये दोस्त तलाश कर जुटाया जाये या पुराने दुश्मनों को दोस्त बनाकर अथवा विशुद्ध सौदेबाजी करके, इससे किसी को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। तभी तो यह कहावत अब नीति वाक्य की तरह दोहरायी जाने लगी है कि राजनीति में कभी कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता। यानी परिस्थितियों या जरूरतों के मुताबिक राजनीति में संबंध और समीकरण बदलते रहते हैं। अब यह असहज सवाल मत पूछिए कि फिर भला अवसरवाद क्या होता है?
सामान्यत: सत्ता के खेल में जादुई आंकड़ा जुटाने की कवायद चुनाव परिणामों के बाद ही शुरू होती है अथवा फिर पहले से यह आभास हो जाये कि चुनाव पूर्व समीकरणों से बात नहीं बनने वाली। हार-जीत का पता तो 23 मई को ही चलेगा लेकिन मतदान के शुरुआती चरणों तक यह आम धारणा रही कि 2014 जितनी स्पष्ट दिखायी न पड़ते हुए भी इन चुनावों में मोदी लहर स्वाभाविक एवं अपेक्षित चुनावी मुद्दों पर भारी पड़ रही है। मुद्दों के बजाय मोदी के नाम पर चुनाव के लिए सिर्फ भाजपा को ही दोष नहीं दिया जा सकता। अपने पिछले चुनावी वायदों और उन पर अमल की हकीकत से मुंह चुराकर नये लोकलुभावन वायदों-नारों पर वोट मांगना हमारे राजनीतिक दलों-नेताओं की फितरत ही बन गयी है। इसकी वजह समझना भी मुश्किल नहीं होना चाहिए। चुनाव जीतने के लिए स्वर्ग ही धरती पर उतार लाने के वायदे कर दिये जाते हैं, और जब अगले चुनाव में रिपोर्ट कार्ड पेश करने या जनता एवं विपक्ष द्वारा सवाल पूछे जाने का मौका आता है तो उनसे मुंह चुरा कर नये नारों-वायदों के अलावा कोई विकल्प बचता ही नहीं। इसलिए यह अनायास नहीं है कि अच्छे दिन, हर भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख, नोटबंदी और जीएसटी सरीखे मुद्दों के बजाय मोदी और भाजपा को पुलवामा-बालाकोट पर वोट मांगना ज्यादा फायदेमंद लग रहा है। यह आजमाया हुआ नुस्खा है कि बात जब राष्ट्रभक्ति और आस्था की हो, तब तर्क और सवाल के लिए जगह नहीं बचती।
तब क्या मतदान के चरण बीतते-बीतते यह आजमाया हुआ नुस्खा भी अपेक्षित चमत्कारिक परिणाम नहीं दे पा रहा? यह सवाल इसलिए भी कि गैर भाजपा दल ही नहीं, खुद भाजपा भी नये समीकरण और राजनीतिक दोस्त तलाश रही है। जिस तरह बिहार में अपनी जीती हुई सीटें भी जनता दल-यूनाइटेड को बंटवारे में दे दी गयीं या महाराष्ट्र में चिर असंतुष्ट शिवसेना को मनाया गया अथवा उत्तर प्रदेश में अपना दल सरीखे बेहद छोटे दल को भी खुश किया गया, वह मोदी और भाजपा की छवि से मेल हरगिज नहीं खाता। जाहिर है, पुलवामा-बालाकोट पर आक्रामक जोश के बावजूद 2014 वाला आत्मविश्वास नहीं है। यह सही है कि 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कुछ समय तक मोदी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मिलकर टीम इंडिया की तरह देश के सर्वांगीण विकास के लिए काम करने की बातें करते थे, लेकिन बाद में गैर भाजपा शासित राज्य का शायद ही कोई मुख्यमंत्री बचा हो, जिस पर उन्होंने मौके-बेमौके निशाना न साधा हो। समुद्री तूफान फानी से निपटने में उड़ीसा की नवीन पटनायक सरकार की प्रशंसा मोदी की उस आक्रामक छवि से मेल नहीं खाती। इसीलिए सवाल उठा कि क्या मोदी चुनाव पश्चात नये राजनीतिक समीकरण की संभावनाएं तलाश रहे हैं?
दलगत राजनीति और चुनाव के जरिये ही चार बार मुख्यमंत्री बन चुके नवीन पटनायक पर राजनीतिक राग-द्वेष का आरोप कभी नहीं लगा। हां, अराजनीतिक पृष्ठभूमि के बावजूद उन्होंने कभी कालाहांडी और भुखमरी के लिए जाने, जाने वाले उड़ीसा का कायाकल्प कर तटस्थ प्रेक्षकों की प्रशंसा अवश्य पायी है। चुनाव पूर्व भी वह किसी खास राजनीतिक गोलबंदी का हिस्सा नहीं बने। ऐसे में चुनाव पश्चात आवश्यकता पड़ने पर नवीन पटनायक का बीजू जनता दल केंद्र में मोदी सरकार के लिए राजग को समर्थन दे भी सकता है। उच्च सत्ता महत्वाकांक्षा के शिकार के. चंद्रशेखर राव भी खुद को राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाये रखने और अपनी विरासत सुरक्षित करने के लिए कब पाला बदल लें, कोई नहीं जानता। अगर अपने डीएनए तक पर सवाल उठाये जाने के बावजूद नीतिश कुमार राजग में वापस लौट सकते हैं तो खुद को गैर भाजपाई खेमे में कमान न मिलने पर चंद्रबाबू को देशहित में ऐसा कदम उठाने में भला क्या संकोच हो सकता है? कांग्रेस द्वारा लगातार अपमानित किये जाने वाले जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस को भी मोदी या भाजपा से कोई एलर्जी क्यों होनी चाहिए?
अगर ये संभावनाएं भाजपानीत राजग सरकार का ही संकेत दे रही हैं, तब गैर भाजपाई दलों की गतिविधियों का क्या अर्थ है? मत भूलिए कि

राजकुमार सिंह

मोदी को जनता के मुद्दों पर भारी पड़ता मानने वाले भी मान रहे हैं कि 2014 वाली लहर कहीं नहीं है। तब क्या वर्ष 2004 की पुनरावृत्ति संभव है, जब पंडित नेहरू के बाद देश के सबसे कद्दावर नेता अटलबिहारी वाजपेयी और भाजपा शाइनिंग इंडिया की चकाचौंध में कांग्रेस द्वारा बिछायी गयी चुनावी बिसात और जमीनी हकीकत को नहीं समझ पाये थे और राजनीतिक रूप से नौसिखिया मानी जाने वाली सोनिया गांधी से मात खा गये थे? बेशक सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में तो सपा-बसपा-रालोद गठबंधन में कांग्रेस जगह नहीं पा सकी, लेकिन चुनाव पश्चात ध्रुवीकरण में वह गैर भाजपाई खेमे का प्रमुख घटक ही होगी। उत्तर प्रदेश में मायावती-अखिलेश, बिहार में राजद-कांग्रेस महागठबंधन, उड़ीसा में नवीन पटनायक, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, आंध्र में चंद्रबाबू और जगन रेड्डी, तेलंगाना में चंद्रशेखर राव, कर्नाटक में कांग्रेस-जनता दल सेक्यूलर तथा राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब में अकेलेदम कांग्रेस, राजग को जैसी कड़ी चुनौती पेश करते दिख रहे हैं, उसमें इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है कि खासकर उत्तर भारत में घटने वाली सीटों की भरपाई भाजपा कहां से करेगी? दरअसल सुब्रह्मण्यम स्वामी और राम माधव का भाजपा की सीटें घटने का अनुमान भी इसी सवाल को गंभीर बनाता है। जाहिर है, ऐसे सभी सवालों के जवाब के लिए 23 मई का इंतजार करना ही बेहतर होगा।

journalistrksingh@gmail.com


Comments Off on मुद्दे बनाम मोदी चुनाव में ध्रुवीकरण
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.