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तंत्र की काहिली से बिगड़ते हालात

Posted On May - 15 - 2019

अभिषेक कुमार सिंह

जंगल की आग के बारे में यही कहा जाता है कि एक सालाना उपक्रम के तहत वहां लगने वाली आग नए सृजन का रास्ता खोलती है। ऐसा सदियों से होता आया है और आगे भी होगा। लेकिन समस्या तब है, जब यह आग अनियंत्रित हो जाए, जंगल के जीव-जंतुओं के लिए काल बन जाए, नजदीक बसी मानव आबादी के लिए मुश्किल बन जाए। इस कारण पैदा हुए धुएं के कारण आना-जाना मुश्किल हो जाए और जंगल की बेशकीमती इमारती लकड़ी जलकर खाक हो जाए। एक सालाना उपक्रम की तरह इस साल भी कुछ समय से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के जंगलों में आग की खबरें आने लगी हैं। मुश्किल यह है कि अक्सर गर्मियों के मौसम में जंगली आग ऐसा ही विनाश रचती है लेकिन उस पर कोई खास रोक नहीं लग पा रही है।
खासतौर से उत्तराखंड के कुमाऊं के नैनीताल और चंपावत जिलों से आग की डरावनी तस्वीरें मई के आरंभ से ही आने लगी हैं। हालांकि वन कर्मी आग बुझाने के लिए जूझ रहे हैं। इस आग से सिर्फ जंगल स्वाहा नहीं हो रहे, बल्कि इससे पैदा होने वाली धुंध और धुएं के कारण यातायात भी प्रभावित हो रहा है। नैनीताल और चंपावत के अलावा चमोली के जंगलों में भी आग का प्रकोप दिखने लगा है। यहां के बदरीनाथ वन प्रभाग और केदारनाथ वन प्रभाग के जंगलों में आग से लगातार वन संपदा का नुकसान हो रहा है और वन्य जीवों का वजूद भी संकट में पड़ा हुआ है।
यह आग महज जंगल तक सीमित नहीं रहती। यह बढ़कर रिहायशी इलाकों और सार्वजनिक उपयोग की इमारतों-संपत्तियों तक पहुंच जाती है। जैसे पिछले साल हिमाचल प्रदेश के कसौली में वायुसेना डिपो तक आग पहुंच गयी थी, जिसे रोकने के लिए विमानों के जरिये पानी का छिड़काव करना पड़ा। कुछ मौकों पर कालका-शिमला ट्रेन को रोकना पड़ा था। जम्मू-कश्मीर में वैष्णोदेवी के रास्ते त्रिकुटा के जंगलों में लगी आग ने श्रद्धालुओं का रास्ता रोक दिया था। पिछले साल नासा की सैटेलाइट तस्वीरों के जरिये बताया गया था कि यूपी, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर के अलावा दक्षिणी राज्यों में आग से 6 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र स्वाहा हो गया था।
वन क्षेत्रों में लगी आग को बुझाना आसान नहीं होता क्योंकि इससे पैदा होने वाले धुएं के कारण दृश्यता बेहद कम हो जाती है, इसलिए हेलीकॉप्टरों के जरिए उसे बुझाने की कोशिश करना बेहद जोखिम वाला काम बन जाता है। वैसे तो ऐसी हर जगह, जहां मॉनसून और सर्दियों में बारिश होती है और गर्मियों में सूखा मौसम रहता है, वहां आग लगती रहती है। बारिश की वजह से पेड़-पौधे ख़ूब बढ़ जाते हैं। गर्मियों में झाड़ियां और घास-फूस सूखकर आग लगने का माहौल तैयार कर देते हैं। प्राकृतिक रूप से जंगलों में लगने वाली आग से वहां के पेड़-पौधों को निपटने का तरीका मालूम है। कहीं पेड़ों की मोटी छाल बचाव का काम करती हैं तो कहीं आग के बाद जंगल को फिर से फलने-फूलने का हुनर आता है। अफ्रीका के सवाना जैसे घास के मैदानों में बार-बार आग लगती रहती है लेकिन घास-फूस जल्दी जलने से आग का असर जमीन के अंदर, घास-फूस की जड़ों तक नहीं पहुंचता।
उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर के जंगलों की आग के पीछे कुछ ऐसी ही वजहें हैं। यहां के जंगलों में चीड़ की बहुतायत है। जब कभी पिरुल कहलाने वाली चीड़ की पत्तियों के ढेर ज्यादा लग जाते हैं तो जंगलों में जरा-सी चिंगारी विशाल रूप ले लेती है। चीड़ की एक और खासियत है कि यह अपने आसपास चौड़ी पत्तियों वाले वृक्षों को पनपने नहीं देता। पहले जंगलों में बिखरी चीड़ की पत्तियों को लोग पशुओं के नीचे बिछौने के रूप में इस्तेमाल कर लेते थे। पत्तियों को गोबर के साथ सड़ाकर खाद बना लेते थे लेकिन रोजगार के चलते हुए पलायन के कारण गांव के गांव खाली हैं।
आग को बुझाने के तीन तरीके विशेषज्ञ सुझाते हैं। पहला, मशीनों से जंगलों की नियमित सफाई हो, चीड़ आदि की पत्तियों को समय रहते हटाया जाए, लेकिन यह बेहद महंगा विकल्प है। दूसरा, वहां नियंत्रित ढंग से आग लगाई जाए। दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई देशों में यही किया जा रहा है, लेकिन इसके लिए भी काफी संसाधन चाहिए। तीसरा यह कि पर्वतीय इलाकों में पलायन रोक कर जंगलों पर आश्रित व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाए, जिससे जंगलों की साफ-सफाई होगी और आग के खतरे कम होंगे। चूंकि हमारे नेतागणों, योजनाकारों ने जंगलों की आग की अहमियत को ठीक से समझा नहीं है, इसलिए कहना मुश्किल है कि इनमें से कोई भी तरीका उन्हें रास आएगा। ऐसे में इकलौता तरीका यही है कि सूचना मिलते ही हेलीकॉप्टर पानी के साथ दहकते जंगलों की तरफ रवाना किए जाएं और गांव, प्रशासन समेत सेना भी ऐसे नाजुक मौकों पर अलर्ट रहे।


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