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‘वसंत’ का पर्व ईस्टर

Posted On April - 21 - 2019

पंकज चतुर्वेदी

ईसाइयों के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है ईस्टर। यह हमेशा 22 मार्च से 25 अप्रैल के बीच किसी रविवार के दिन मनाया जाता है। वसंत ऋतु की पहली पूर्णमासी के बाद आने वाला पहला रविवार। शुरुआत में इस बात पर बड़ा विवाद था, क्योंकि ईस्टर का आरंभ यहूदी फसह पर्व से जुड़ा हुआ था, जो महीने के चौदहवें दिन मनाया जाता था। 325वें रोमन केथोलिक सम्राट कांस्टेंटाइन ने नीकिया में अपने साम्राज्य के सारे धर्मगुरुओं का महा-अधिवेशन बुलाया और यह प्रस्ताव रखा कि मध्य वसंत की पहली पूर्णमासी के बाद आने वाले रविवार को ईस्टर घोषित करें। 1752 में ब्रिटिश संसद ने इस तिथि को धर्मनियम की संसद के जरिए कानूनी जामा पहनाया।
ईस्टर, ईसा मसीह के दुखों, सलीब पर मृत्यु और तीसरे दिन उनके पुनर्जीवन की याद में मनाया जाता है। ‘ईस्टर’ का मतलब पुरानी ‘ऐंग्लो-सेक्शन जाति की वसंत की देवी ‘ओस्टर’ है, जिनके नाम पर ‘ईस्टर का महीना’ यानी अप्रैल का महीना था। नार्वे की भाषा में वसंत ऋतु को फसह कहते थे और इसे पर्व की तरह मनाते थे। यह यहूदियों के मिस्र की गुलामी से मुक्ति और फसल कटाई दोनों का प्रतीक था। फसह के दिन करीब 3 बजे ईसा मसीह को सलीब पर लटकाया गया था। इसके तीसरे दिन वे पुनर्जीवित हो गए थे। इस तरह यहूदी फसह पर्व में ईसा के पुनर्जीवन का नया तत्व जुड़ गया। शुरुआत में यहूदी ही ईसा के मानने वाले बने थे।
फसह की तरह ही ईसा मसीह के पुनर्जीवन की याद में ईस्टर मनाया जाने लगा। प्राचीन यूनानी और पूर्वी यूरोप के ईसाई ईस्टर को पवित्र और महान मानते हैं। इस दिन एक-दूसरे का ‘ईसा जी उठे हैं’ कहकर अभिवादन करते हैं। ‘नि:संदेह वह जी उठे हैं’, कहकर उत्तर दिया  जाता है।
शुरू में ईस्टर शनिवार के उपवास के बाद शनिवार शाम से रविवार सूर्योदय तक मनाया जाता था। रात के अंधकार के बाद सूर्योदय का प्रकाश नवजीवन का प्रतीक है। इसलिए चर्चों में रविवार की सुबह बपतिस्मा संस्कार किया जाता है। ईस्टर

रात में मनाया जाता
था, इसलिए ‘ज्योति पर्व’ के रूप में मनाया जाने लगा। यरूशलम के गिरजाघरों में 8 दिन तक मोमबत्तियां जलायी जाती हैं।

इस पर्व में ईस्टर एग की अपनी खास जगह है। अंडा नवजीवन का प्रतीक है। ईसाइयों के लिए ईस्टर एग ईसा के दोबारा जीवित होने का प्रतीक है। जैसे चूजा अंडा फोड़कर बाहर निकलता है, वैसे ही ईसा मसीह कब्र के बाहर पुनर्जीवित होकर निकले। दरअसल, चर्च के शुरुआती वर्षों में मृतक के साथ कब्र में अंडे रख दिए जाते थे। बाद में अंडे को ईस्टर से जोड़ दिया गया। चर्च ने इस गैर ईसाई प्रथा का विरोध नहीं किया, क्योंकि अंडा पुनरुत्थान का एक सशक्त प्रतीक था।


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