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मुक्तिदाता सरस्वती तीर्थ

Posted On April - 1 - 2019

तीर्थाटन

सुभाष पौलस् त्य
पितरों को मुक्ति देने वाले तीर्थ के तौर पर प्रसिद्ध पिहोवा में हर साल लगने वाला चैत्र चौदस मेला 3 अप्रैल से शुरू हो रहा है। तीन दिन के इस मेले के दौरान यहां सरस्वती व पृथुदक तीर्थ के पवित्र जल में स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। पृथुदक पिहोवा का ही पौराणिक नाम है, जो भगवान विष्णु के नवम अंश माने गये महाराजा पृथु के नाम पर पड़ा था। पुराणों और जनश्रुतियों के अनुसार इस तीर्थ का इतिहास भगवान शिव, भगवान विष्णु व श्रीकृष्ण और कई महान ऋषियों से जुड़ा है।
पुराणों के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने महाभारत के युद्ध में मारे गये अपने सगे-संबंधियों का पिंडदान यहीं किया था। एक कथा है कि ऋषि विश्वामित्र ने देवी रूपी सरस्वती नदी को श्राप दे दिया था। श्राप के प्रभाव के कारण सरस्वती का पानी दूषित हो गया और वहां भूत-प्रेतों का वास हो गया। भगवान शिव और श्री कृष्ण के साथ ऋषि मुनियों ने यज्ञ करके सरस्वती को उस श्राप से मुक्ति दिलाई। माना जाता है कि एकादशी से अमावस तक यज्ञ किया गया था। जिस रोज वहां से भूत-प्रेतों को मुक्त किया गया, वह चैत्र माह की चतुर्दशी थी। तभी से यहां हर साल चैत्र चौदस का मेला लगने लगा। एक जनश्रुति के अनुसार भगवान शिव ने यहां परिवार सहित सरस्वती में स्नान किया था। भगवान कृष्ण के चरण भी यहां पड़े। चैत्र चौदस पर यहां हरियाणा के अलावा पंजाब से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु स्नान और पिंडदान के लिए आते हैं। मान्यता है कि यहां स्नान करने से पाप नष्ट होते हैं, कई यज्ञों के समान फल मिलता है, पितरों को मुक्ति व शांति मिलती है।


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