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भले अमरदास गुण तेरे…

Posted On April - 1 - 2019

श्री गुरु अमरदास जी
गुरुगद्दी दिवस 6 अप्रैल

रमेश बग्गा चोहला
श्री गुरु नानक देव जी की तीसरी ज्योत श्री गुरु अमरदास जी शारीरिक तौर पर नि:संदेह उम्र की उस अवस्था में थे, जहां पहुंचकर आम मनुष्य जिसमानी तौर पर कुछ थकावट और रुकावट महसूस करने लग जाता है, लेकिन श्री गुरु अमरदास जी ने सेवा और सिमरन की बदौलत जीवन की शाम को नयी सवेर में बदल दिया। उन्होंने अाध्यात्मिक और सामाजिक क्षेत्र में मानव कल्याण के लिए बहुमूल्य सेवा की। श्री गुरु अंगद देव जी को तन-मन से समर्पित होकर उन्होंने अपनी सेवा को सफल किया अौर बाबा नानक जी की विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया। इसके लिए गुरु जी ने नये तरीके अपनाये, जो समय की जरूरत के मुताबिक खरे उतरे और बेहद कामयाब भी हुए। इस कामयाबी के कारण ही भाट ‘भल’ जी फरमाते हैं- ‘भले अमरदास गुण तेरे, तेरी उपमा तोहि बनि आवै।’
मानवीय समता के समर्थक श्री गुरु अमरदास जी का जन्म वैशाख शुक्ल पक्ष एकादशी संवत‍् 1536 (5 मई 1479) को अमृतसर जिले के गांव बासरके गिल में हुआ। उनके पिता का नाम तेजभान भल्ला और माता का नाम लखमी देवी (कुछ लेखकों के अनुसार माता सुलखनी और बख्त कौर) था। 23 साल की आयु में अमरदास जी का विवाह स्यालकोट जिले के गांव सनखड़ा के निवासी देवी चंद की पुत्री मनसा देवी से हुआ। एक दिन बाबा अमरदास जी ने अपने भतीजे जसु की पत्नी बीबी अमरो (गुरु अंगद देव जी की पुत्री) से श्री गुरु नानक देव जी का शबद- ‘करणी कागदु मनु मसवाणी बुरा भला दुए लेख पए’ सुना। वे इस शबद से इतना प्रभावित हुए कि गुरु अंगद देव जी से मिलने खडूर साहिब पहुंचे गये। तब अमरदास जी की उम्र 61 साल की थी। उस उम्र में उन्होंने अपने से 25 वर्ष छोटे गुरु अंगद देव जी को गुरु धारण किया और गुरु-सेवा को ही अपना जीवन बना लिया। वह दिन-रात गुरु के लंगर में सेवा करते। रोज सुबह गुरु अंगद देव जी के स्नान के लिए 11 मील दूर ब्यास नदी से पानी लेकर आते। लगभग 11 साल की अविराम, निष्काम सेवा के बाद अमरदास जी को गुरु अंगद देव जी से गुरु गद्दी मिली।
श्री गुरु अमरदास जी ने समाज सुधार की तरफ विशेष ध्यान दिया। छुआछूत और जाति-पाति के भेदभाव को खत्म करने के लिए गोइंदवाल साहिब में एक सांझी ‘बाउली’ बनाई जहां सभी लोग बिना भेदभाव के स्नान कर सकते थे। गुरु जी ने लंगर में सभी के लिए एक ‘पंगत’ में बैठकर भोजन की परंपरा शुरू की। गुरु जी ने सती प्रथा जैसी कुरीतियों का विरोध किया।
गुरु अमरदास जी के 850 से ज्यादा शबद, श्लोक और छंद ‘महला तीजा’ के अन्तर्गत श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। ‘अानंद साहिब’ गुरु जी की सबसे प्रसिद्ध रचना है। समाज सुधारक, योग्य प्रबंधक एवं तेजस्वी शख्सियत के मालिक श्री गुरु अमरदास जी 95 वर्ष की आयु में साल 1574 में श्री गोइंदवाल साहिब में ज्योति-जोत समा गये।


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