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प्रभु सुमिरन ही सबसे दुर्लभ

Posted On April - 21 - 2019

संत सिंह मसकीन
गुरु अर्जुन देव जी महाराज का फरमान है कि मनुष्य जिस चीज को महान समझ लेता है, खास समझ लेता है, उसकी प्राप्ति की इच्छा उसके अंदर स्वाभाविक ही पैदा हो जाती है। मनुष्य की नजरों में जो चीज तुच्छ है, मामूली है, वह चीज अगर उसकी झोली में डालने की कोशिश भी करे, तो वो उसको फेंक देता है, कबूल नहीं करता। सवाल यह नहीं है कि वस्तु महान है या नहीं। सवाल यह है कि मनुष्य ने माना क्या है। अगर मनुष्य ने किसी भी चीज को तुच्छ समझ लिया है, मामूली समझ लिया है, तो उसकी मांग नहीं करेगा। उसको कबूल नहीं करेगा।
इंसान ऐसे भ्रम में पड़ा हुआ है कि उसने कई महान वस्तुओं को तुच्छ समझ लिया है और तुच्छ चीजों को महान समझ लिया है। तो गुरु अर्जुन देव जी महाराज श्लोक में कहते हैं कि ऐ बंदे! जिन-जिन चीजों को तूने महान समझ लिया है, वह महान नहीं हैं। जिसको तूने खास समझ लिया है, वह खास नहीं है। और जिसको तूने तुच्छ समझ लिया है, वह तुच्छ नहीं है।
नच दुरलभं धनं रूपं नच दुरलभं स्वरगद्य राजनह॥
नच दुरलभं भोजनं बिंजनं नच दुरलभं स्वछ अम्बरह ॥
नच दुरलभं सुत मित्र भ्रात बांधव नच दुरलभं बनिता बिलासह ॥
नच दुरलभं बिदिआ प्रबीणं नच दुरलभं चतुर चंचलह ॥
यानी- धन और रूप कोई दुर्लभ नहीं है, कोई खास नहीं है। ये तेरी जरूरत हो सकते हैं, तेरा जीवन नहीं। तेरे लिए ये कोई पूज्य नहीं, महान नहीं। तरह-तरह के पकवान और मनभावन वस्त्र भी दुर्लभ नहीं हैं। इनको भी जिंदगी का मनोरथ न समझना। आज्ञाकारी पुत्रों का मिल जाना, हमख्याल मित्रों का मिल जाना, हमख्याल संबंधियों का हो जाना, ये भी कोई दुर्लभ चीज नहीं है। इसके साथ भी जिंदगी के मसले हल नहीं होते। बड़ा विद्वान हो जाना, विद्या में प्रवीण हो जाना, ये भी कोई दुर्लभ नहीं है।
ये सब दुर्लभ नहीं तो फिर दुर्लभ क्या है? महान क्या है? क्योंकि मनुष्य की जिंदगी आखिर इन्हीं चीजों के इर्द-गिर्द ही तो भटकती है। मनुष्य सारी जिंदगी इन्हीं चीजों को प्राप्त करने की कोशिश करता है। तो पातशाह बताते हैं कि दुर्लभ चीज क्या है-
दुरलभं एक भगवान नामह नानक लबध्यिं साधसंगि कृपा प्रभं॥
यानी, दुर्लभ है भगवान का नाम, मिलता है साधुओं की संगत में और परमात्मा की बख्शीश से।
संसार में जितने धनवान हैं, इतने भक्त नहीं हैं। धनवान बनना आसान है, भक्त बनना बहुत मुश्किल है। गुणवान बनना आसान है, विद्वान बनना आसान है, भक्त बनना बहुत मुश्किल है। कइयों को अच्छे मित्र मिल गए हैं, अच्छी पत्नी मिल गई है, लेकिन ऐसे इंसान आपको कम ही मिलेंगे, जिनको भगवान मिल गया है। भक्तों की गिनती बहुत थोड़ी है। कारण? भक्त बनने के लिए बहुत मेहनत की जरूरत पड़ती है। इसलिए साहिब का फरमान है- पंडित सूर छत्रपति राजा भगत बराबरि अउरु न कोइ ॥
जहां भक्त पहुंचता है, धनवान नहीं पहुंच सकता, गुणवान नहीं पहुंच सकता, छत्रपति राजा भी नहीं पहुंच सकता, विद्वान भी नहीं पहुंच सकता। भक्त के पास क्या है? भगवान है, भक्ति है, नाम है, अमृतमय रस है।

(साभार maskeenji.wordpress.com)


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