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धर्म वाक्य

Posted On April - 27 - 2019

द्वाविमौ पुरुषौ राजन स्वर्गस्योपरि तिष्ठत:। प्रभुश्च क्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान‍्॥
जो व्यक्ति शक्तिशाली होने पर क्षमाशील हो तथा निर्धन होने पर भी दानशील हो – इन दो व्यक्तियों को स्वर्ग से भी ऊपर स्थान प्राप्त होता है।

न्यायार्जितस्य द्रव्यस्य बोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ। अपात्रे प्रतिपत्तिश्च पात्रे चाप्रतिपादनम‍्॥
न्याय और मेहनत से कमाए धन के ये दो दुरूपयोग कहे गए हैं- एक, कुपात्र को दान देना और दूसरा, सुपात्र को जरूरत पड़ने पर भी दान न देना।

दश धर्मं न जानन्ति धृतराष्ट्र निबोध तान‍्। मत्तः प्रमत्तः उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धो बुभुक्षितः ॥ त्वरमाणश्च लुब्धश्च भीतः कामी च ते दश। तस्मादेतेषु सर्वेषु न प्रसज्जेत पण्डितः ॥
दस प्रकार के लोग धर्म-विषयक बातों को महत्वहीन समझते हैं। ये लोग हैं – नशे में धुत व्यक्ति, लापरवाह, पागल, थका-हारा व्यक्ति, क्रोध, भूख से पीड़ित, जल्दबाज, लालची, डरा हुआ तथा काम पीड़ित व्यक्ति। विवेकशील व्यक्तियों को ऐसे लोगों की संगति से बचना चाहिए। ये सभी विनाश की ओर ले जाते हैं।

प्राप्यापदं न व्यथते कदाचि- दुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः। दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिताः सप्तनाः॥
जो व्यक्ति मुसीबत के समय भी कभी विचलित नहीं होता, बल्कि सावधानी से अपने काम में लगा रहता है, विपरीत समय में दुःखों को हंसते-हंसते सह जाता है, उसके सामने शत्रु टिक ही नहीं सकते; वे तूफान में तिनकों के समान उड़कर छितरा जाते हैं।


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