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होला-मोहल्ला में वीर रस के रंग

Posted On March - 18 - 2019

डॉ. राजेंद्र सिंह ‘साहिल’
श्री आनंदपुर साहिब का होला-मोहल्ला युद्ध की वीरतापूर्ण शौर्य-कलाओं के अभ्यास का पावन पर्व है। श्री गुरु गोबिंद सिंह चाहते थे कि सिखों में वीर रस का उल्लास और मानवता की रक्षा की प्रेरणा का भाव सदा बना रहे। इसीलिए उन्होंने सिखों के व्यवस्थित सैनिक प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया। इसी सिलसिले में गुरु जी ने श्री आनंदपुर साहिब में होला-मोहल्ला मनाने की परंपरा शुरू की। गुरु जी ने फाल्गुन महीने की पूर्णिमा यानी होली के अगले दिन वीर रसात्मक खेलों और करतबों से भरपूर होला-मोहल्ला मनाने का निर्देश दिया।
पहला होला-मोहल्ला श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1700 ईस्वी में श्री आनंदपुर साहिब के किला होलगढ़ में मनाया। यहां खालसा सेना के दो भाग किए गये और उनमें युद्ध का अभ्यास कराया गया। इसके बाद दीवान सजे, गुरबाणी का पाठ किया गया। इसके बाद होला-मोहल्ला मनाने की परंपरा निरंतर चली आ रही है। इस दिन श्री आनंदपुर साहिब में विशाल एवं भव्य नगर कीर्तन का आयोजन किया जाता है। इस नगर कीर्तन को ‘मोहल्ला चढ़ना’ कहा जाता है। पांच प्यारे किला आनंदगढ़ में अरदास के बाद ‘निशान साहिब’ लेकर किले से निकलते हैं। साथ-साथ अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित घोड़ों पर सवार ‘गुरु की लाडली फौज’ कहलाने वाले निहंगों के जत्थे होते हैं। नगाड़े की चोट पर ‘बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ के जयकारे गुंजाये जाते हैं। किला आनंदगढ़ से चला नगर कीर्तन माता जीतो जी के देहरे होलगढ़ से होता हुआ चरण-गंगा पार के खुले मैदान में पहुंचता है। यहां खालसा सेना करतब करते हुए युद्ध कौशल का शानदार प्रदर्शन करती है। दोपहर बाद नगर कीर्तन तख्त श्री केसगढ़ साहिब की तरफ निकलता है और यहां पहुंचकर संपन्न होता है। इसके बाद तख्त श्री केसगढ़ साहिब में दीवान सजाये जाते हैं। गुरबाणी का कीर्तन होता है।
(साभार गुरमति ज्ञान)


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