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मन के संसार में… हर दिन हाेली हो

Posted On March - 18 - 2019

होली का मतलब यह पहचानना है कि जीवन दरअसल बहुत उल्लासमय प्रक्रिया है। मगर इंसान यह नहीं जानता कि वह अपनी दिमागी क्षमताओं, खासतौर पर दो सबसे बुनियादी काबिलियत- याद‍्दाश्त और कल्पना को कैसे संभाले। इसलिए हर वह चीज, जो लोगों को याद नहीं रखनी चाहिए, उन्हें वे याद रखते हैं और जिन चीजों को याद रखना चाहिए, उन्हें भूल जाते हैं। वे हर तरह की कल्पनाएं करते हैं, जो उन्हें नहीं करनी चाहिए, और किसी ऐसी चीज की कल्पना नहीं कर पाते जो उनके जीवन को सुंदर बना सकती है। होली के दिन देश भर में लोग एक-दूसरे को रंग

सद‍्गुरु जग्गी वासुदेव

लगाते हैं। वे खुद को रंग से सराबोर कर लेते हैं। इस दिन लोग सिर से पांव तक अलग-अलग रंगों में रंगे होते हैं, जो यह दर्शाता है कि जीवन का मूल तत्व है, उल्लास। होली का मतलब अपने जीवन की सभी गैरजरूरी चीजों को जला देना भी है। होलिका जलाने का एक मतलब पिछले एक साल की पुरानी यादों को जलाना है, ताकि आप एक नये और उल्लासमय जीवन के रूप में शुरुआत कर सकें। यह वसंत के मौसम का ऐसा हिस्सा होता है, जिस समय फूलों का एक दूसरा दौर आता है। आप अपने भीतर भी वसंत लाइए। जीवंतता के अलग-अलग स्तर होते हैं। वसंत, होली का समय है, हम चाहते हैं कि आप अधिकतम जीवंतता के साथ रहें।
(साभार isha.sadhguru.org)

श्रीश्री रविशंकर

प्रकृति की तरह ही हमारी भावनाओं, संवेदनाओं का रंगों से संबंध है। क्रोध का लाल, आनंद और जीवंतता के लिए पीला, प्रेम का गुलाबी, नीला विस्तृत के लिए, शांति के लिए श्वेत, बलिदान का केसरिया और ज्ञान का जामुनी। हर मनुष्य एक रंगीन फव्वारा है, जिसके रंग बदलते रहते हैं। होली की तरह जीवन भी रंगों भरा होना चाहिए, न कि उबाऊ। जब सभी रंग स्पष्ट देखे जायें, तब वह रंग भरा है, जब सभी रंग घुल जाते हैं, वह हो जाता है- काला। जीवन में हम विभिन्न भूमिकाएं निभाते हैं। हर भूमिका एवं भावना स्पष्ट रूप से परिभाषित होनी चाहिए। अस्पष्ट भावनाएं कष्ट उत्पन्न करती हैं। जब आप एक पिता हैं, आपको पिता का पात्र निभाना है। कार्यस्थल पर आप पिता नहीं हो सकते। जब आप जीवन की विभिन्न भूमिकाओं को मिश्रित करते हैं, तब आप से गलतियां होनी शुरू होती हैं। आप अपने जीवन में जो भी पात्र निभा रहे हैं, पूर्ण रूप से उसी में हों। विविधता में समन्वयता जीवन को अधिक जीवंत एवं रंग भरा बनाती है। जीवन में आप आनंद का जो भी अनुभव करते हैं, वह आप को स्वयं से ही प्राप्त होता है। जब आप वह सब छोड़ कर शांत हो जाते हैं, जिसे आपने जकड़ा हुआ है, वही ध्यान कहलाता है। ध्यान कोई क्रिया नहीं है, यह कुछ भी नहीं करने की कला है। ध्यान में आपको गहरी नींद से भी अधिक विश्राम मिलता है, क्योंकि आप सभी इच्छाओं के पार होते हैं। यह मस्तिष्क को गहरी शीतलता देता है। यह मस्तिष्क शरीर तंत्र को पुनर्जीवन देने के समान है।
(साभार srisrihindi.blogspot.com)

होली खेलन अाये कन्हाई

अोपी शर्मा
जब बात रंगों के त्योहार होली की हो अौर ब्रज की लट्ठमार होली का जिक्र न अाये, तो अानंदोत्सव में किसी अधूरेपन का अाभास होना स्वाभाविक है। ब्रज में लट्ठमार होली की धूम होली से कई दिन पहले शुरू हो जाती है। अाज भी वृंदावन जैसी मस्ती भरी होली कहीं नहीं खेली जाती। एेसी मान्यता है कि इस लट्ठमार होली का संबंध कहीं न कहीं भगवान श्री कृष्ण से है। तो अाइये ले चलते हैं अापको वृंदावन की कुन्ज गलिन में, जहां भगवान श्री कृष्ण बाल कृष्ण कन्हैया के रूप में अपने विशुद्ध भक्तों अर्थात‍् गोप-गोपियों के संग रंगों की होली खेलते थे। उनके वस्त्रों को रंगों से भिगो देते थे। खीज कर गोपियां कन्हैया के पीछे लाठी लेकर दौड़तीं अौर भगवान की इस दिव्य लीला का अानंद उठाती थीं। एेसा कहा जाता है कि यहीं से प्रतीकात्मक रूप में संभवत: लट्ठमार होली खेलने का प्रचलन शुरू हुअा। अाज भी होली से कई दिन पहले ब्रजवासी ब्रज की गलियों में लट्ठमार होली खेलने निकल पड़ते हैं। होली की एेसी खुमारी अापने कहीं नहीं देखी होगी। ब्रजवासी नारियां लाठी लेकर पुरुषों पर टूट पड़ती हैं। जहां लाठी से अपना बचाव करने के लिए पुरुष एक ढालनुमा वस्तु अपने हाथों में पकड़े रहते हैं, वहीं ब्रजवासी नारियां जोर-जोर से इसी ढाल पर लाठियां भांजती हैं।
वास्तव में होली का त्योहार एक प्रकार से बुराई पर अच्छाई की जीत दर्शाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार राक्षसी प्रवृत्ति का राजा हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से द्वेष रखता था। इसके विपरीत उसका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। क्रोधवश हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को मारने की योजना बनाई। उसे कभी हाथी के पैरों तले रौंदवाया, तो कभी पहाड़ से नीचे फिंकवाया, लेकिन प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं हुअा। अन्त में हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलवाया अौर उसे अादेश दिया कि वह प्रहलाद को लेकर अग्नि में प्रवेश करे। होलिका को वरदान था कि उसे किसी भी प्रकार से अग्नि भस्म नहीं कर सकती, इसलिए वह प्रहलाद को अपनी गोदी में बिठाकर अग्नि में प्रवेश कर गयी। लेकिन परिणाम उल्टा हुअा— बजाय प्रहलाद के, होलिका ही भस्म हो गयी अौर प्रहलाद हंसते हुए अग्नि से बाहर निकल अाए। इस प्रकार बुराई पर अच्छाई की जीत हुई। एेसी मान्यता है कि उसी दिन से होलिका दहन का प्रचलन प्रारंभ हुअा। इसीलिए अाज भी रंगों के त्योहार होली को मनाने से एक दिन पूर्व होली जलाई जाती है। कई माताएं अपने शिशुअों को लेकर जलती हुई होली की परिक्रमा भी करती हैं और ईश्वर से शिशु की दीर्घायु की कामना करती हैं।


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