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मध्यस्थता की कीमत

Posted On March - 14 - 2019

मनमानी फीस पर अदालत नाराज

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का सामना अभी एक बहुत ही ऊहापोह भरे प्रश्न से हुआ। किसी विवाद को सुलझाने में मध्यस्थ की भूमिका कई बार बेहद अहम होती है। अदालत इसकी अहमियत के मद्देनजर इस बात पर हैरान भी है कि आखिरकार मध्यस्थता कितनी महंगी पड़ सकती है, खासकर जनता और जनता के पैसों से चलने वाले संस्थानों व संस्थाओं के मामले में यह अदालत की चिंता का विषय भी होना चाहिए। मध्यस्थ की महत्ता और मध्यस्थता की कीमत का यह प्रश्न पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय के सामने जालंधर नगर निगम और उससे संबंधित 22 अन्य नगर निगमों के मामले में अदालत की चिंता का विषय बना। इन संस्थाओं के वाद में नियुक्त दो पूर्व न्यायाधीशों और एक पूर्व आईएएस अधिकारी के मध्यस्थता शुल्क का मामला इन संस्थाओं और एक प्राइवेट कंपनी के झगड़े को सुलझाने की बाबत उठा। विवाद का कारण यह है कि मध्यस्थों ने नैतिक मूल्यों की अनदेखी करते हुए अपनी पूर्व निर्धारित फीस 49 लाख प्रति मध्यस्थ से बढ़ाकर 98 लाख प्रति मध्यस्थ कर ली।
दरअसल मध्यस्थता और समझौता अधिनियम 1996 में लागू हुआ और 2015 में संशोधित किये जाने का उद्देश्य यह था कि मध्यस्थता के रास्ते विवाद शीघ्र निपट सकें और न्यायालय के कम हस्तक्षेप और कम लागत में झगड़ा सुलझ जाए। कालांतर में मध्यस्थता का उपाय वैकल्पिक विवाद निपटान (एडीआर) व्यवस्था के रूप में लोकप्रिय हो गया। सामान्य रूप से न्यायालय पहले से ही बहुत ज्यादा विवादों के निपटारे में उलझे हुए हैं। यह विवाद ऐसे समय में आया है जब सरकार मध्यस्थता को प्रोन्नत करने व न्यायालयों का भार कम करने की कोशिश में है। जस्टिस डीएन श्रीकृष्णा समिति, जिन्होंने मध्यस्थता से जुड़े पहलुओं की विवेचना की है, ने कहा है कि मध्यस्थता के लिए एक संस्था स्वतंत्र रूप से स्थापित की जाए ताकि मध्यस्थता पर लोगों का विश्वास बढ़े व मध्यस्थ जवाबदेही की जिम्मेदारी समझे। संसद ने पिछले वर्ष मध्यस्थता अधिनियम में संशोधन करके इस तरह की मध्यस्थता संस्था को बढ़ावा दिया। जरूरी है कि एक स्पष्ट दिशानिर्देश जारी हों ताकि भविष्य में कोई विवाद न हो।


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