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बदलनी होगी सोच

Posted On March - 8 - 2019

महिलाओं को सशक्त करना राजनीतिक एजेंडे में शामिल तो हुआ है, लेकिन अभी पितृसत्तात्मक सोच बदली नहीं है। इस सोच के चलते इसका व्यापक असर अभी दिखना बाकी है। संसद में ही 33 प्रतिशत आरक्षण पर 22 साल से कुछ नहीं हो सका है।
कोई भी दिवस मनाने का अपना एक महत्व होता है। यह इतिहास को याद करने और पीछे मुड़कर संघर्ष यात्रा को गर्व से देखने का दिन होता है, लेकिन दिक्कत यह है कि इसका भी बाजारीकरण हो गया है। महिलाओं के लिए गहनों, कपड़ों पर महिलाओं के लिए छूट। अच्छा पति उपहार दे, वीमेंस-डे को करवाचौथ की तरह मनाया जाने लगा।
ग्रामीण एवं शहरी महिलाओं के बीच अंतर महिलाओं के बीच खाई की मसला नहीं है। विकास का जो मौजूदा मॉडल है वह देहात और शहर के बीच खाई को पाट नहीं पाया है। जब तक पूरे आर्थिक ढांचे में यह दूरी पाटने के प्रयास नहीं होंगे खाई पटना बहुत मुश्किल है।
-सुजाता (दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक)


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