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परिवार से बड़ी पॉलिटिक्स

Posted On March - 15 - 2019

हरीश लखेड़ा

लोकसभा के सियासी महाभारत के लिए रणभेरी बज चुकी है। राजनीतिक दलों के ‘योद्धा’ अपने-अपने खेमे तलाशने में लगे हैं, लेकिन कई राजनीतिक घराने ऐसे भी हैं, जो इस 17वीं लोकसभा की सियासी जंग में अपनों के खिलाफ तलवारें भांजेंगे। 16वीं लोकसभा में वे एक ही छत्र तले चुनाव मैदान में थे, लेकिन इस बार दूसरों से ज्यादा अपनों को ‘निपटाने’ की कोशिश में हैं। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला का कुनबा इस बार सियासी रूप से बिखर चुका है। बिखरे कुनबे के नये सिपहसालार अब चुनावी मैदान में एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोकने जा रहे हैं। तमिलनाडु में करुणानिधि के दोनों बेटों स्टालिन और अलागिरि में कटुता इतनी बढ़ चुकी है कि उनमें बोलचाल बंद है। करुणानिधि के निधन के बाद डीएमके की कमान छोटे भाई स्टालिन के हाथ में है, जबकि बड़े भाई अलागिरि पार्टी से बाहर हैं।
यह पहला मौका नहीं है कि देश के राजनीतिक घरानों में बिखराव हुआ हो। देश के सबसे ताकतवर नेहरू-गांधी परिवार में भी राजनीतिक विरासत को लेकर विवाद हो चुका है। इंदिरा गांधी अपने छोटे बेटे संजय गांधी को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाना चाहती थीं, लेकिन विमान दुर्घटना में संजय के निधन से कांग्रेस समेत देश की राजनीति ही बदल गई। इंदिरा गांधी के बड़े बेटे राजीव गांधी को राजनीति में आना पड़ा। उसी दौरान इंदिरा गांधी का अपनी छोटी पुत्रवधू और संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी से विवाद हो गया था। इस विवाद को लेकर कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। कहा जाता है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षी मेनका तब खुद को संजय की उत्तराधिकारी मानते हुए राजनीति में आने की इच्छुक थीं। यहीं से इंदिरा से उनका विवाद शुरू हुआ था। नतीजतन, मेनका को अपनी अलग राह चुननी पड़ी। आज इंदिरा गांधी की बड़ी पुत्रवधू सोनिया गांधी और उनका पोता राहुल गांधी कांग्रेस के कर्ताधर्ता हैं, जबकि उनकी छोटी पुत्रवधू मेनका गांधी और पोता वरुण गांधी कांग्रेस की चिरप्रतिद्वंद्वी पार्टी भाजपा में हैं।
देश में राजनीतिक कुनबे के बिखराव की ताजा घटना हरियाणा में हुई है। हरियाणा में पूर्व उपप्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल के घराने को सबसे ताकतवर घराना माना जाता है, लेकिन उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला का इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) अब टूट चुकी है। चोटाला के दोनों बेटे अजय सिंह चौटाला और अभय सिंह चौटाला अब अलग-अलग राह पकड़ चुके हैं। इनेलो के प्रमुख अब भी ओमप्रकाश चौटाला हैं और उनके छोटे बेटे अभय सिंह चौटाला इस पार्टी के असली कर्ताधर्ता हैं, जबकि इनेलो से अलग होने के बाद चौटाला के दोनों पोते दुष्यंत सिंह चौटाला और दिग्विजय सिंह चौटाला अब अपने पिता अजय सिंह चौटाला के मार्गदर्शन में जननायक जनता पार्टी बनाकर ‘इनेलो’ को ही निपटाने में लगे हैं। चौधरी देवीलाल को जननायक कहा जाता था और उनका असली राजनीतिक वारिस साबित करने के उद्देश्य से ही दुष्यंत सिंह चौटाला और दिग्विजय सिंह चौटाला ने अपनी पार्टी के नाम के आगे जननायक शब्द जोड़ा। अब हरियाणा के चौटाला परिवार में विरासत की लड़ाई जारी है। इस परिवार में वर्चस्व की लड़ाई के चलते दो राजनीतिक दल बन चुके हैं। वास्तव में कुरुक्षेत्र की धरती पर चौटाला परिवार में ही लोकसभा का महाभारत होने जा रहा है। एक खेमे में पाेते होंगे तो दूसरे खेमे में दादा-चाचा। लोकसभा चुनाव में जो भी खेमा आगे रहेगा, जाहिर है वही खुद को चौधरी देवीलाल की विरासत का असली वारिस साबित करने में सफल रहेगा। चौधरी देवीलाल के परिवार में राजनीतिक तौर पर यह जंग दूसरी बार हुई है। पहली बार उनके चारों बेटों प्रताप चौटाला, ओमप्रकाश चौटाला, रणजीत सिंह और जगदीश चौटाला के बीच उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर संघर्ष हुआ था, जिसमें बाजी ओमप्रकाश चौटाला के हाथ लगी थी। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल के बेटे रणबीर महेंद्रा और सुरेंद्र सिंह ने भी विरासत के विवाद के चलते अलग-अलग राह पकड़ ली थी। सुरेंद्र सिंह के निधन के बाद उनकी पत्नी किरण चौधरी दिल्ली के बजाय हरियाणा की राजनीति करने लगी। इसी तरह, भजनलाल के निधन के बाद उनके छोटे बेटे कुलदीप बिश्नोई ने हरियाणा जनहित कांग्रेस बना ली थी, जबकि बड़े बेटे चंद्रमोहन कांग्रेस सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे व विवाद के चलते उन्हें पद गंवाना पड़ा था। बाद में, कुलदीप भी कांग्रेस में लौट आए। तमिलनाडु में करुणानिधि का परिवार सबसे ताकतवर राजनीतिक घराना है। करुणानिधि ने लगभग 50 साल तक बिना किसी चुनौती के द्रविड़ मुनेत्र कडगम (डीएमके) की कमान संभाली, लेकिन उनके अंतिम दिनों में उनके छोटे बेटे एमके स्टालिन और बड़े बेटे एमके अलागिरी में राजनीतिक विरासत को लेकर संघर्ष शुरू हो गया था, इसलिए करुणानिधि ने स्टालिन को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।
तमिलनाडु में ही पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) की राजनीतिक विरासत को लेकर संघर्ष हुआ था। वर्ष 1987 में रामचंद्रन के निधन के बाद जयललिता के राजनीति में आने पर अन्नाद्रमुक टूट गयी थी। जयललिता के समर्थकों ने अन्नाद्रमुक (जे) और एमजीआर की पत्नी जानकी के समर्थकों ने अन्नाद्रमुक (जा) बना ली थी। हालांकि, बाद में जयललिता ही उनकी राजनीतिक वारिस  साबित हुईं।
आंध्र प्रदेश में तेलुगुदेशम पार्टी (टीडीपी) के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री एनटी रामा राव (एनटीआर) के जीवन काल में ही उनके दामाद व मौजूदा मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने सत्ता हड़प ली थी। 1995 में नायडू अपने ससुर एनटीआर को पद से हटाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जा बैठे थे। हालांकि, बाद में नायडू को एनटीआर की पत्नी, बेटों और एक अन्य दामाद से संघर्ष करना पड़ा था। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल का परिवार भी सियासी रूप से बिखर चुका है। प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत बादल ने अकाली दल से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई और चुनाव लड़ा। अब वे कांग्रेस सरकार में वित्त मंत्री हैं। प्रकाश सिंह बादल की विरासत उनके बेटे सुखबीर बादल संभाल रहे हैं। वे अकाली दल के अध्यक्ष हैं। बिहार में भी राष्ट्रीय जनता दल के संस्थापक व पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव और छोटे बेटे तेजस्वी यादव के बीच भी राजनीतिक विरासत को लेकर अलग राहें दिखने लगी हैं।

मुलायम परिवार में चाचा-भतीजे की ‘जंग’
यूपी में मुलायम यादव का कुनबा सबसे बड़ा राजनीतिक घराना माना जाता है। मुलायम ने जनता दल से अलग होकर समाजवादी पार्टी का गठन किया। एक समय था कि उनके बेटे अखिलेश यूपी के सीएम थे व छोटे भाई शिवपाल मंत्री। मुलायम, बहू डिंपल और भतीजा धमेंद्र लोकसभा और उनके भाई रामगोपाल यादव राज्यसभा में थे। अब यह कुनबा भी बिखर चुका है। सपा अब अखिलेश और राम गोपाल के पास है, जबकि मुलायम सिंह पार्टी में बेअसर हो चुके हैं। मुलायम सिंह के छोटे भाई शिवपाल यादव अब प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बनाकर अलग राह पर चल पड़े हैं। मुलायम सिंह का कुनबा अब चाचा (शिवपाल) व भतीजे (अखिलेश) में बंट चुका है।

सिंधिया घराना
ग्वालियर का सिंधिया घराना भी मध्य प्रदेश से लेकर देश की राजनीति में ताकतवर राजनीतिक घराना माना जाता है। राजमाता विजयाराजे सिंधिया जनसंघ और भाजपा की संस्थापक सदस्य रहीं, जबकि उनके बेटे माधवराव सिंधिया कांग्रेस में रहे। दोनों में इतने कटु संबंध थे कि बोलचाल तक बंद थी। आज भी यह परिवार कांग्रेस और भाजपा में बंटा है। विजयाराजे की एक बेटी वसुंधरा राजस्थान की मुख्यमंत्री और दूसरी बेटी यशोधरा मध्य प्रदेश में मंत्री रही हैं। माधवराव सिंधिया केंद्र में कांग्रेस सरकार में मत्री रहे और उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया भी केंद्र में मंत्री रहने के बाद अब कांग्रेस के महासचिव हैं।

ठाकरे परिवार भी दो फाड़
महाराष्ट्र का ठाकरे परिवार भी अब बंट चुका है। बाला साहब ठाकरे के परिवार को महाराष्ट्र के राजनीतिक घरानों में सबसे ताकतर माना जाता रहा है। जिंदगीभर परिवारवाद के लिए नेहरू-गांधी परिवार को कोसने वाले शिवसेेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने भी अंतत: अपनी राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी अपने बेटे उद्धव ठाकरे को बनाया, जबकि शिवसेना में ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे लंबे समय तक प्रभावशाली थे। उद्धव को ज्यादा महत्व देने से नाराज राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ 2006 में अपनी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बना ली। 2014 के चुनाव में राज ठाकरे ने मोदी का समर्थन किया था, लेकिन अब वे भाजपा से नाराज हैं।


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