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नयी दिशा में नारी

Posted On March - 8 - 2019

हर्षदेव

गरिमा यात्रा भारत जैसे देश की सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों में कई अर्थों में अभूतपूर्व है। पहली बार इतने व्यापक स्तर पर एक गैर-राजनीतिक आयोजन हुआ। दूसरी बात, ‘मी टू’ अभियान को पुरुषत्ववादी अहंकार से ग्रस्त लोग एक शिक्षित, खाते-पीते, मध्यम वर्ग तक सीमित बता रहे थे। उनका कहना था कि आम लोगों से इसका कोई ताल्लुक नहीं है। ऐसा कहने वालों का मानना था कि महिला शोषण का यह सच एक छोटे से दायरे तक सिमटा है, लेकिन गरिमा यात्रा ने ऐसे सभी भ्रम तोड़ दिए। यौन हिंसा और शोषण को सत्य की हकीकत दिखाने के लिए महिलाओं ने पुंसत्ववादी कवच को तार-तार करने का हथियार उसी ‘लोकलाज’ को बनाया, जिसका वास्ता देकर उन्हें अपनी दर्दभरी दास्तां आंचल में ढंककर रखने को मजबूर किया जाता था।
20 दिसंबर, 2018 को मुंबई से जब हजारों महिलाएं अपनी गरिमा के लिए सारे बंधन तोड़कर चुनौती का उद्घोष करती हुई अपनी-अपनी व्यथाएं लेकर ऐसे मुकाम की ओर बढ़ चलीं, जिसकी तलाश और प्रतीक्षा ‘शास्त्रों में पूज्य घोषित नारी’ को सदियों से थी। करीब 25 हजार महिलाएं, सबके पास अपना-अलग, लेकिन अमानवीयता के घूंघट में भी चीखता एक जैसा सच था। वे सब एक ही लक्ष्य- दमन, शोषण और हिंसा के विरुद्ध समवेत सुर में ऊंची-मजबूत आवाज और नारी सम्मान की चेतना के उदय की किरणें लेकर 22 फरवरी को दिल्ली पहुंची। यह यात्रा 24 राज्यों के 200 जिलों से होकर गुजरी। इस यात्रा की खुरदरी हकीकत से जब समाज दो-चार हुआ तो मिथ्या अहंकार की रक्षा के लिए कुछ स्थानों पर उसने हमला करके ‘दुस्साहस’ की इस आवाज को दबाने की कोशिश की, लेकिन अंततः वह आत्म प्रवंचना ही सिद्ध हुई। महिला के प्रति सामाजिक ही नहीं, राजनीतिक और धार्मिक सत्ता भी निष्ठुर और अन्यायपूर्ण है, यह वास्तविकता हमसे छिपाई जाती है। लोगों के सामने यह हैरान-परेशान करने वाली हकीकत कभी नहीं आ पाती कि यौन हिंसा की 99.1 प्रतिशत घटनाएं लज्जा और संकोच की तहों में दबी रह जाती हैं। निर्भया, आसिफा की वारदातें इसलिए खबर नहीं बनाई जाती कि उनको रोकना है, बल्कि इसके पीछे कोशिश यह होती है कि इस जघन्यता के दायरे को उतने तक ही सीमित मान लिया जाए। दरअसल, जो मामले दर्ज कराए जाते हैं, उनका कारण परिस्थिति विशेष होती है। 2015-16 में परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के लिए दर्ज आंकड़ों के आधार पर पहली बार जुटाए गए नतीजे बताते हैं कि पुलिस और अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो में 90 फीसद से ज्यादा मामले दर्ज ही नहीं होते। इसका कारण है इन हादसों से महिलाआें के अपने ही निकट संबंधी जुड़े होते हैं और प्राय: पति भी अपराध में सक्रिय भूमिका निभाता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर दाम्पत्य जीवन में बलात्कार पर रोक के लिए कानून की मांग की जा रही है, इसीलिए ‘गरिमा यात्रा’ एक शुरुआत है। सफर अभी बहुत लंबा है। अब से पहले इसकी पहुंच आर्थिक और राजनीतिक बिंदुओं तक नहीं थी, इसलिए संकल्प को नया विस्तार देना है तो वर्जनाओं की सीमाएं तोड़नी होंगी, सामाजिक परिधियों से निकलकर राजनीतिक और आर्थिक आकांक्षाओं को रेखांकित करना होगा। ये दोनों क्षेत्र अब तक महिलाओं के दखल से काफी कुछ अछूते रखे गए हैं। राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम से कम 33 प्रतिशत नियत करने का 2008 में पारित प्रस्ताव अब तक अमल में नहीं आ सका है तो इसका वही कारण है। विश्व में इस मामले में भी हम 193 देशों में 152 वें पायदान पर हैं। देश की आबादी में महिलाएं 49 प्रतिशत हैं, लेकिन उनमें से केवल 9.5 लोकसभा और 7 फीसदी विधानसभाओं में चुनकर पहुंच पाती हैं। हमारे पड़ोसी देशों अफगानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन में महिलाओं को राजनीतिक भूमिका में हस्तक्षेप हमसे कहीं ज्यादा अधिकार हैं। अर्थव्यवस्था के गुणा-भाग में भी महिलाओं को हाशिये पर ही रखा जाता रहा है। अर्थशास्त्रियों से पूछा जा सकता है कि महिलाओं की मजदूरी पुरुष से कम क्यों रखी जाती है? क्या यह उसकी पराधीनता को बनाए रखने से प्रेरित नहीं है? जॉन स्टुअर्ट मिल इसका कारण पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बताते हैं। मिल अपनी पुस्तक ‘स्त्री पराधीनता’ में पहली बार महिला के आर्थिक अधिकार की सैद्धांतिक आधार पर बात करते हैं, वह स्त्री को आर्थिक तौर पर स्वायत्त बनाने पर जोर देते हैं और इसके लिए जनतांत्रिक आर्थिक सुधारों की जरूरत बताते हैं। उन्होंने महिलाओं की उत्पादन में भूमिका को स्वीकार किया और उसकी आर्थिक उपेक्षा का कारण संस्कारों और सामाजिक पूर्वाग्रहों को बताया। नारी को संतान को जन्म देने की भूमिका तक ही सीमित रखने के दकियानूसी दृष्टिकोण में बदलाव के लिए पारिवारिक और वैवाहिक सुधारों पर बल दिया। बहरहाल, एक क्रांतिकारी यात्रा ने एक नया, अछूता मुकाम हासिल किया तो यह नयी राह, नयी दिशा की ओर अग्रसर होने का आश्वासन है। अपनी गरिमा के प्रति सचेत हर महिला के पास यातना और आक्रोश की अपनी कहानी है। न्याय का जज़्बा है। इस यात्रा में शामिल भंवरी देवी ने कहा कि न्याय तो लेर छोडसां (न्याय तो लेकर ही रहेंगे)। मर्यादा और लोकलाज के घने पर्दों से बाहर आकर रोशनी दिखाने वाली इस ‘गरिमा यात्रा’ को सलाम! यह जिंदगी का नया पाठ लिखेगी!


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