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इस युद्ध को जनतंत्र के उत्सव में बदलें

Posted On March - 14 - 2019

आम चुनाव

विश्वनाथ सचदेव

जनतंत्र में चुनाव युद्ध नहीं होता। यह सही है कि चुनाव में अलग-अलग पक्ष होते हैं। हर पक्ष के पास अपने ‘अस्त्र-शस्त्र’ होते हैं, अपने दावे, अपने वादे, अपना सच, अपना झूठ। महाभारत का युद्ध जब शुरू हुआ तो दोनों पक्षों के रथियों-महारथियों ने अपने-अपने शंख बजाकर युद्ध के लिए अपनी तैयारी की घोषणा की थी। कुछ-कुछ वैसा ही दृश्य आज देश में दिख रहा है।
चुनाव-आयोग द्वारा आम चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही राजनीतिक दलों ने घोषणाएं शुरू कर दी हैं। व्यूह-रचनाओं में जुटे हुए हैं सब दल। अपनी कमज़ोरियों को छिपाने और दूसरे की कमज़ोरियों को उजागर करने की होड़-सी लगी हुई है। एक-दूसरे के रथियों को अपने पाले में लाने में भी किसी को किसी प्रकार का संकोच नहीं दिख रहा है। यह लड़ाई अगले लगभग दो माह में क्या-क्या गुल खिलाती है, यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा, पर इतना तो अभी से पता चलने लगा है कि इस लड़ाई में भी सब कुछ जायज़ है, की लीक को पीटा जायेगा।
हर चुनाव में इसी तरह के दृश्य दिखाई देते हैं। बात ईमानदार लड़ाई की, की जाती है और सारी चालें बेईमानी के संकेत देती हैं। झूठे वादे, झूठे दावे, झूठे आरोप… सच कहीं खो जाता है इस धमाचौकड़ी में। और वह सच यह है कि जनतंत्र में चुनाव युद्ध नहीं होता। चुनाव उत्सव है जनतंत्र का। युद्ध में सिर्फ जीतने वाला खुशी मनाता है, लेकिन चुनाव में सब खुशी मनाते हैं। आज़ादी पाने के बाद से लेकर अब तक के चुनावों में पहले दो चुनाव ही शायद कुछ अपवाद थे। सन‍् 57 के बाद जितने भी चुनाव देश में हुए हैं, उन्हें उत्सव की नहीं, युद्ध की भावना से ही लिया गया है। लेकिन, जनतंत्र में चुनाव की महत्ता को देखते हुए इस हकीकत को बदलने की ज़रूरत भी महसूस होनी चाहिए। मतदाता को महसूस होनी चाहिए ये ज़रूरत। राजनीतिक दल चुनाव के माध्यम से सत्ता हथियाने की लड़ाई लड़ते हैं। यह दायित्व मतदाता का बनता है कि वह इस लड़ाई को उत्सव में बदलने के पक्ष में खड़ा दिखे। यह देखना उसका काम है कि कौन-सा सैनिक इस लड़ाई में अनुचित बर्ताव कर रहा है। चुनाव यदि लड़ाई है तो यह सच और झूठ के बीच होनी चाहिए, उचित और अनुचित के बीच होनी चाहिए। मतदाता इस लड़ाई का मूकदर्शक नहीं होता, उसकी सक्रिय भूमिका है लड़ाई को उत्सव में बदलने के इस काम में। मतदाता, यानी मेरा और आपका दायित्व बनता है कि हम राजनीतिक दलों की कथनी और करनी पर नज़र रखें।
जागरूकता के सारे तकाज़ों के बावजूद यह सही है कि मतदाता की याददाश्त कमज़ोर होती है। इसलिए आज यह ज़रूरी है कि हम चुनाव के मैदान में खड़े शूरवीरों से उनके कहे-किये का हिसाब पूछें। सत्तारूढ़ पक्ष से हमें यह पूछना है कि पिछले चुनाव में जो सपने उसने दिखाये थे, वे कितने पूरे हुए? हमने देखा था कि पिछला चुनाव, तब के विपक्ष ने, भ्रष्टाचार को मिटाने और विकास के नारे पर लड़ा था। हमें देखना यह है कि भ्रष्टाचार और विकास के इन वादों को पूरा करने के लिए सत्तारूढ़ पक्ष ने क्या-कुछ किया, इस बारे में उसके दावे कितने सच्चे हैं। देखना है कि चुनावों के इस मौके पर उसकी भाषा बदल तो नहीं रही।
जो सामने दिख रहा है, वह यह है कि सत्तारूढ़ पक्ष अब भ्रष्टाचार-मुक्त देश की बात नहीं कर रहा, ‘अच्छे दिन’ लाने की बात भी नहीं हो रही। अब इन सबका स्थान ‘तीव्र राष्ट्रवाद’ के नारों ने ले लिया है। अचानक देश-भक्ति और देशद्रोह की बातें ज़ोरों से होने लगी हैं। इन बातों पर गंभीरता से सोचना होगा मतदाता को। झूठे दावे विपक्ष भी करता है। इन दावों को भी नापा-तोला जाना चाहिए।
हमारे जनतंत्र की एक त्रासदी यह भी है कि हमारी राजनीति में नैतिकता के लिए कोई जगह नहीं दिख रही। नैतिकता का एक मतलब यह भी है कि हमारे राजनेता और राजनीतिक दल अपनी घोषित नीतियों और सिद्धांतों के प्रति कितने ईमानदार हैं। बरसों पहले शुरू हुआ था हमारी राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ का किस्सा। वह आज भी चल रहा है। अंतर यदि है तो सिर्फ यह कि पहले इसे अनैतिक कहा गया था, पर अब इस संदर्भ में किसी नैतिकता की आवश्यकता ही नहीं महसूस की जाती। दलबदल करना कपड़े बदलना जैसा हो गया है। अपना दल छोड़ने में किसी को कोई संकोच नहीं होता और किसी राजनीतिक दल को भी आज इस बात पर कोई एतराज़ नहीं कि आज वह जिस राजनेता का हार पहनाकर स्वागत कर रहा है, कल तक वह उसे गालियां दिया करता था।
आज देश में राजनीतिक शुचिता की कोई बात नहीं होती। राजनेता सिर्फ सत्ता की राजनीति का खेल खेलते हैं। यह खेल उनके लिए युद्ध है। यह युद्ध किसी भी कीमत पर जीतना उन्हें महंगा नहीं लगता। कभी वे धर्म का पत्ता खेलते हैं, कभी जाति का। जनतंत्र की सार्थकता की सबसे बड़ी शर्त मतदाता की जागरूकता है- चुनाव इस जागरूकता को प्रमाणित करने का सबसे बड़ा अवसर!


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