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आतंक का आका पाकिस्तान

Posted On March - 1 - 2019

पुष्परंजन

इमरान खान को सबूत चाहिए कि मसूद अजहर के संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने पुलवामा में आत्मघाती हमला कराया है। दुनियाभर में उनके इस बयान को मूर्खतापूर्ण करार दिया जा रहा है। इस कांड के कुछ घंटे बाद ही जैश-ए-मोहम्मद के प्रवक्ता मुहम्मद हसन ने हमले की जिम्मेदारी ली थी। फिर भी इमरान सबूत मांग रहे हैं। ‘सबूत दीजिए और बातचीत कीजिए‘, ये पाक प्रधानमंत्री के शिगूफे में शामिल है। 1999 और 2019, दो दशक के अंतराल में जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर ने आतंक की इतनी कार्रवाइयां की हैं कि उसके लिए सबूत अब बेमानी से हो चले हैं। 1994 में मसूद अजहर हरकतुल अंसार के समर्थकों और हरकतुल जिहाद अल इस्लामी और अहकत उल मुजाहिद्दीन के बीच विवाद को सुलझाने के लिए श्रीनगर आया था। फरवरी 1994 में वह सुरक्षाबलों के हत्थे चढ़ गया और जेल में डाल दिया गया। 1995 में अल फरान के कुछ अपहर्ताओं ने विदेशी पर्यटकों को श्रीनगर में अगवा किया, उसके बदले मसूद अजहर की रिहाई की मांग करने लगे। इस बीच, एक पर्यटक उनके कब्जे से भाग निकला। सरकार के इनकार के बाद सारे पर्यटकों को आतंकवादियों ने मार दिया। उसके बाद, दिसंबर 1999 में काठमांडू में अजहर के साथियों ने इंडियन एयरलाइंस का विमान आईसी-814 हाईजैक कर लिया। अपहर्ताओं में अजहर का भाई इब्राहिम अजहर भी था। उस हाइजैक विमान को वो कंधार ले गये। उस समय अफगानिस्तान में तालिबान का शासन था। सौदेबाजी शुरू हुई, तब भाजपा नेता व तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह मसूद अजहर समेत 3 आतंकियों को लेकर कंधार गये और अगवा यात्रियों को छुड़ा ले आये। यह दिलचस्प है कि अजीत डोभाल ने तत्कालीन सरकार के उस फैसले की कड़ी आलोचना की थी और उसे ‘कूटनीतिक विफलता‘ कहा था।
मसूद इस कांड के बाद से दुनियाभर के आतंकवादियों और सियासी गलियारों में दुर्दांत चेहरा बन चुका था। उसके 2 साल बाद, 13 दिसंबर 2001 में उसी के दहशतगर्दों ने संसद पर हमले को अंजाम दिया। उससे पहले, 7 दिसंबर 2008 को मुज़फ्फराबाद के एक कैंप में पाकिस्तानी सुरक्षाबलों ने जब मुंबई हमले से जुड़े लोगों को पकड़ा, तब इसकी भी पुष्टि हुई कि मसूद अजहर 26/11 को अंजाम देने में सहयोगी भूमिका में था। पाकिस्तान सरकार उसकी मौजूदगी से इनकार करती रही, लेकिन वह लगातार अपने बहावलपुर स्थित मुख्यालय में देखा जाता रहा। 26 जनवरी, 2014 को मुज़फ्फराबाद की एक रैली को संबोधित करते हुए मसूद अजहर जब देखा गया, तो पाकिस्तान सरकार के पास इसका जवाब नहीं था। जैश-ए-मोहम्मद पाकिस्तान में दिखावे के लिए प्रतिबंधित है। उसके बदले मसूद अजहर उसे ‘अफजल गुरु स्क्वाड‘, अल मुराबितों, तहरीक अल फुक़रान जैसे संगठनों के नाम से आतंक का कारोबार चलाता रहा है। 2 जनवरी 2016 में जब पठानकोट एयरबेस पर हमला हुआ, सरकार ने सारे सबूत पाकिस्तान को मसूद अजहर के खिलाफ मुहैया कराये थे। वहां से आईएसआई और पाक सेना की टीम पठानकोट एयरबेस देख गई, लेकिन उसने लीपापोती के सिवा कुछ नहीं किया। जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने पाकिस्तान में भी बड़े-बड़े कांड किये। 2003 में जनरल मुशर्रफ पर जानलेवा हमला किया, लेकिन सेना और आईएसआई का एक बड़ा हिस्सा इन्हें बख्शता रहा है। मसूद की ताकत तालिबान के अफग़ानिस्तान में दोबारा से आने पर बढ़ी है, इससे इनकार नहीं कर सकते। तहरीके तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) सबसे ताक़तवर ग्रुप है, जिसकी मर्जी के बिना पाकिस्तान-अफग़ानिस्तान का राजनीतिक पत्ता नहीं हिलता। सितंबर 2014 के आसपास की बात है, जब आईएसआईएस ने तहरीके तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के स्थानीय प्रतिनिधियों से संपर्क किया और यह तय किया कि कश्मीर समेत दक्षिण एशिया को अपने निशाने पर लेने के लिए इस इलाके को आतंक का एक नया एपीसेंटर बनाएं। अक्तूबर, 2014 में तालिबान कमांडर अब्दुल रऊफ खादिम इराक गया और वहीं इसका ब्लू प्रिंट तैयार हुआ कि करना क्या है। खुर्रम, खैबर, पेशावर और हांगू ज़िलों के कमांडर ‘टीटीपी’ से तोड़े और इस नये गुट से जोड़े गये। 26 जनवरी 2015 को ‘आईएसआईएस-खुरासान’ की स्थापना की घोषणा की गई। इन दिनों जिस तरह से अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में दोबारा वापसी हो रही है, उससे कश्मीर में अमन की उम्मीद करना बेमानी है। कश्मीर में आईएसआईएस के झंडे गाहे बगाहे दिखते हैं, उसकी वजह यह भी है कि इस नये समूह को ज़मीन मिल रही है और उसकी जड़ें कई सौ मील दूर कंधार तक फैली हुई हैं।
नया पाकिस्तान आतंकवाद की पुरानी शराब की नये सिरे से पैकेजिंग कर रहा है, यह बात पुलवामा अटैक से सामने आ गई है। इमरान के लिए इस समय मसूद अजहर और हाफिज़ सईद भारत के विरुद्ध ‘मिसाइल‘ की तरह हैं। इमरान ने पुलवामा हमले का सबूत मांगा है। सुबूत भारत 2003, 2005 और 2008 में हुए आतंकी हमलों के भी दे चुका है, लेकिन, पाकिस्तान ने किया क्या? अजहर का समकक्ष और मुंबई हमले का मुख्य अभियुक्त हाफिज़ सईद की एक संस्था है ‘तहरीक ए आज़ादी कश्मीर’। उसकी टेरर फंडिंग का सबूत पैरिस स्थित फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) में भारत ने दिया तो जून 2017 में पाकिस्तान के पास उसे प्रतिबंधित करने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा था। 2002 में भी लश्करे तैयबा को ‘बैन’ किया गया था। 2008 में संयुक्त राष्ट्र के दबाव के बाद इसके बैंक खातों को जब्त किया गया और हाफिज़ सईद की विदेश यात्राओं पर रोक लगाई गई। पिछले साल 26/11 की बरसी के दो दिन पहले आतंकी सरगना हाफिज़ सईद को रिहा करने का मकसद हमारे जले पर नमक छिड़कना रहा। लाहौर हाईकोर्ट ने हाफिज़ सईद को छठी बार रिहा करने का आदेश दिया था। हाफिज़ सईद को जब जनवरी 2017 के आखि़र में नज़रबंद किया गया था, उस समय पाकिस्तान के प्रतिरक्षा मंत्री ख्वाज़ा आसिफ की टिप्पणी थी, ‘यह शख्स समाज के लिए ख़तरनाक है।’
हाफिज़ सईद और मसूद अज़हर दोनों की आतंक की दुकान कश्मीर की वजह से चल रही है। यही इनकी यूएसपी भी है। हाफिज़ सईद, अपने इकलौते बेटे तलहा सईद को ‘चीफ ग्लोबल पब्लिशिस्ट‘ बनाकर अपना अक्स तैयार कर रहा है। पंजाब के उधमपुर और गुरदासपुर में जो हमले हुए थे, सुरक्षा एजेंसियों को शक था कि उन आतंकी कार्रवाइयों को तलहा सईद की देखरेख में अंजाम दिया गया था।
24 अक्तूबर 2017 को अमेरिकी विदेशमंत्री रैक्स टिलरसन इस्लामाबाद गये थे। उस यात्रा के दौरान टिलरसन ने 20 आतंकी समूहों की सूची पाकिस्तान को दी थी और यह पूछा था कि इनके सफाये के लिए उसके पास क्या योजना है? उन्होंने कहा कि फाटा (फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरिया) पर जिस तरह से हक्कानी नेटवर्क, जुंदल्ला, तहरीके तालिबान पाकिस्तान सक्रिय हैं, उससे लगता है कि इस पूरे इलाके में उन्हें पाक सेना सरपरस्ती दे रही है। टिलरसन ने पाक-अफगान सीमा पर हरकतुल जिहादी-ए-इस्लामी, जमातुल अहरार, जमातुद दावा अल कुरान, तारिक गिदार ग्रुप जैसे 13 आतंकी गुटों का नाम लिया, जिनका तहरीके तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से संबंध है। टिलरसन ने कश्मीर सीमा पर सक्रिय जैश-ए-मोहम्मद, हरकतुल मुज़ाहिद्दीन, लश्करे तैयबा को विशेष तौर पर उल्लेख किया, जिनकी गतिविधियां रोकने में पाक सरकार नाकाम रही है। सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि कभी सीआईए की आंखों का तारा रहा हाफिज़ सईद अब चीन की गोद में कैसे बैठ गया? यूएन में उसे आतंकी करार देने के प्रस्ताव के लगातार चीनी विरोध की कई वजहें हैं। जनवरी 2017 में हाफिज़ सईद जब नज़रबंद हुआ, उस समय चेंग क्वोफिंग पाकिस्तान गये थे। चेंग क्वोफिंग चीन के उपविदेशमंत्री के साथ विदेश स्थित आतंक निरोधी मामलों के वरिष्ठ अधिकारी हैं। हाफिज सईद को ‘कूटनीतिक कवर’ देने में चीन की जिस तरह लगातार भूमिका रही है, उससे लगता है कि चीन, शिन्चियांग से लेकर, अफगानिस्तान और ग्वादर में हाफिज सईद जैसे दहशतगर्द नेताओं को नाराज नहीं करना चाहता!

आतंकियों का लक्ष्य सत्ता हासिल करना
लोगों की आंखों में धूल झोंकने के लिए धार्मिक आतंकियों ने जिहाद जैसे शब्द का इस्तेमाल किया है। दरअसल, उनका लक्ष्य सत्ता हासिल करना रहा है। इन आतंकी सरगनाओं का असल चेहरा पाकिस्तान के पिछले आम चुनाव में दिख चुका था। संसद में घुसपैठ के लिए आतुर केवल हाफिज सईद नहीं था। कराची से औरंगज़ेब फारूकी है, जो प्रतिबंधित संगठन ‘अहले सुन्नत वल जमात’ और ‘सिपाहे साहबा पाकिस्तान’ से जुड़ा था। वह भी चुनाव में कूद पड़ा। उसने ‘राहे हक पार्टी’ की ओर से पर्चा भरा था। ‘तहरीके लाबायक या रसूल अल्लाह पाकिस्तान‘ तीसरा आतंकी संगठन है, जिससे जुड़े लोग चुनाव मैदान उतरे थे।


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