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सरकार का सियासी कदम

Posted On February - 8 - 2019

हर्षदेव
पूर्वोत्तर राज्यों और बंगाल के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक एक बड़ा राजनीतिक-सामाजिक मुद्दा बन गया है। भाजपा को इस विधेयक में अपना बड़ा सियासी फायदा दिखाई दे रहा है, जबकि राजनीतिक पर्यवेक्षक केंद्र सरकार की इस पहल को पूरी तरह संविधान की मूल भावना और चरित्र के विरुद्ध ठहरा रहे हैं। इस मान्यता का ठोस कारण है, धर्म को नागरिकता के निर्धारण का आधार बनाना। भारत हमेशा धर्म को राजनीतिक फैसलों से अलग रखने का पक्षधर रहा है। संविधान की प्रस्तावना में इसीलिए एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र-राज्य का संकल्प व्यक्त किया गया है। लेकिन नया विधेयक देश के उस दर्शन के निहितार्थ में ही उलटफेर कर सकता है। नागरिकता संशोधन विधेयक 1955 के पुराने कानून के स्थान पर लाया गया है। इसे 2016 में ही तैयार कर लिया गया था, लेकिन लोकसभा में मंजूरी दिलाने का काम आम चुनाव के ठीक पहले किया गया। इसमें पहली बार ऐसा प्रावधान किया गया है कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से देश में आकर बसने वाले सभी गैर-मुस्लिम- हिन्दू, जैन, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी अल्पसंख्यक समुदायों को अब 12 के बजाय केवल छह साल भारत में गुजारने पर (आवश्यक दस्तावेजों के बिना भी) राष्ट्र की नागरिकता सहज ही हासिल हो जाएगीI यह प्रावधान जिन्ना के दो राष्ट्र के सिद्धांत और इस प्रकार पाकिस्तान के नक्शे कदम पर चलने के सिवाय कुछ और नहीं है। इस प्रकार यह संशोधन विधेयक 2016 हमारे संविधान के मूल चरित्र को ही बदल देने वाला होने के साथ ही 1985 के असम समझौते की शर्तों के भी खिलाफ है। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को इस कदम का लाभ बंगाली समुदाय के वोट के रूप में मिलने से ज्यादा देश भर में धार्मिक गोलबंदी के नतीजे में मिल सकता है, लेकिन इस कदम का तात्कालिक दुष्परिणाम पूर्वोत्तर में नये सिरे से उपजी बेचैनी और सामाजिक-राजनीतिक विभाजन के तौर पर सामने आया है। दो सरहदी राज्यों-मिजोरम और मणिपुर में तो पृथकतावादी आवाजें उठाई जाने लगी हैं। देश विरोधी बगावत के ये सुर यहीं न रुके तो हालात और भी चिंताजनक मोड़ ले सकते हैं।


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