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बड़े चौधरी के बोल

Posted On February - 15 - 2019

इनेलो वाले बड़े चौधरी साहब यानी ओमप्रकाश चौटाला पार्टी और परिवार में बिखराव से हो रहे राजनीतिक नुकसान को कम करने की तमाम कोशिशें कर रहे हैं। अपने छोटे बेटे अभय चौटाला को मजबूत करने के लिए तिहाड़ से फरलो पर आते ही पूरे प्रदेश का दौरा कर रहे हैं। यही नहीं, इशारों-इशारों में अपने बड़े बेटे अजय चौटाला व उनके बेटों दुष्यंत व दिग्विजय चौटाला पर भी निशाना साध रहे हैं। बताने वालों का कहना है कि तिहाड़ से फरलो के साथ यह शर्त लगाई गई है कि चौधरी किसी राजनीतिक कार्यक्रम में भाग नहीं ले सकते, लेकिन बड़े चौधरी अपने पुराने तेवरों के साथ ग्राउंड में डटे हैं। अब तो उन्होंने यहां तक कह डाला कि लोकसभा चुनाव में वे पार्टी वर्करों के बीच होंगे और खुलकर प्रचार करेंगे, इसके लिए चाहे उन्हें जेल तोड़कर बाहर आना पड़े। वैसे राजनीति में इस तरह की बातें कह तो दी  जाती है, लेकिन उनके कोई मायने नहीं होते। कहने को तो 2014 के विधानससभा चुनाव में बड़े चौधरी ने यह भी कह दिया था  कि इनेलो की सरकार आएगी और जेल में ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लूंगा।

तिकड़ी के तेवर
हरियाणा में भाजपाई सांसदों राव इंद्रजीत सिंह, धर्मबीर सिंह और रमेश कौशिक के तेवर इन दिनों बदले हुए हैं। पिछले कुछ माह तक मुखर रहने वाले ये नेताजी अब शांत नजर आ रहे हैं। 5 निगमों के चुनाव और जींद उपचुनाव में भाजपा की जीत के बाद इनका कुछ ज्यादा ही हृदय परिवर्तन देखने को मिल रहा है। भिवानी-महेंद्रगढ़ से सांसद धर्मबीर सिंह ने सार्वजनिक तौर पर कह दिया था कि 2019 में वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। अब मन बदला तो कहने लगे कि पार्टी अगर चाहेगी तो वे जरूर चुनाव लड़ेंगे। सोनीपत वाले पंडितजी रमेश कौशिक का मन भी डावांडोल रहा, लेकिन अब वे भी चुनाव लड़ने को तैयार हैं। अब तो टिकट की लॉबिंग भी शुरू हो गई है। खट्टर काका की कार्यशैली पर सवाल उठाने वाले बड़े राव साहब इंद्रजीत सिंह के तेवर भी नरम पड़ते दिख रहे हैं। कमाल है काका, आपकी रणनीति का।

भाजपा की रणनीति
कहने को तो अपने खट्टर काका समेत उनकी पूरी कैबिनेट सार्वजनिक तौर पर यही कह रही है कि लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव नहीं होंगे। पार्टी के हरियाणा मामलों के प्रभारी अनिल जैन भी मीडिया में यह बयान दे चुके हैं, लेकिन अधिकांश सियासी दल अब भी दुविधा में हैं। हर किसी पार्टी के मन में यह बात है कि विधानसभा चुनाव समय से पहले हो सकते हैं। अब कई दल तो ऐसे हैं, जिनकी अभी तक तैयारी भी नहीं है। बताते हैं कि काका की सरकार इसी बात का फायदा उठाने की कोशिश में है। अब सरकार के अंदर भी दो खेमे हैं। कुछ लोग चाहते हैं कि चुनाव समय पर होने चाहिए और कुछ की दलील है कि लोकसभा के साथ ही करवाने में फायदा है। हो चाहे कुछ भी, लेकिन इस असमंजस ने कइयों का खेल बिगाड़ा हुआ है।

सरकार से संगठन में
गुरुग्राम वाले ‘छोटे राव साहब’ अब पार्टी संगठन में सेवाएं देंगे। ‘खट्टर काका’ के विश्वासपात्रों में शामिल जवाहर यादव पहले ऐसे नेता थे, जिनकी सरकार बनने के बाद सबसे पहले सीएमओ में बतौर ओएसडी एंट्री हुई। सालभर बाद ही उनके विरोधियों की वजह से उन्हें सीएमओ से बाहर जाना पड़ा। ओएसडी पद पर अन्य की एंट्री के बाद उन्हें हाउसिंग बोर्ड के चेयरमैन जैसा बड़ा पद सौंपा गया। तीन से भी अधिक वर्षों तक चेयरमैन रहने के बाद जवाहर अब पार्टी संगठन में आ गए हैं। उन्हें भाजपा का संचार एवं प्रचार प्रमुख बनाया गया है। कहने वाले कह रहे हैं कि विरोध करने वालों की यहां भी कमी नहीं थी, लेकिन पहले की तरह इस बार भी काका का पूरा ‘आशीर्वाद’ उन्हें मिला है। इसे जवाहर का कद बढ़ने के तौर पर भी देखा जा रहा है।

पंडितजी पर नजर
जीटी रोड बेल्ट वाले पंडितजी अरविंद शर्मा की रणनीति पर भी कई सियासी दलों की नजरें लगी हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस को अलविदा कहने के बाद उन्होंने बसपा ज्वाइन कर ली थी। बसपा ने उन्हें विधानसभा चुनाव में सीएम भी प्रोजेक्ट किया और पंडितजी ने तीन विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव भी लड़ा, लेकिन तीनों में ही हार का सामना करना पड़ा। बसपा के हाथी से उतरने के बाद अब पंडितजी नये ठिकाने की तलाश में हैं। बताते हैं कि भाजपा और कांग्रेस के साथ-साथ कुछ अन्य दलों में भी उनकी बातचीत चल रही है। कहने वाले कह रहे हैं कि भाजपा वालों ने पंडितजी को ऐसे लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की पेशकश कर दी है, जहां से वे लड़ना नहीं चाहते। ऐसे में अब कांग्रेस पर उनकी नज़रें हैं। जननायक जनता पार्टी के नेताओं के साथ भी बातचीत चलने की खबरें हैं।

ब्यूरोक्रेसी में बदलाव
लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले ही काका की सरकार ने ब्यूरोक्रेसी में बदलाव शुरू कर दिया है। पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ही मौजूदा सरकार भी चुनाव से पहले अपनी पसंद के अफसरों की फील्ड में पोस्टिंग कर रही है। आईएएस और एचसीएस के साथ आईपीएस और एचपीएस के भी थोक में तबादले हो रहे हैं। अभी और भी कई तबादला सूचियां आने वाली हैं। विरोधियों का क्या है वे तो आरोप लगाएंगे ही कि ऐसे अफसरों की पोस्टिंग की जा रही है, जो चुनाव में सरकार के अनुसार चल सकें। अब इन भाई लोगों को कौन समझाए कि ये परंपरा आज से शुरू नहीं हुई, दशकों से चली आ रही है।

-दिनेश भारद्वाज


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