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जानलेवा जाम

Posted On February - 15 - 2019

यूपी और उत्तराखंड में एक ही दिन में जहरीली शराब ने 110 लोगों को मौत की नींद सुला दिया। ऐसा नहीं है कि देश में जहरीली शराब से पहली बार इतनी मौतें हुई हैं। पहले भी कई बार ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। प्रशासन और सरकार इन मौतों के बाद एक बार तो जागते हैं, लेकिन कुछ दिन बाद फिर कुंभकर्णी नींद सो जाते हैं। सस्ती और जहरीली शराब का खेल प्रशासन की नाक के नीचे चलता है और इसका शिकार वे गरीब लोग बनते हैं, जो सस्ती और देशी शराब पीते हैं। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जरूरत है कड़े कदम उठाने की…

हर्षदेव
सुरा प्रेम में भारत का दर्जा दुनिया के अन्य कई देशों से बहुत ऊपर है। विश्व में हमारा खुशहाली सूचकांक गिर रहा है तो शराब की खपत के मामले में तेजी से आगे बढ़ रहा है। 2005 से 2016 के बीच यह खपत दोगुनी हो चुकी है। मनोवैज्ञानिक विश्लेषण बताता है कि आनंद-प्रमोद के व्यसन का रूप ले लेने से व्यक्ति को मानसिक तनाव, असंतोष और हताशा होती है। हमें इसके कारणों की पड़ताल खुशहाली के विश्व सूचकांक में करनी चाहिए। दुनिया के 155 देशों में हम नीचे खिसककर 133वें पायदान पर आ गए हैं, जबकि एक साल पहले हमारी जगह 122वीं थी। यदि आम आदमी बेचैन और परेशान है तो जाहिर है कि वह राहत की तलाश में शराब जैसे नशे का आसान सहारा तलाशता है। उसके लिए पैसा भी चाहिए। भारत जैसे देश में, जहां राज्य सरकारें शाही खर्च पूरे करने के लिए शराब पर भारी-भरकम टैक्स लगाती हों, ऐसे में सस्ती शराब गरीब के लिए वरदान बन जाती है। इसी कमजोरी का फायदा पैसे के लिए जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले उठाते हैं। केंद्र सरकार मानती है कि हर साल 2 से 3 हजार के बीच बेकसूर मासूम जहरीली शराब के कारण जीवन से हाथ धो बैठते हैं।
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में एक बार फिर वही दारुण त्रासदी दोहराई गई है। दोनों राज्यों में जहरीली-सस्ती शराब ने 110 से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुला दिया है और लगभग इतने ही बीमार हैं, जिनका इलाज चल रहा है। यह कथित शराब उत्तराखंड के पवित्र क्षेत्र हरिद्वार में बनी थी और एक पारिवारिक उत्सव के मौके पर मेहमानों को परोसी गई थी। कहने की जरूरत नहीं कि हर थोड़े अंतराल पर लगातार होने वाली ऐसी घटनाएं निकम्मे प्रशासन, भ्रष्टाचार और जनविरोधी नीतियों की ओर ध्यान दिलाती हैं, लेकिन हमदर्दी और दिखावटी कानूनी कार्रवाई वाले खोखले उपायों से आगे हम कभी जा ही नहीं पाते। मौत का यह दुष्चक्र बदस्तूर यूं ही जारी रहता है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसा ही हादसा 2015 में मुंबई के मालवणी में हुआ था, जिसमें 106 मजदूर सस्ती शराब पीने से जान गंवा बैठे थे। यदि उसी इलाके में जाकर देखा जाए तो वहां उसी तरह सस्ती-नकली शराब अब भी बनते मिल जाएगी। निकम्मे प्रशासन और लचर कानून-व्यवस्था की पोल खोलने वाले ऐसे हादसों के तत्काल बाद सरकारी मशीनरी छापे और तलाशी अभियान चलाती है। ज्यादा कोशिश किए बिना ही वह नकली जहरीली शराब बनाने वाले ठिकानों तक पहुंच जाती है और सैकड़ों-हजारों लीटर जानलेवा शराब नष्ट करने की तस्वीरें लेकर वाहवाही के लिए जनता के सामने आ खड़ी होती हैं। अंधाधुंध गिरफ्तारियों के साथ ही कुछ दिन के लिए जहर के ये सौदागर ओझल हो जाते हैं और जैसे ही जनता का रोष कम होने लगता है, वे फिर धंधा शुरू कर देते हैं। हमारे शासकों की कर्तव्यहीनता और गैरजिम्मेदाराना रवैये पर इससे ज्यादा शोचनीय टिप्पणी और क्या हो सकती है!
इस प्रकरण में सबसे जरूरी सवाल यह है कि सरकारें विभागीय जवाबदेही क्यों तय नहीं करती। अवैध शराब के कारोबार पर निगरानी के लिए सभी प्रदेशों में अलग विभाग कार्यरत हैं। ऐसे हादसों के सामने आने पर इन विभागों से न केवल जवाब-तलब किया जाना चाहिए, बल्कि इसके लिए उत्तरदायी अधिकारियों और कर्मचारियों पर दंडात्मक कार्रवाई भी की जानी जरूरी है। प्रशासन करने वाले शायद इन आंकड़ों से खुश हो सकते हैं कि दुनिया में शराब का सबसे बड़ा उपभोक्ता और तीसरा आयातकर्ता भारत है। हालांकि, देश में बहुत बड़े पैमाने पर कारखानों में शराब का उत्पादन होता है। ऐसे बड़े कारखानों की संख्या 10 है। इनमें तैयार की जाने वाली शराब का 70 प्रतिशत देश में ही सुरा प्रेमियों द्वारा इस्तेमाल कर लिया जाता है। फिर भी, ज्यादा सस्ता और आसान नशा मुहैया कराने के लिए शराब के नाम पर जहरीली वस्तुओं से तैयार ऐसे पेय बेचे जाना आम बात है। ये ही जानलेवा बन जाते हैं। देश के 8 राज्य ऐसे हैं, जिनमें ऐसे 70 प्रतिशत हादसों से दो-चार होना पड़ता है। इनमें उत्तर प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना शामिल हैं। ऐसी घटनाएं शराबबंदी वाले गुजरात में भी सामने आ चुकी हैं, हालांकि व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखते हुए इन पर कोई बहुत कारगर कार्रवाई नहीं की गई।
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड हादसों से जुड़ी जानकारी बताती है कि जिस जहरीले पेय को पीने से इतनी बड़ी संख्या में लोग अकाल मृत्यु का शिकार बने, उनकी कीमत सिर्फ 10 रुपये से शुरू होकर 30 रुपये तक थी। यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि शराब पर सभी राज्य सरकारों को टैक्स की दरें घटानी चाहिए, लेकिन इसके खिलाफ एक दलील तो यह है कि शराब सस्ती होगी तो ज्यादा मात्रा में पीने की वजह से लोगों की सेहत से जुड़ी समस्याएं बढ़ेंगी, दूसरी परेशानी आर्थिक है। सभी राज्य सरकारें कम से कम 20 प्रतिशत राजस्व शराब पर टैक्स से जुटाती हैं। जाहिर है, यह राजस्व का एक बड़ा स्रोत है। यही कारण है कि शायद ही किसी राज्य का कोई ऐसा बजट आता हो, जिसमें शराब पर टैक्स न बढ़ाए जाते हों।
राज्य सरकारों की इस पैसा बटोरू लालची नीति ने शराब इतनी महंगी कर दी है कि उस तक पहुंच गरीब आदमी के लिए मुश्किल हो गई। इस परिस्थिति ने ही सस्ती शराब बनाने के लिए संगठित अपराधी गिरोहों को मौका दिया। ये गिरोह सस्ता नशा कई तरीकों से तैयार करते हैं। इनका पूरा तंत्र सुनियोजित ढंग से काम करता है और निगरानी रखने वाले सरकारी अफसरों तथा कर्मचारियों के साथ भी उनकी अच्छी सांठगांठ बनी रहती है। आबकारी विभाग को सस्ता नशा बनाने वालों और बेचने वालों, सबकी जानकारी होती है। सच तो यह है कि इस गैर-कानूनी काम को उन्हीं का संरक्षण रहता है अन्यथा वे इतनी आसानी और कामयाबी से अपने आपराधिक कारोबार को चला ही नहीं सकते। आमतौर पर शराब की 4 किस्में प्रचलित हैं। इनमें पहली है- ताड़ी या कच्ची शराब, जिसे अरक या अर्क, ठर्रा, फैनी आदि कई नामों से जानते हैं। दूसरी है- देशी शराब, तीसरी- बीयर और विदेशी कहकर सेवन की जाने वाली मदिरा और चौथे स्थान पर स्कॉच या वाइन जैसी महंगी आयातित विदेशी शराब है। हम एक पांचवीं किस्म भी रख सकते हैं जो गरीब बस्तियों या दूर-दराज के गांवों में बिना कोशिश के मिल जाती है और जो सबसे सस्ती लागत में तैयार करने के लिए विषैली वस्तुओं से बनाई जाती है।

ऐसे जहरीली बन जाती है शराब
कच्ची शराब अधिक नशीला बनाने के प्रयास में जहरीली हो जाती है। सामान्यत: इसे बनाने में गुड़, शीरा से लहन तैयार किया जाता है। लहन को मिट्टी में दबा दिया जाता है। इसमें यूरिया और बेसरमबेल की पत्ती डाली जाती हैं। अधिक नशीली बनाने के लिए इसमें ऑक्सिटोसिन मिला दिया जाता है, जो थोड़ी भी मात्रा ज्यादा हो जाने पर मौत का कारण बनती है। कुछ जगहों पर कच्ची शराब बनाने के लिए गुड़ में खमीर और यूरिया मिलाकर इसे मिट्टी में दबा दिया जाता है। खमीर उठने पर इसे भट्टी पर चढ़ा दिया जाता है। गर्म होने के बाद जब भाप उठती है, तो उससे शराब उतारी जाती है। इसके अलावा सड़े संतरे, उसके छिलके और सड़े गले अंगूर से भी खमीर तैयार किया जाता है।

मौत की वजह
कच्ची शराब में यूरिया और ऑक्सिटोसिन जैसे केमिकल पदार्थ मिलाने की वजह से मिथाइल एल्कोल्हल बन जाता है। इसकी वजह से ही लोगों की मौत होती है। मिथाइल एल्कोहल के शरीर में जाते ही तेज रासायनिक क्रिया होने लगती है। इसका असर बढ़ने पर शरीर के महत्वपूर्ण अंग जिगर, गुर्दे, फेफड़े काम करना बंद करने लगते हैं। इसकी वजह से कई बार तुरंत मौत हो जाती है। कुछ लोगों में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है।

सबसे ज्यादा पियक्कड़ राज्य
खपत के लिहाज से देश में सबसे पहला नाम आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का है। वहां एक साल में औसत प्रति व्यक्ति 34.5 लीटर या हर सप्ताह 665 मिली लीटर शराब इस्तेमाल की जाती है। कीमती या सस्ती शराब का सीधा ताल्लुक पीने वाले की कमाई और उसके रहन-सहन से रहता है। शहर में कुछ बेहतर किस्म की और गांव में देशी शराब को प्रमुखता से इस्तेमाल किया जाता है।

कहां-कहां पाबंदी
गुजरात, बिहार, केरल, लक्ष्यद्वीप,नागालैंड ,मणिपुर

हाईवे पर शराब बिक्री बैन
देश के हाईवे पर हर साल डेढ़ लाख से भी ज्यादा लोगों की जान चली जाती है। इसका एक प्रमुख कारण शराब के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को माना जाता है। सुप्रीमकोर्ट ने इस दिशा में कदम उठाते हुए राष्ट्रीय राजमार्गों पर बेची जाने वाली शराब के नियमों में सख्ती की है। इन रास्तों से कम से कम 220 मीटर दूर ही शराब की दुकानें खोली जा सकेंगी। पहले के आदेश में यह दूरी 500 मीटर निर्धारित की गई थी, लेकिन राज्य सरकारों और केंद्र की दलीलों के बाद इसे कम कर दिया गया है। उनका तर्क यह था कि पहाड़ी क्षेत्रों में 500 मीटर के फासले पर पहाड़ आ ही जाएगा। इस संशोधन का लाभ सिक्किम, मेघालय, हिमाचल प्रदेश राज्यों को भी मिलेगा। इसी प्रकार का तर्क गोवा के मामले में पेश किया गया कि इतनी कम दूरी पर समुद्र हर स्थान पर आ जाएगा। इस आधार पर वहां भी यह फासला घटा दिया गया।
अदालत से कुछ राज्यों ने यह गुहार भी लगाई गई कि वहां शराब बंदी लागू की जाए। इनमें झारखंड, छत्तीसगढ़ शामिल हैं। एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि शराब की दुकानों का संचालन नहीं, नशे के कारोबार पर नियंत्रण करना सरकारों का काम है, इसलिए जो निगम या सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं, उनको इससे हट जाना चाहिए।


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