अल-कायदा से जुड़े 3 आतंकवादी ढेर, जाकिर मूसा गिरोह का खात्मा !    एटीएम, रुपये छीनकर भाग रहे बदमाश को लड़की ने दबोचा !    दुष्कर्म के प्रयास में कोचिंग सेंटर का शिक्षक दोषी करार !    सिविल अस्पताल में तोड़फोड़ के बाद हड़ताल !    पीठासीन अधिकारी सहित 3 गिरफ्तार !    ‘या तो गोहाना छोड़ दे नहीं तो गोलियों से भून देंगे’ !    अमेरिका भारत-पाक के बीच सीधी वार्ता का समर्थक !    कुंडू ने की ज्यादा एजेंट बैठाने की मांग !    मनी लांड्रिंग : इकबाल मिर्ची का सहयोगी गिरफ्तार !    छात्रा की याचिका पर एसआईटी, चिन्मयानंद से जवाब तलब !    

युवाओं का हक

Posted On January - 11 - 2019

मधुरेन्द्र सिन्हा
देश के 25 करोड़ किशोरों-युवाओं के लिए एक बड़े प्रयास की शुरुआत हो गई है। दुनिया में सबसे ज्यादा किशोर भारत में हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने दुनियाभर के किशोरों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार दिलाने का आह्वान किया है और भारत उसका हिस्सा बना है। एक महत्वाकांक्षी, लेकिन संभव हो सकने वाले बड़े अभियान के लिए न केवल संयुक्त राष्ट्र, बल्कि भारत के कई साझीदार इसमें शामिल हुए हैं। इनमें निजी कारोबारी, बिजनेस चैंबर्स, एनजीओ, शेयर बाजार, नीति आयोग सभी ने शिरकत की है। अब इस दिशा में काम करने की तैयारी हो रही है। यह महती प्रयास देश के करोड़ों युवाओं के सपनों को साकार कर सकता है और उनके घरों में रोशनी बिखेर सकता है। यह देश को आर्थिक रूप से और आगे ले जाने की एक अभूतपूर्व कोशिश है।
इस पहल के तहत 10 से 24 वर्ष के किशोरों और युवाओं के लिए शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, रोजगार या उद्यमिता की व्यवस्था कराने के लिए बड़े पैमाने पर निजी कारोबारियों ने हाथ मिलाया है। संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में यह कदम उठाया जा रहा है, जिससे देश के युवा वर्ग को उसका हक मिले। यूनिसेफ ने नीति आयोग के साथ मिलकर और पहल कर इस दिशा में काम करने के लिए एक खाका खींचा है, जिससे देश के करोड़ों नौजवानों-नवयुवतियों को समुचित शिक्षा और रोजगार मिल सकेगा। लेकिन यह महत्वाकांक्षी सामाजिक आर्थिक अभियान चुनौतियों से भरा हुआ है। धन के अलावा प्रशिक्षण देने वाले स्वंयसेवियों और शिक्षित कार्यकर्ताओं की देश में कमी है और इसलिए समाज के हर तबके के लोगों को आगे आना होगा। यह भी कोई आसान नहीं है। इतनी बड़ी तादाद में प्रोफेशनल्स को एक मंच पर इकट्ठा करना बड़ी चुनौती है। इसलिए नीति आयोग और यूनिसेफ ने सभी को इसमें शामिल करने का आह्वान किया है।
इस मंच पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगे आने से उत्साह बढ़ा है। माइक्रोसॉफ्ट इंडिया के पूर्व चेयरमैन रवि वेंकटेश, जो हाल ही में अपना पद छोड़कर यूनिसेफ में विशेष प्रतिनिधि बने हैं, इस दिशा में पहल कर रहे हैं। इस अभियान से जुड़े सभी पक्ष अपनी तरह का योगदान कर रहे हैं, जिससे सभी को समान आर्थिक अवसर मिल सकें। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों, सिविल सोसायटी से जुड़े संगठन, राज्य सरकारें, प्राइवेट सेक्टर सभी तरह की चुनौतियों से निपटने की रूप-रेखा तैयार कर रहे हैं और साथ ही समाधान की तलाश कर रहे हैं। इसके लिए कई स्तरों पर साझेदारियां की जाएंगी और नये रास्तों की तलाश की जाएगी। इस महती प्रयास से ही बड़े पैमाने पर आर्थिक अवसर पैदा होंगे। यह देखना भी संतोष का विषय है कि भारत के निजी क्षेत्र ने भी इस दिशा में काफी सहयोगा करने की इच्छा जताई है। यूनिसेफ की ईडी हेनरिता फोर भारतीय बिज़नेस घरानों की इस बात के लिए प्रशंसा करती हैं कि उन्होंने हमेशा इस तरह के सामाजिक बदलाव के कार्यक्रमों में समाज का साथ दिया है। उनका मानना है कि बिज़नेस से लाभ तभी हो सकता है, जब उसके प्रयासों से समाज स्वस्थ और शिक्षित बनता हो। लाभ कामाने के लिए समाज के कमज़ोर वर्ग को ऊपर उठाना भी जरूरी है। बिजनेस के जरिये बच्चों को शिक्षित और स्वस्थ बनाए रखना एक बड़ा लक्ष्य है। इस दिशा में इस अभियान के तहत काम करने की बड़ी जरूरत है। 2030 तक भारत के हर बच्चे को स्कूल की शिक्षा मिलनी चाहिए और साथ ही उन्हें उनके उम्र के हिसाब से प्रशिक्षण भी मिले ताकि उनके लिए रोजगार के रास्ते खुलें।
कौशल प्रशिक्षण में निवेश जरूरी
भारत में युवा वर्ग को पैरों पर खड़ा करने के लिए यह जरूरी है कि शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण में भारी निवेश किया जाए। 25 करोड़ से भी ज्यदा बच्चों और युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए भारी राशि की जरूरत होगी, जो अकेले सराकर के बूते का नहीं है। यह सर्वविदित है कि युवा कुछ भी कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी है उचित शिक्षा, कौशल और सही मार्गदर्शन। इस कार्य में प्राइवेट बिजनेस और उद्यमियों के योगदान से सफलता मिलेगी, क्योंकि उनके पास पूंजी और कौशल है। प्राइवेट-पब्लिक भागीदारी में देश में बड़े-बड़े काम हुए हैं और आगे भी हो सकते हैं। युवाओं के लिए शुरू किए जा रहे इस विशाल अभियान में उनकी भागीदारी से ही आगे का रास्ता खुलेगा। देश में प्राइवेट-पब्लिक भागीदारी से बड़े-बड़े काम हुए हैं। पुल बने हैं, हाईवे तैयार हुए हैं, अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट निर्मित हुए हैं और भी न जाने कितने काम हुए हैं। इस समाजिक-आर्थिक अभियान में ये दोनों ही आगे बढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, यह देखना सुखद है। इन दोनों की भागीदारी के साथ ही बुद्धिजीवियों, उद्यमियों, ट्रेनरों का बड़े पैमाने पर सहयोग चाहिए होगा, जिनके मिलने की पूरी संभावना है। इस समय वे सभी इस मंच पर आ रहे हैं और हाथ बंटा रहे हैं। प्राइवेट बिजनेस का साथ मिलने से सरकार की धन लाने की चिंता भी कम हो गई है और नये रास्ते खुलने की संभावना भी बढ़ गई है, लेकिन इनके साथ युवा वर्ग को भी सामने आना होगा और इस अभियान को सफल बनाने में अपना हाथ बंटाना होगा, क्योंकि उनके योगदान के बिना इतना बड़ा अभियान सफल नहीं हो सकता है।
इस देश की खासियत यह है कि यहां तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद बड़े अभियानों में सभी साथ आ जाते हैं। चेचक और पोलियो के उन्मूलन में यह बात साबित हुई है। केरल के बाढ़ग्रस्त लोगों की मदद के लिए जिस तरह से देशभर के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, उससे यह बात और भी पुख्ता हुई है। भारत ने मातृत्व मृत्यु दर को घटाने और बच्चों को स्कूल भेजने में सफलता पाई है, लेकिन अभी भी करोड़ों बच्चे शिक्षा और कौशल के अभाव का सामना कर रहे हैं। उनके लिए जिंदगी का दूसरा चरण औरों के हाथों में है। उन्हें शिक्षा दिलाना, उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखना और उन्हें कौशल उपलब्ध कराना अकेले किसी सरकार के बस में नहीं है। इसमें सभी का खासकर निजी उद्यमियों, एनजीओ, स्वयंसेवियों और विद्वानों का साथ चाहिए। सभी मिलकर ही उनके लिए इस महायज्ञ को पूरा कर पाएंगे और उसके बाद एक पूरी शृंखला बन जाएगी। देश को फिलहाल इसी महायज्ञ की जरूरत है और इसमें आहुति डालने के लिए करोड़ों हाथों की जरूरत होगी।
रोजगार सृजन में पिछड़ रहा देश
दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत में आर्थिक विकास ने जिस गति से गति पकड़ी है, रोजगार के अवसर उसके मुकाबले बहुत धीमे हैं। हाल ही में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की जॉब्स के मामले में आयी रिपोर्ट भी यही कहती है। यह रिपोर्ट बताती है कि देश की मौजूदा 7 प्रतिशत की विकास दर के बावजूद रोजगार देने में महज एक प्रतिशत सुधार हुआ है, जबकि 1970 और 80 के दशक में 3 से 4 प्रतिशत की विकास दर के साथ रोजगार सृजन में 2 प्रतिशत का सुधार था। ऐसे में हम पुराने ढर्रे पर भी ध्यान देते तो मौजूदा हालात में रोजगार सृजन में कम-से-कम 4 प्रतिशत बढ़ोतरी होनी चाहिए थी, लेकिन हालत यह है कि 2015 में देश में बेरोजगारी दर बढ़कर 5 प्रतिशत हो गई थी, जो पिछले कम-से-कम 20 वर्षों में सबसे ज्यादा रही। इससे निपटने के लिए केंद्र सरकार को सकारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। अच्छा
हो कि एक राष्ट्रीय रोजगार पॉलिसी बनाई जाए।
अच्छी नौकरियां महज 17%
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की इस रिसर्च में सामने आया है कि ग्रोथ और जॉब्स के बीच घटते अनुपात का मुख्य कारण कौशल और अच्छी नौकरियों के बीच तालमेल बिगड़ना है। देश में 47 करोड़ 70 लाख के वर्कफोर्स में कथित तौर पर अच्छी नौकरियों की हिस्सेदारी महज 17 प्रतिशत है। स्टडी में पाया गया है कि जॉब की तलाश में जुटे 2 करोड़ 30 लाख युवाओं में से एक-तिहाई से ज्यादा ग्रैजुएट या इससे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं।


Comments Off on युवाओं का हक
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.