पराली से धुआं नहीं अब बिजली बनेगी !    विवाद : पत्नी को पीट कर मार डाला !    हरियाणा : कांग्रेस पहुंची चुनाव आयोग !    बाबर की ऐतिहासिक भूल सुधारने की जरूरत : हिन्दू पक्ष !    आतंकियों की घुसपैठ कराने की कोशिश में पाकिस्तान !    आस्ट्रेलियाई महिला टी20 टीम को पुरुष टीम के बराबर मिलेगी इनामी राशि !    पनामा लीक : दिल्ली हाईकोर्ट ने मांगी स्टेटस रिपोर्ट !    हादसे में परिवार के 3 सदस्यों समेत 5 की मौत !    पुलिस स्टेट नहीं बन रहा हांगकांग : कैरी लैम !    प्रदर्शन के बाद खाताधारक की हार्ट अटैक से मौत !    

बदले-बदले माननीय

Posted On January - 18 - 2019

हरीश लखेड़ा
लोकतंत्र का असली परीक्षण किसी भी व्यक्ति की इस क्षमता में है कि वह वही काम करे, जिसकी वह दूसरों से उम्मीद करता है। यह शब्द उन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हैं, जिनकी विशाल प्रतिमा संसद भवन परिसर में लगी है और संसद सत्र के दौरान विपक्षी दल आए दिन सरकार के प्रति रोष प्रकट करते रहते हैं। गांधीजी चाहते थे कि जनप्रतिनिधि समाजसेवक की तरह काम करें। अब सवाल यह है कि क्या जनप्रतिनिधि समाजसेवक की तरह काम कर रहे हैं? अगर ऐसा होता तो संसद में रोजाना हंगामे की जगह खूब चर्चाएं होतीं। लेकिन ऐसा नहीं होता। संसद के इस अंतिम शीतकालीन सत्र का भी अधिकतर समय हंगामे की भेंट चढ़ गया। संसद के जिस उच्च सदन से सबसे ज्यादा गंभीर और संसदीय व्यवहार की उम्मीद की जाती है। उस राज्यसभा में लोकसभा से ज्यादा समय हंगामा हुआ। लोकसभा की 17 बैठकों में से लगभग 63 घंटे और राज्यसभा की 18 बैठकों में से 78 घंटे से ज्यादा समय बर्बाद हुआ।
पिछले कुछ साल से ऐसा लगातार बढ़ रहा है। 16वीं लोकसभा से विदाई की बेला में भी ‘माननीय’ सांसदों ने देश की ज्वलंत समस्याओं को उठाने व अहम विधेयकों पर चर्चा करने के लिए इसका सदुपयोग नहीं किया। सांसदों के व्यवहार से यही संदेश जा रहा है कि संसद सत्र उनके लिए दिल्ली में ‘मौज’ करने जैसा है। संसद में हंगामा, अपशब्दों और माननीयों के व्यवहार के कारण आम लोगों में संसद और सांसदों के प्रति आदर की भावना घटने लगी है। यह सवाल भी उठने लगा है कि अब प्रत्येक सासंद से पूछा जाए कि 5 साल में उनकी क्या उपलब्धियां रहीं। वे सदन में कितने दिन मौजूद रहे। कितने सवाल पूछे। जनहित के कितने मुद्दे उठाए। कितनी चर्चाओं में भाग लिया। सांसद निधि से कितना खर्च किया। जिस तरह से सरकार से 5 साल के कामकाज का हिसाब मांगा जाता है, सांसदों से भी उनके 5 साल के कामकाज का हिसाब क्यों नहीं मांगा जाना चाहिए? क्योंकि लोगों की मेहनत की गाढ़ी कमाई में से जमा सरकारी खजाने से प्रत्येक सांसद को 50 हजार रुपये का वेतन व सत्र के दौरान हाजिरी रजिस्टर में हस्ताक्षर करने भर से ही उन्हें 2 हजार रुपये रोजाना भत्ता मिलता है। प्रति माह 45 हजार रुपये व कार्यालय के खर्च के लिए मिलते हैं। इसमें से 15 हजार रुपये स्टेशनरी पर खर्च हो सकते हैं। सहायक के लिए 30 हजार तथा हर तीन महीने में 50 हजार रुपये कपड़े धुलवाने के लिए उन्हें मिलते हैं। लगभग असीमित हवाई, ट्रेन व सड़क यात्रा सुविधा मिलती है। सासंद रहते हुए दिल्ली के पॉश इलाकों में बड़े बंगले या फ्लैट मिले हैं। उनमें मामूली दर पर बिजली -पानी मिलता है। संसद की कैंटीन में भी रियायती दर पर भोजन आदि उपलब्ध है।
रिटायर होने पर 20 हजार रुपये प्रति माह पेंशन मिलती है। मृत्यु होने पर आश्रितों के लिए पेंशन का प्रावधान है। पूर्व सांसदों के लिए पेंशन की व्यवस्था सभी लोकतांत्रिक देशों में है। ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया, बेल्जियम, आयरलैंड, नीदरलैंड, जिम्बाब्वे, आस्टि्रया जैसे देशों में सांसद अपने पेंशन फंड में वेतन से योगदान करते हैं। उन्हें पेंशन उस दिन से मिलती है, जब वे उतनी आयु के हो जाएंगे, जो उस देश में शासकीय सेवकों की सेवानिवृत्ति की आयु है। जैसे यदि फ्रांस में शासकीय कर्मचारी की सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष है तो वहां के सांसदों को 60 वर्ष के होने के बाद ही पेंशन मिलेगी। दूसरी ओर, हमारे यहां सांसद अपने वेतन से बिना किसी योगदान के पेंशन पाते हैं। यदि किसी भी उम्र में कोई नेता एक साल भी सांसद रह जाता है तो उन्हें रिटायर होने के दिन से ही पेंशन मिलने लग जाती है और उम्रभर मिलती है। यदि वह पहले विधायक रह चुका है तो विधायक वाली पेंशन भी मिलती है, यानी वह नेता दो-दो पेंशन पाता है। सांसद पहले की तुलना में अब मालामाल हैं। 1946 में सांसदों को मात्र 45 रुपये भत्ता मिलता था। आज मोटी रकम और सुविधाओं के बावजूद सांसदों का कार्य प्रदर्शन निराशाजनक है। अंतिम सत्र में लोकसभा में हर दिन 100 से ज्यादा सांसद गैरहाजिर रहे।

न सवाल-जवाब, न चर्चा
सालभर में संसद की 3 बैठकें होती हैं। बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र। दोनों सदनों की बैठकें सुबह 11 बजे से शुरू होकर शाम को छह बजे समाप्त होने का नियम है, लेकिन आवश्यकता अनुसार बैठकें देर रात तक भी चल सकती हैं। पहले एक घंटे के प्रश्नकाल में मंत्रियों से लिखित व मौखिक सवाल पूछे जाते हैं। इसके बाद, शून्यकाल में जनहित के मुद्दे उठाए जाते हैं। उसके बाद विधायी कार्य और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा होती है। लंबे समय से हंगामे के कारण संसद में नियमित प्रश्नकाल नहीं हो पा रहा। सवालों के जवाब तैयार करने में संसद से लेकर मंत्रालयों में 21 दिन लगते हैं। सवाल पूछने से सरकार को जवाबदेह बनाया जाता है। मंत्रियों के कामकाज पर नजर रखी जाती है। विधेयक भी बिना चर्चा के पारित कर दिए जा रहे हैं। संसद भवन में संविधान सभा की पहली बैठक 17 नवंबर 1947 को हुई थी। इन 72 वर्षों में ‘माननीय’ सांसदों का संसार बदल गया है। पहले यहां देश निर्माण को लेकर गंभीर चर्चाएं होती थीं। आज तू-तू, मैं-मैं आम है। यह सच है कि समय के साथ संसद की भूमिका भी बदली है। सांसद पहले से मुखर हुए हैं। संसद में पहली और दूसरी लोकसभा का 59 फीसदी समय कानून बनाने में बीता था। अब मात्र 12 से 20 फीसदी समय ही कानून बनाने में लग रहा है। लोकतंत्र में हंगामा विरोध करने का बड़ा अस्त्र है, लेकिन संसद का अधिकतम समय हंगामे की भेंट चढ़ जाए तो इस पर उंगली उठना लाजमी है। 2010 में भाजपा ने पूरा सत्र ही हंगामे की भेंट चढ़ा दिया था, अब वह सत्ता में है तो कांग्रेस व अन्य दलों ने 2018 में बजट सत्र के दूसरे चरण को ठप कर दिया था। इसलिए, सांसदों के लिए भी ‘नो वर्क, नो सेलरी’ की मांग उठ रही है। कई सांसदों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने से माननीयों की छवि पर उंगलियां उठने लगी हैं।

कम हुई बैठकें
संसद की बैठकें लगातार घट रही हैं। अखिल भारतीय स्पीकर्स फोरम की सिफारिश है कि संसद और बड़े राज्यों में विधानसभाओं की साल में कम से कम 100 और छोटे राज्यों में 60 बैठकें होनी चाहिए। मौजूदा भाजपा सरकार और पूर्व यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में सालाना बैठकों का औसत 62 है। हालांकि, दलील दी जाती है कि पहले संसदीय समितियां नहीं थीं, इसलिए बैठकें ज्यादा होती थीं। पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के समय में साल में औसतन 100 बैठकें होती थीं। एक साल तो 151 बैठकें हुईं। राजीव गांधी के समय तक कई बार 100 बैठकें हुईं। उसके बाद से 100 बैठकें नहीं हुईं हैं। इंग्लैंड के हाउस ऑफ कॉमन्स की साल में 140 बैठकें होती हैं। बदले हालात में संसद के नियमों में परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की जा रही है। ऐसे नियम बनाने की मांग हो रही है कि हंगामा करते हुए यदि कोई सांसद वेल में आ जाए तो वह स्वत: ही सदन की कार्यवाही से निलंबित हो जाएगा। स्पीकर सुमित्रा महाजन की अध्यक्षता वाली रूल्स कमेटी यह मामला देख रही है। वैसे इस बार लंबे समय बाद 46 सांसदों को हंगामे के कारण कुछ बैठकों से निलंबित किया गया। बहरहाल, अब सभी नयी लोकसभा के चुनाव की तैयारी में लग गए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि 17वीं लोकसभा में यह सब नहीं होगा।

संसद का एक मिनट 3 लाख का
संसद की एक मिनट की कार्यवाही पर लगभग तीन लाख रुपये खर्च होते हैं। इस तथ्य के बावजूद सांसदों के हंगामें से संसद के हर सत्र में औसतन 60-70 घंटे बर्बाद होते हैं। वर्ष 2012 में तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने भी कहा था कि संसदीय कार्यवाही बाधित होने के कारण प्रति मिनट ढाई लाख रुपये बर्बाद होते हैं। अब यह राशि लगभग 3 लाख रुपये प्रति मिनट हो गई है। 1951 में संसद की कार्यवाही का प्रति मिनट खर्च सिर्फ 100 रुपये था। वर्ष 1966 तक यह बढ़कर 300 रुपये प्रति मिनट पहुंच गया। 90 के दशक में यह प्रति मिनट 1,642 रुपये हो गया। पिछले 25 साल में 15वीं लोकसभा में हंगामे से 891 घंटे बर्बाद हुए। 14वीं लोकसभा में 19.58 फीसदी और 15वीं में 41.6 फीसदी समय बर्बाद हुआ। इस 16वीं लोकसभा के अंतिम पूर्ण सत्र में 62. 42 घंटे हंगामा हुआ, जबकि कामकाज 46. 48 फीसदी ही हो पाया।

कब कितनी बैठकें
वर्ष            सरकार          बैठकें
1998        एनडीए           64
2008       यूपीए             46
2018       एनडीए            62

सांसद निधि
हर सांसद को क्षेत्र के विकास के लिए हर साल 5 करोड़ रुपये मिलते हैं। यानी 5 साल में 25-25 करोड़ रुपये मिले हैं।

1978 करोड़ रुपये नहीं हुए खर्च

16वीं लोकसभा में सांसद निधि के अब तक 1978.14 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो पाए हैं। पीएम मोदी 87.93 % और राहुल गांधी 85.35% खर्च कर पाए हैं। लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन 84.46 %। सोनिया गांधी ने 76.16 %, मुलायम यादव ने 79.83 % राशि ही खर्च की है। सांसद निधि खर्चने में बाकी सांसदों का हाल इससे भी खराब है।

इन्होंने खोला जनता के लिए खजाना

 

 

 

 

कई तो 10 करोड़ भी नहीं खर्च पाए
कई सासंदों ने 10 करोड़ से ज्यादा की राशि खर्च नहीं की है। इनमें अलवर से सांसद करण यादव के 17. 64 करोड़, पटोले भंडारागोडिया से सासंद नागेंद्र पाल्गुन राव के 17.50 करोड़, सारन से सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी के 15.50 करोड़ रुपये अभी बिना खर्च के पड़े हैं।


Comments Off on बदले-बदले माननीय
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.