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दुविधा में राव

Posted On January - 3 - 2019

‘रामपुरा हाउस’ वाले बड़े राव साहब इन दिनों दुविधा में हैं। राजनीतिक हवाओं को पढ़ने के माहिर राव साहब इस बार फैसला नहीं कर पा रहे हैं। उनके खासमखास अहीरवाल के 4 विधायकों के बागी तेवर पिछले सप्ताह देखने को मिल चुके हैं। ‘खट्टर काका’ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उम्मीद थी कि चार के साथ चार-पांच और भी जुड़ेंगे, लेकिन रणनीति काम नहीं कर पाई। सवा चार साल में काका भी सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी बन चुके हैं। इधर, राव समर्थक विधायकों ने मोर्चा खोला और उधर काका खेमे ने हाथों-हाथ जवाब दे दिया। वैसे राव साहब को काका से इतनी परेशानी नहीं है, जितनी उन्हें काका के खासमखास ‘छोटे राव साहब’ से है। अब बड़े के होते छोटे को महत्व अधिक मिलेगा तो बड़े को परेशानी होना स्वाभाविक है। वैसे राव साहब के लिए यह दौर नया नहीं है। अपने सांघी वाले ताऊ यानी हुड्डा सरकार में भी ये बड़े साहब वहां के दूसरे राव साहबों की वजह से ऐसे ही हालात देख चुके हैं। तब तो हाथ को छोड़ दिया था, मगर अब ‘भगवा’ में रंग चुके राव साहब इस मुकाम पर पहुंच कर करें भी तो क्या।
बिजली के झटके
जब नाम ही ‘बिजली’ है तो ‘झटके’ भी मिलेंगे ही। अपने पलवल वाले चार्जशीट के ‘मास्टर’ यानी कर्ण दलाल को निगमों में आईपीएस अफसर की सेवाएं रास नहीं आ रही। सैकड़ों-हजारों करोड़ के घोटाले के आरोप लगा दिए हैं। विधानसभा में भी दलाल साहब ने अपने ‘खट्टर काका’ को घरने का कोई मौका नहीं छोड़ा। वैसे ऐसे ही कई बड़े आरोप पूर्व की सरकार पर भी लगते रहे हैं। एक बड़ा मामला तो रफा-दफा भी हो गया था। अब जब चार्जशीट मास्टर ने बात छेड़ ही तो काका ने भी ‘झटका’ देते हुए ऐलान कर डाला कि दलाल जिन घोटाले के आरोप लगा रहे हैं, उसकी उच्च स्तरीय जांच होगी। इधर, घरों के ऊपर से गुजर रही हाई-टेंशन वायर हटाने का फैसला लेकर सरकार ने बड़ी राहत भी देने का काम किया है। एक वह वक्त भी था जब हुड्डा सरकार में सोनीपत से भाजपा विधायक कविता जैन ने इस मुद्दे पर पूरी विधानसभा को सोचने पर मजबूर कर दिया था। सदन में विपक्ष ही नहीं, सत्तापक्ष (कांग्रेस) ने भी सरकार को तारें हटाने के लिए मजबूर कर दिया था, लेकिन फैसला नहीं हुआ।
बीरेंद्र का सपना
बांगर वाले चौधरी साहब का ‘सपना’ अभी टूटा नहीं है। उन्हें अब भी उम्मीद है कि एक दिन उनके नाम की ‘लाटरी’ जरूर खुलेगी। पिछले दिनों जींद में पत्रकारों से बातचीत के दौरान पुराने ‘जख्म’ फिर हरे हो गए। इसी दिन आईएएस बेटे की राजनीति में लॉन्चिंग के लिए किसानों का कार्यक्रम रखा था। नेताजी ने अपने ‘मन की बात’ फिर साझा करते हुए बड़ी बात कह दी। कहने लगे, राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। कुछ नहीं पता, कब ‘दिल्ली दरबार’ से फोन आ जाए और ‘बड़ी कुर्सी’ का सपना पूरा हो जाए। साहब, सपने तो सपने होते हैं। बहुत कम ही ऐसे लोग हैं, जो सपनों को हकीकत बनते देख पाते हैं।
भाई का गुस्सा
इनेलो वाले बिल्लू भाई का ‘गुस्सा’ शांत होने का नाम नहीं ले रहा। कुछ तो उनकी आवाज ही ऐसी है कि रुटीन बातचीत में भी सामने वाले को लगता है कि बिल्लू भाई गुस्सा कर रहे हैं। अब शीतकालीन सत्र को ही ले लें। एक ही दिन का सत्र था, लेकिन इसमें भी ऐसा ड्रामा हो गया कि भाई साहब के नजदीकियों को सफाई देनी पड़ी। मानसून सत्र में तो बिल्लू भाई ने खुद ही जूता निकाल लिया था। इस बार उनके खासमखास हथीन विधायक केहर सिंह रावत ने राज्य मंत्री कृष्ण बेदी की तरफ हाथ उठा दिया। कहते हैं कि अधिक गुस्सा न तो सेहत के लिए अच्छा है और न ही राजनीति के लिए।
अजय का आगमन
ओपी चौटाला के बेटे और पूर्व सांसद अजय चौटाला एक बार फिर 14 दिन के फरलो पर तिहाड़ से बाहर आ चुके हैं। इस बार उनका आगमन ऐसे मौके पर हुआ है, जब उनके सांसद बेटे दुष्यंत चौटाला को उनके साथ की सबसे अधिक जरूरत थी। इधर, जींद उपचुनाव की घोषणा हुई और उधर अजय ने तिहाड़ से बाहर कदम रखे। जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) का यह पहला चुनाव होगा, इसलिए जोर भी पूरा लगेगा। अजय को बड़ा रणनीतिकार माना जाता है। ऐसे में अब उपचुनाव में वे बेटे के साथ मिलकर क्या रणनीति तय करते हैं, यह देखना बड़ा रोचक रहेगा। नतीजे चाहे कुछ भी हों, लेकिन अजय का यह आगमन, दुष्यंत के लिए ‘वरदान’ से कम नहीं है।
लंच डिप्लोमेसी
‘खट्टर काका’ भी अब बदले-बदले नज़र आने लगे हैं। वैसे तो सालभर से काका की कार्यशैली और व्यवहार में काफी बदलाव है, लेकिन अब चूंकि चुनावी वर्ष है तो काका भी खुलकर बैटिंग के मूड में हैं। पांच राज्यों में भाजपा की हार के बाद भाजपाइयों का मनोबल तो जरूर टूटा, लेकिन हरियाणा के 5 नगर निगमों में जीत हासिल कर काका ने अपने वर्करों के हौसले बढ़ाने में कसर नहीं छोड़ी। नये साल के मौके पर भी काका अपने कैबिनेट सहयोगियों, बोर्ड-निगमों के चेयरमैन तथा आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के साथ लंच करते नजर आए। मीडिया भी लंच में आमंत्रित था। काका की यह लंच डिप्लोमेसी इसलिए भी चर्चाओं में रही कि सभी आने वालों से निजी तौर पर मिले और उनके परिवार के बारे में कुशलक्षेम भी पूछा।
जींद उपचुनाव
जींद उपचुनाव की घोषणा हो चुकी है। सभी सियासी दलों के लिए यह उपचुनाव अहम है। सत्तारूढ़ भाजपा उपचुनाव में जीत हासिल कर बांगर बेल्ट में बढ़त चाहती है। साथ ही, इस चुनाव के नतीजों से आगामी लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों के लिए भी मजबूत ग्राउंड तैयार हो जाएगा। सीट इनेलो विधायक डॉ. हरिचंद मिड्ढा के निधन से खाली हुई, इसलिए इनेलो की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। अब तो इनेलो का बसपा के साथ गठबंधन भी है। ऐसे हालात में हुई जरा सी चूक आगे, भारी पड़ सकती है। कांग्रेसियों में पहले से ही लट्ठ बज रहे हैं। अब भी एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ा गया तो फिर मुश्किलें ही मुश्किलें होंगी। नयी जननायक जनता पार्टी बनाने वाले सांसद दुष्यंत चौटाला के लिए खोने को बेशक कुछ नहीं है, लेकिन पाने को बहुत कुछ है। उपचुनाव में जीत ‘सिकंदर’ भी बना सकती है और बुरी हार हुई तो मंसूबे शुरुआती दौर में ही ध्वस्त भी हो सकते हैं।
आखिर में फीलिंग
यमुनानगर, करनाल, पानीपत, रोहतक और हिसार नगर निगम के मेयर इस बार सीधे चुनकर आए हैं, इसलिए मेयर की फीलिंग में भी मजा आ रहा है। मेयर का मतलब ही शहर का प्रथम नागरिक होना है। ऐसे में प्रोटोकॉल तो पहले से ही बहुत ऊपर है, लेकिन डायरेक्ट चुनाव में जीत हासिल करना बहुत अहम है। तभी तो पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पांचों मेयरों से मिले और फिर पीएम नरेंद्र मोदी ने भी मेयरों को बुलाकर उनके साथ ‘मन की बात’ की।

-दिनेश भारद्वाज


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