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गुम न जायें गणतंत्र के गुण

Posted On January - 25 - 2019

कृष्ण प्रताप सिंह
जब हम ‘भारत के लोग’ अपने देश का गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे हैं, बाबा नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता का वह सवाल पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो गया है, जिसमें पहले वे पूछते हैं- ‘किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है’, फिर अपने सवाल को ‘कौन यहां त्रस्त है, कौन पस्त और कौन मस्त’ तक ले जाते हैं। उनके इस सवाल पर विचार करते हैं, तो लगता है कि उन्हें आज की तारीख में हमारे गणतंत्र के सामने उपस्थित विकट हालात का पहले से इल्म था।
बहरहाल, हालात की विडंबना देखिये, एक ओर तो अब हमारे नेता देश को समता, स्वतंत्रता और न्याय पर आधारित सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के संकल्प को संविधान की पोथियों में भी चैन से नहीं रहने देना चाहते। दूसरी ओर गैरबराबरी का भस्मासुर न सिर्फ हमारी, बल्कि दुनियाभर की जनतांत्रिक शक्तियों के सिर पर अपना हाथ रखकर उन्हें भस्म कर देने या धमकाने पर आमादा है कि अपनी लोकतंत्र की परिकल्पनाओं को लेकर वे किसी मुगालते में न रहें। अमीरी का जाया यह असुर लोकतंत्र के सारे के सारे मूल्यों को तहस-नहस करने का मंसूबा लिये उन्मत्त होकर आगे बढ़ा आ रहा है और आरजू या विनती कुछ भी सुनने के मूड में नहीं है।
इस गणतंत्र दिवस से महज चार-पांच दिन पहले आई ब्रिटेन के गैरसरकारी संगठन आॅक्सफेम इंटरनेशनल की रिपोर्ट कहती है कि अमीरी और गरीबी के बीच की खाई अब इतनी चौड़ी हो गई है कि बीते साल दुनिया के 26 धनकुबेरों ने अपनी सम्पत्ति इतनी बढ़ा ली कि आधी आबादी की समूची सम्पत्ति उसके आगे पानी भरने लगी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में इस स्थिति का अक्स यों नजर आता है कि उसके 9 कुबेरों की ही मुट्ठी में आधी गरीब आबादी जितनी सम्पत्ति है। इससे आगे गैरबराबरी के और कौन-कौन से गुल खिलने वाले हैं, समझना हो तो जानना चाहिए कि देश के शीर्ष एक फीसदी अमीरों की सम्पत्ति हर साल 39 फीसदी की दर से बढ़ रही है, जबकि गरीबों की महज 3 फीसदी की दर से। ऐसे में किसी को तो यह सवाल पूछना चाहिए (किसी और से नहीं तो खुद से ही सही) कि जिसे हम गणतंत्र कहते आ रहे हैं, क्या वह अमीरों के तंत्र में नहीं बदल गया है? अगर नहीं, तो जो आर्थिक विषमता सभी तरह की स्वतंत्रता और इंसाफ की साझा दुश्मन है, उसकी ऐसी पौ-बारह क्यों हो गयी है?
हम अपना पिछला गणतंत्र दिवस मनाने वाले थे तो भी इसी आक्सफेम इंटरनेशनल के सर्वेक्षणों ने बताया था कि पिछले साल बढ़ी 762 अरब डॉलर की संपत्ति का 82 फीसदी हिस्सा एक प्रतिशत धनकुबेरों के कब्जे में चला गया है, अधिसंख्य आबादी को जस की तस बदहाल रखते हुए।
50 फीसदी अत्यंत गरीब आबादी को आर्थिक वृद्धि में कतई कोई हिस्सा नहीं मिल पा रहा, जबकि अरबपतियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इन अरबपतियों में 90 फीसदी पुरुष हैं, यानी यह आर्थिक ही नहीं लैंगिक असमानता का भी मामला है, पितृसत्ता के नये सिरे से मजबूत होने का भी।
बताने की जरूरत नहीं कि यह अनर्थ भूमंडलीकरण की वर्चस्ववादी नीतियों से पोषित अर्थनीति का अदना-सा ‘करिश्मा’ है। यह गरीबों के ही नहीं, बढ़ते धनकुबेरों के प्रतिद्वंद्वियों के लिए भी हादसे से कम नहीं है, क्योंकि इन कुबेरों ने यह बढ़त कठिन परिश्रम और नवाचार से नहीं, बल्कि संरक्षण, एकाधिकार, विरासत और सरकारों के साथ सांठगांठ के बूते करचोरी, श्रमिकों के अधिकारों के हनन और ऑटोमेशन की राह चलकर स्पर्धा का बेहद अनैतिक माहौल बनाकर पाई है।
निश्चित ही यह इस अर्थनीति की निष्फलता का भी द्योतक है, क्योंकि इन कुबेरों द्वारा सम्पत्ति में ढाल ली गयी पूंजी अंततः अर्थतंत्र से बाहर होकर पूरी तरह अनुत्पादक हो जानी है और उसे इस तथ्य से कोई फर्क नहीं पड़ना कि कई अरब गरीब आबादी बेहद खतरनाक परिस्थितियों में भी ज्यादा देर तक काम करने और अधिकारों के बिना गुजर-बसर करने को मजबूर है। वह भोजन तथा इलाज जैसी अपनी बुनियादी जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाती।
अपने देश की बात करें तो हमारा ‘दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था’ होने का दावा भले ही चुनौतियां झेलता आया हो, उसमें अमीरों द्वारा सब-कुछ अपने कब्जे में करते जाने की रफ्तार इतनी तेज रही है कि जो एक प्रतिशत अमीर 2016 में देश की 58 फीसदी सम्पत्ति के स्वामी थे, उन्होंने 2017 में ही 73 फीसदी सम्पत्ति अपने कब्जे में कर ली थी।
यहां एक पल रुककर यह भी समझ लेना चाहिए कि चूंकि हमने बेरोकटोक भूमंडलीकरण को सिर-माथे लेकर अनेकानेक विदेशी कंपनियों को हमारे देश में कमाया मुनाफा देश से बाहर ले जाने की छूट भी दे रखी है, इसलिए विदेशी अरबपतियों को खरबपति बनाने में भी हमारा कुछ कम योगदान नहीं है। तिस पर यह समझने के लिए अर्थशास्त्र की बारीकियों में बहुत गहरे पैठने की जरूरत नहीं कि यह अमीरी ज्यादा से ज्यादा लोगों को आर्थिक विकास का फायदा देकर संभव ही नहीं थी। इसलिए विकास के सारे लाभ को लगातार कुछ ही लोगों तक सीमित रखकर हासिल की गयी है।
गैरबराबरी के ये आंकड़े हमारे लिए इस लिहाज से ज्यादा चिंतनीय हैं कि ये दुनिया का सबसे ‘महान’ जनतंत्र होने के हमारे दावे की कनपटी पर किसी करारे थप्पड़ से कम नहीं हैं। इसलिए और भी कि जहां कई अन्य छोटे-बड़े देशों ने भूमंडलीकरण के अनर्थों को पहचानना और उनसे निपटने के प्रतिरक्षात्मक उपाय करना शुरू कर दिया है, हमारे सत्ताधीश कतई किसी पुनर्विचार को राजी नहीं हैं। उन्हें इस सवाल से कतई कोई उलझन नहीं होती कि अगर इस गणतंत्र के सात दशकों का सबसे बड़ा हासिल यह एक प्रतिशत की अमीरी ही है, तो बाकी 99 प्रतिशत के लिए इसके मायने क्या हैं? इन 99 प्रतिशत को कब तक देश की राजधानी में हर गणतंत्र दिवस पर होने वाली भव्य परेड तक में अपने मन और मूल्यों की जगह का मोहताज रहना पड़ेगा
बड़े-बड़े परिवर्तनों के दावे करके आयी नरेंद्र मोदी सरकार ने भी अपने 5 सालों में इस अनर्थनीति को बदलना गवारा नहीं किया, जबकि यह नीति कम से कम इस अर्थ में तो भारत के संविधान की घोर विरोधी है कि यह किसी भी स्तर पर उसके समता के मूल्य की प्रतिष्ठा नहीं करती और उसके संकल्पों के उलट आर्थिक ही नहीं, प्राकृतिक संसाधनों के भी अंधाधुंध संकेन्द्रण पर जोर देती है। यह सरकार इस सीधे सवाल का सामना भी नहीं करती कि किसी एक व्यक्ति को अमीर बनाने के लिए कितनी बड़ी जनसंख्या को गरीबी के हवाले करना पड़ता है और क्यों हमें ‘हृदयहीन’ पूंजी को ब्रह्म और ‘श्रम के शोषक’ मुनाफे को मोक्ष मानकर ‘सहृदय’ मनुष्य को संसाधन की तरह संचालित करने वाली अर्थव्यवस्था के लिए अनंतकाल तक अपनी सारी लोकतांत्रिक-सामाजिक नैतिकताओं, गुणों व मूल्यों की बलि देते रहना चाहिए?
एक ओर इन सवालों के जवाब नहीं आ रहे और दूसरी ओर इन्हें पूछने वाले हकलाने लग गये हैं, तो साफ है कि हमारे लोकतंत्र में जनतांत्रिक विचारों की कमी खतरनाक स्तर तक जा पहुंची है। यह कमी ऐसे वक्त में कोढ़ में खाज से कम नहीं है कि गरीबों को और गरीब तथा अमीरों को और अमीर बनाने वाली आर्थिक नीति के करिश्मे अब किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। वे सारे लाभों को अमीर देशों के लिए सुरक्षित कर उन्हें और अमीर, जबकि गरीब देशों को और गरीब बना रही है।
एक प्रतिशत लोगों की अमीरी की यह उड़ान हमें कितनी महंगी पड़ने वाली है, जानना हो तो बताइए कि गरीबों के लिए इस गैरबराबरी से उबरने की कल्पना भी दुष्कर हो जायेगी तो वे क्या करेंगे?


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