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कोहरे का कहर

Posted On January - 3 - 2019

अभिषेक कुमार सिंह
नये साल के आगाज के साथ कोहरा भी लौट आया। नमी, मौसम में आई ठंडक, वाहनों से निकले धुएं और कचरा जलाने से हुए प्रदूषण ने मिलकर ऐसा कुचक्र रच दिया है कि कोहरा हमारी दौड़ती-भागती जिंदगी में बड़ी रुकावट बन गया है। सबसे ज्यादा कहर सड़कों पर दौड़ते वाहनों, ट्रेनों और हवाई उड़ानों पर टूट रहा है। दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर करीब 80 उड़ानें भी प्रभावित हुई हैं। साल की शुरुआत में लंबी दूरी की एक दर्जन से ज्यादा ट्रेनें कई घंटे विलंब से चलीं। 3 जनवरी को दिल्ली से चलने वाली आधा दर्जन ट्रेनों को कोहरे के कारण रद्द कर दिया गया। लेकिन हवाई और रेल यातायात के मुकाबले सबसे ज्यादा कहर सड़कों पर टूटा है। गुजरे साल के आखिरी दिनों में हरियाणा में अंबाला के पास काेहरे के कारण हुए हादसे में 7 लोगों की जान चली गई। हाईवे के किनारे खड़ी 2 कारें बस चालक को दिखाई नहीं दी और बस कारों को कुचलती हुई आगे बढ़ गई। दूसरी बड़ी घटना ग्रेटर नोएडा-आगरा के बीच यमुना एक्सप्रेस-वे पर हुई। यहां कोहरे से करीब आधा दर्जन वाहन एक-दूसरे से भिड़ गए। इसमें एक शख्स की मौत हो गई, जबकि दर्जन भर दूसरे लोग घायल हो गए। ऐसे ज्यादातर हादसों में प्रशासन प्राकृतिक कोप रूपी कोहरे का हवाला देता है, तो आम लोग भी इसे सर्दी का सितम मानकर खामोश हो जाते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि कोहरा विकसित देशाें में इतना कोहराम क्यों नहीं मचाता। जबकि इसकी मौजूदगी हमारे देश में बड़ा संकट बन जाती है। ऐसे में प्रकृति उतनी बड़ी खलनायक नहीं है, जितनी वह लगती है। यह नाकामी तो खुद हमारी है, जो एक सतत वार्षिक समस्या पर काबू नहीं कर पा रहे हैं। इसमें कोहरे से निपटने की हमारी लापरवाही और पिछड़े रहने की आदत झांक रही है, जिसके चलते एक छोटी सी मौसमी दिक्कत बड़ी दिखने लगी है।
कहां से आता है कुहासा
प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाला कुहासा, कोहरा या धुंध वैसे तो एक सामान्य घटना है। खास तौर से सर्दियों में जब कभी भी तापमान गिरता है और माहौल में पर्याप्त नमी होती है तो यहां-वहां फिरती हवाएं पानी की बूंदों को संघनित करके हवा के कणों पर सवार करा देती हैं और इस तरह कोहरा बन जाता है। सामान्यतया सूरज ढलने के बाद और आसमान में बादल छाए रहने की स्थिति में पृथ्वी की सतह के ऊपर कायम रहने वाली हवा के स्तर में तापमान का जो अंतर रहता है, उससे कोहरे का निर्माण होता है। साथ ही, रात में धरती अपने भीतर की गर्मी बाहर छोड़ती है, जो बाहर की ठंडी हवा के संपर्क में आती है, उससे भी कोहरा पैदा होता है। जब तक तापमान में ज्यादा गिरावट नहीं आती, यह कुहासा सामान्य धुंध की तरह कायम रहता है, लेकिन तापमान में ज्यादा गिरावट के साथ ही नमी या आर्द्रता पानी की ठोस बूंदों में बदलकर हवा के कणों पर सवार हो जाती है और इससे कोहरा घना होता चला जाता है।
कोहरे का विज्ञान कहता है कि यह बहुत छोटे-छोटे जलबिंदुओं के समूह को मिलाकर बनता है। वैसे तो कोहरा भी मूल रूप से गैस ही होता है, जिसका निर्माण कंडेंसेशन की प्रक्रिया यानी भाप के पानी बनने की प्रक्रिया के दौरान होता है। असलियत में कोहरे के रूप में पानी के बहुत सूक्ष्म बिंदु या पानी के छोटे कण हवा में तैरते रहते हैं, जिससे आंखों के सामने हल्की सफेद चादर बनी दिखाई देती है। इससे दृश्यता कम हो जाती है और आसपास की चीजें भी धुंधली और कई बार बिल्कुल ओझल हो जाती हैं। शहरों में कोहरे के दौरान हालात इसलिए ज्यादा बिगड़ जाते हैं, क्योंकि वहां धूल और धुएं के कण मिलकर पानी के इन कणों को और गाढ़ा यानी सांद्र बना देते हैं। ऐसे में बिल्कुल नजदीक की चीजें भी धुंधली होकर गायब हो जाती हैं।
भौगोलिक और प्राकृतिक स्थितियों के अनुसार, कोहरे के कई प्रकार होते हैं। अगर कोहरा समुद्र की सतह पर छाया है तो उसे सी-फॉग कहते हैं। अकसर मैदानी इलाकों में कई बार ऐसा कोहरा देखने को मिलता है, जो अचानक किसी जगह बेहद घना हो जाता है और फिर तुरंत ही गायब हो जाता है। ऐसा कोहरा फ्लैश फॉग कहलाता है। ऐसे स्थान विशेष पर हवा की नमी (आर्द्रता) और तापमान के कारण कोहरा कहीं बेहद घना और कहीं विरल हो जाता है। यह भी समझने वाली बात है कि कोहरे और जहरीली धुंध यानी स्मॉग में काफी अंतर होता है। कोहरा आमतौर पर विशुद्ध प्राकृतिक स्थितियों में बनता है तो स्मॉग बनने के पीछे मानवजनित कारण होते हैं। जैसे पराली जलाना, कारखानों का धुआं, वाहनों से निकलने वाली गर्म गैसें। कोहरे के धुएं के साथ मिलने पर धुंध यानी स्मॉग बनता है। स्मॉग शब्द की उत्पत्ति असल में अंग्रेजी के स्मोग (धुएं) और फॉग (कोहरे) से मिलकर हुई है। बताते हैं कि स्मॉग शब्द का प्रयोग पहली बार 1905 में एक शख्स डॉ. हेनरी एंटोनी वॉयेक्स ने किया था, जिसके बाद यह पूरी दुनिया में प्रचलित हो गया। प्रायः कोहरा धुंध के मुकाबले ज्यादा घना होता है और अपेक्षाकृत ज्यादा वक्त तक कायम रह सकता है। इसकी वजह यह है कि कोहरे में धुंध के मुकाबले पानी के कण ज्यादा होते हैं, जो सर्दियों में भाप बनकर उड़ नहीं पाते हैं। आम तौर पर कोहरे की स्थिति में इंसानों के देख पाने की क्षमता एक हजार मीटर से कम हो जाती है। इस स्थिति में विमान भले ही उड़ान भर सकते हैं, लेकिन सड़क पर वाहन दौड़ना और पटरियों पर रेल चलाना खतरे से खाली नहीं होता। रेल और सड़क पर कोहरे की मौजूदगी में दृश्यता 50 मीटर से कम होना सही नहीं है। सड़कों पर इतनी कम दृश्यता में वाहन आपस में भिड़ने लगते हैं और कई बार यह स्थिति बेहद खतरनाक और जानलेवा हो जाती है।
स्मॉग से बढ़ता खतरा
कोहरे के मामले में ज्यादा बड़ी समस्या दूसरी है। प्राकृतिक कारणों से अलग मानवजनित कारक कोहरे को संहारक बना देते हैं। पिछले कई वर्षों से वैज्ञानिक बताते आ रहे हैं कि खेतों में जलाए जाने वाले कृषि कचरे और शहरों में वाहनों की अंधाधुंध रेलमपेल से जो स्मॉग (धुंध) पैदा होता है, वह कोहरे की विनाशक ताकत को बढ़ा देता है। हर साल देश के बड़े शहरों में वाहनों की संख्या और उनसे होने वाला प्रदूषण बढ़ रहा है। इससे कोहरा दिनों-दिन और गहरा हो रहा है। तथ्य है कि दिल्ली जैसे महानगर में बसों में सीएनजी ईंधन का विकल्प अपनाने के बावजूद वायु प्रदूषण में लगभग हर साल इजाफा हुआ है, क्योंकि यहां डीजल से चलने वाली कारों की संख्या भी काफी अधिक है। इन कारों की वजह से हजारों टन जहरीली गैसें और धुआं वातावरण में पहुंचता है। इसमें मौसमी बदलाव भी योगदान देते हैं। ऋतु बदलने के साथ ही मौसम की ठंडक के साथ सर्द हवाएं धूल और धुएं के कणों को ऊपरी वायुमंडल में नहीं जाने देती हैं, जिससे धुंध और कोहरा धरती की सतह के नजदीक कैद होकर रह जाता है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की पर्वतीय इलाकों से आने वाली ठंडी बयारें कुछ ऐसा माहौल बनाती हैं कि दिल्ली और दूसरे मैदानी इलाकों में सुबह और शाम का वक्त यातायात के नजरिए से खतरनाक हो जाता है। हवा और धूल के कणों पर मौसम में व्याप्त नमी से पैदा हुई पानी की बूंदें रेल, सड़क और हवाई यातायात की दुश्मन बन जाती हैं। ऐसा लगता है कि मानो वे रफ्तार के खिलाफ जैसे कोई कुचक्र रच रही हों। खास तौर से आम जनता के आवागमन को सुचारु रखने वाली भारतीय रेल जिस तरह से कोहरे के सामने बेबस दिखाई देती है, वह हैरान करने वाला है। खुद भारतीय रेलवे कुछ मौकों पर स्वीकार कर चुकी है कि कोहरे के दौरान ट्रेनों की औसत गति 20 से लेकर 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रह जाती है, जबकि कई ट्रेनों की औसत गति 100-120 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित है। कोहरे में ट्रेनों को रद्द करने का सिलसिला भी चल निकलता है, जिससे यात्री परेशान होते हैं।
कोहरे का यह आलम पूरी दुनिया में एक सा रहता है, लेकिन कई विकसित मुल्कों ने दिखाया है कि साइंस की मदद से वे कोहरे से जीत सकते हैं। कोहरा उनकी सामान्य गतिविधियों में अड़चन की तरह आता जरूर है और रफ्तार पर कुछ अंकुश जरूर लगाता है, लेकिन इससे उनकी जिंदगी का पहिया थमता नहीं है। कोहरे से जुड़ी अहम दिक्कत यह है कि इसमें दिखना मुश्किल हो जाता है। दृश्यता (विजिबिलटी) या तो पूरी तरह खत्म (शून्य) हो जाती है या बेहद कम हो जाती है। कोहरे में भी यातायात सामान्य रूप से जारी रह सकता है, बशर्ते इस संबंध में बने सिस्टम अपनाए जाएं और चालकों को माकूल ट्रेनिंग दी जाए। दावा किया जाता है कि भारतीय रेल हाईटेक हो रही है, तो फिर सवाल यह है कि आखिर यह आधुनिक तकनीक किस काम आ रही है, जो न दुर्घटनाएं रोक पा रही है और न कोहरे के बीच ट्रेनों की चाल को सामान्य रख पा रही है। एक तरफ सरकार हाईस्पीड ट्रेनें चलाकर बुलेट ट्रेन का सपना देश की जनता को दिखा रही है, लेकिन वह कैसी अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी अपना रही है, जो कोहरे के सामने बेदम हो जाती है। क्या कोहरे के कहर से निपटने के लिए रेलवे के पास किसी तरह की आधुनिक टेक्नोलॉजी नहीं है। या फिर उसकी सारी टेक्नोलॉजी आरक्षण कराने और उसे रद्द कराने के बदले यात्रियों की जेबें ढीली करने में ज्यादा कारगर साबित हो रही है।
हवाई सफर की भी हवा टाइट
हवाई यातायात भी कोहरे के सामने चौपट नजर आता है। बीते कई वर्षों में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने सभी एयरलाइंसों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने पायलटों को कोहरे के वक्त विमान संचालन से संबंधित आधुनिक तकनीक की जरूरी ट्रेनिंग दें, अन्यथा उनके विमानों को कोहरे में उड़ने की इजाजत नहीं दी जाएगी। लेकिन देखा जा रहा है कि ज्यादातर प्राइवेट एयरलाइंस कंपनियां अपने पायलटों को यह ट्रेनिंग देने में कोताही करती हैं। वजह यह है कि इस ट्रेनिंग पर भारी खर्च है। साथ ही, हर साल पायलटों को दो लाख रुपये की फीस देकर इसका रिफ्रेशर कोर्स कराना भी जरूरी है। जाहिर है, पायलटों को बेहद मोटी पगार दे रही एयरलाइंस कंपनियां इस ट्रेनिंग पर दो से आठ लाख रुपये का खर्च बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं। दूसरे, ट्रेनिंग के दौरान पायलट उड़ान से अलग रहते हैं, जिससे किराया कम करने की होड़ में उनकी कंपनियां पिछड़ सकती हैं।
हम जानते हैं कि अगर संकल्प लिया जाए, तो रेल, सड़क और हवाई यातायात के लिए कोहरा कोई समस्या नहीं है। ज्यादातर विकसित देशों में धुंध-कोहरे के बावजूद रेल-हवाई परिवहन में ऐसी अराजकता नहीं रहती है। लेकिन अपने देश में ज्यादा लाभ कमाने का लालच और लापरवाही परस्पर मिलकर ऐसा दृश्य बना रहे हैं कि कोहरे के पार देखना मुश्किल होता जा रहा है।
धुंध तो इनकी साथी है
उत्तर भारत में कोहरा प्रकृति की ओर से की जाने वाली एक सालाना परिघटना कही जा सकती है और हमारा इससे वास्ता अमूमन सर्दियों में ही पड़ता है। लेकिन दुनिया में कुछ जगहें ऐसी भी हैं, जहां कोहरा एक सतत नियति है। यानी वहां हमेशा ही कोहरा छाया रहता है। मिसाल के तौर पर कनाडा के न्यूफाउंडलैंड द्वीप के पास ग्रैंड बैंक्स नामक एक जगह ऐसी है, जिसे शायद ही कभी कोहरे से निजात मिलती हो। इसकी वजह अटलांटिक महासागर है, जिसके किनारे यह जगह मौजूद है। असल में अटलांटिक महासागर में उत्तर की ओर से चलने वाला ठंडा लेब्राडोर करंट (वायु धारा) और पूर्व की ओर से आने वाली गर्म गल्फ हवाएं ग्रैंड बैंक्स को हर वक्त घने कोहरे से ढक देती हैं। कोहरे से काफी ज्यादा आच्छादित रहने वाली कुछ और जगहें दुनिया में हैं। जैसे चिली स्थित अटाकामा कोस्ट, इटली की पो वैली (घाटी), स्विटरलैंड के मध्यवर्ती पठार, अफ्रीका का नामिब रेगिस्तान, अटलांटिक कोस्ट का मिस्टेक आइलैंड, कैलिफोर्निया का शहर सैन फ्रांसिस्को, कैलिफोर्निया का ही पॉइंट रेयेज़ और न्यूजी लैंड के हेमिल्टन शहर को ऐसी जगहों की लिस्ट में शुमार किया जाता है। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि कोहरा हमारे लिए भले ही मुसीबत का एक पर्याय हो, लेकिन पानी की कमी वाली जगहों पर वैज्ञानिक फॉग कैचर तकनीक से कोहरे को पानी में बदलने की कोशिशें कर रहे हैं। ऐसी एकाध जगहों में बेलाविस्टा और पेरू हैं, जहां इस तकनीक को प्रयोग में लाया गया है। बेलाविस्टा की समस्या यह है कि यहां कोई पानी के स्रोत के रूप में कोई नदी, झील या ग्लेशियर नहीं है। इस कारण यहां पानी का घनघोर संकट रहता है। लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि अकसर कोहरा छा जाता है। इसलिए वैज्ञानिकों ने फॉग कैचर की मदद से 2006 से कोहरे को पानी में बदलने का काम शुरू किया था। इससे पानी के संकट से एक हद तक निजात मिली।


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