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दिल्ली का सेमीफाइनल

Posted On December - 6 - 2018

हरीश लखेड़ा
लोकसभा चुनाव के सेमीफाइनल माने जा रहे 5 राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए भी अहम हैं, क्योंकि इन चुनावों में जिसकी भी पार्टी फतह करेगी, उसके लिए रायसीना हिल्स पहुंचने की राह आसान होती दिखेगी। इसलिए देश की दोनों प्रमुख पार्टियों भाजपा और कांग्रेस ने खासतौर पर हिंदी भाषी राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ पर अपना झंडा फहराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है। जो भी ज्यादा राज्यों में फतह करेगा, उसके लिए लोकसभा चुनाव के महासमर का सिकंदर बनने के अवसर ज्यादा होंगे।
इन तीनों राज्यों में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच है और आगामी लोकसभा की चुनावी जंग भी इनके नेतृत्व में बने गठबंधनों एनडीए और यूपीए के बीच होनी है। इसलिए इन चुनावों को लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। लेकिन पूर्वोत्तर के सीमांत राज्य मिजोरम और दक्षिण के तेलंगाना के चुनाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। मिजोरम में कांग्रेस का शासन है और उसका मुकाबला मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) से है। यदि यहां कांग्रेस हार जाती है तो पूर्वोत्तर में उसके हाथ से यह अकेला राज्य भी चला जाएगा। पूर्वोत्तर के बाकी 6 राज्यों में भाजपा या एनडीए मेें उसके सहयोगी दलों की सरकारें हैं। कभी पूर्वोत्तर में त्रिपुरा को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में राज करने वाली कांग्रेस के हाथ से मिजोरम चले जाने से वहां उसका सफाया हो जाएगा। यहां पिछले 5 बार से भाजपा मैदान में उतरती रही है। लेकिन ईसाई बहुल इस राज्य में बीजेपी अब तक खाता भी नहीं खोल पाई है। वैसे भाजपा पूर्वोत्तर के तीन ईसाई-बहुल राज्यों में से 2 मेघालय व नागालैंड में पहले से ही सरकार में साझीदार है। इसलिए उसे यहां भी उम्मीदें हैं। खास बात यह है कि एमएनएफ राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए में भाजपा के साथ है, लेकिन प्रदेश विधानसभा के चुनाव में दोनों अलग-अलग मैदान में डटे हैं। यदि चुनाव नतीजे इनके पक्ष में आते हैं तो ये दोनों सरकार में साथ आ सकते हैं।
मिजोरम में भी सत्ता की कुंजी चर्च के पास रहती है। चर्च इस ईसाई बहुल राज्य मिजोरम की राजनीति में अप्रत्यक्ष तौर पर दखल रखता है। माना जाता है कि चर्च जिसे भी समर्थन देता है, उसके लिए कुर्सी की राह आसान हो जाती है, लेकिन इस बार वह खामोश दिखा है। कांग्रेस लगातार 10 साल से सत्ता में है। मुख्यमंत्री पी ललथनहवला औैर एमएनएफ के पूर्व मुख्यमंत्री जोराम थांगा के बीच इस बार कुर्सी की जंग है। 40 विधानसभा क्षेत्रों वाले
मिजोरम में भाजपा को अब तक एक भी सीट नहीं मिल पाई है। यहां महिला मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा है और भाजपा ने सबसे ज्यादा 6 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। इसके अलावा भाजपा की नजर ब्रू और रियांग जनजातियों पर है, जो कि बौद्ध या हिंदू हैं। सुप्रीमकोर्ट के दखल के बाद इनको मिजोरम का निवासी माना गया है। भाजपा की उम्मीद इसलिए भी बढ़ी है कि इस साल चकमा स्वायत्त जिला परिषद के चुनावों में पार्टी ने 20 में से 5 सीटें जीती थीं।
मिजोरम के चुनाव देश के अन्य राज्यों से इस मामले में भिन्न हैं कि वहां चुनाव पर यंग मिजो एसोसिएशन और जोराम पीपुल्स पार्टी जैसे संगठन नजर रखते हैं। वहां चुनाव प्रचार में फिजूलखर्ची पर अंकुश रहता है। ये संगठन हर गांव, कस्बा आदि में एक साझा मंच बनाते हैं और वहां पर उस क्षेत्र के सभी प्रत्याशियों को एक साथ बुलाया जाता है और उन्हें अपनी बात रखनी होती है। मिजोरम में शराबबंदी रही है, लेकिन कुछ माह पहले इसमें ढील देने से लोग नाराज हैं। यहां शराबबंदी बड़ा मुद्दा बन गया है।
दक्षिण के राज्य तेलंगाना में मुख्यमंत्री कल्वाकुंतला चंद्रशेखर राव यानी केसीआर ने अपने पक्ष में हवा देखकर समय से पहले विधानसभा भंग कर दी थी। हालांकि, प्रदेश में कांग्रेस, चंद्रबाबू नायडू और सीपीआई का गठजोड़ होने से उनके लिए राह आसान नहीं रह गई है। आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद 2014 में पहली बार तेलंगाना में विधानसभा चुनाव हुए। तब केसीआर की तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने चुनाव में फतह हासिल की। इस बार टीआरएस के सामने कांग्रेस, टीडीपी, सीपीआई और तेलंगाना जन समिति (टीजेएस) का महागठबंधन ‘जन मोर्चा’ के तौर सामने है। यहां भाजपा भी मैदान में है। असदुद्दीन ओवैसी की पुराने हैदराबाद क्षेत्र में प्रभाव रखने वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) भी ताल ठोक रही है।
केसीआर पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप है। लेकिन उन्होंने जमीन के मालिकाना हक रखने वालों को सालाना तय राशि देने की जो योजना शुरू की, उससे प्रदेश में किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों में कमी आई है। इसी वजह से कांग्रेसनीत महागठबंधन ने कृषि क्षेत्र के लिए दो लाख रुपये तक की एक बार में ऋण माफी करने का वादा किया है। इस बार कांग्रेस ने अजीबोगरीब वादे किए हैं। मसलन, राज्य की मस्जिदों और चर्चों को मुफ्त बिजली और इमाम और पादरियों को हर महीने वेतन देने का वादा किया है। तेलंगाना में लगभग 12.5 प्रतिशत मुस्लिम हैं। इसलिए कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ करने के ऐसे कई बड़े वादे किए हैं। कांग्रेस ने चर्च के पादरियों को 5 लाख का हेल्थ व एक्सिडेंटल बीमा देने का वादा किया है। इसके जवाब में भाजपा ने हर साल एक लाख लोगों को मुफ्त में गाय देने का वादा किया है।
इनके अलावा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला है। इन तीनों राज्यों में भाजपा का शासन है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा 15-15 साल से सत्ता में है। इन तीनों राज्यों में भाजपा का कार्यकर्ता अपनी ही सरकारों से बेहद नाराज है। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लोगों की नाराजगी तो नहीं है, लेकिन लोग बदलाव के पक्ष में हैं। इससे भाजपा के लिए सत्ता में लौटना चुनौती बन गई है। सपा व बसपा के अलग चुनाव लड़ने से पहले इसे कांग्रेस के लिए खराब बताया जा रहा था, लेकिन यह भी तथ्य सामने आए हैं कि वास्तव में इनका वोट बैंक अब भाजपा के पाले में चला गया है और वे अब कांग्रेस की बजाय भाजपा का ही वोट काटेंगे। छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे), बहुजन समाज पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एक गठबंधन के साथ मैदान में थे। यहां भी भाजपा और कांग्रेस में मुकाबला है, लेकिन चुनाव बाद त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में जोगी के हाथ में लड्डू आ सकते हैं। राजस्थान में हर पांच साल में सत्ता बदलती रही है। यहां वसुंधरा राजे के व्यवहार से भाजपा के कार्यकर्ता नाराज हैं। इसलिए यहां कांग्रेस सत्ता में लौटने की उम्मीद पाल रही है। भाजपा इस परंपरा को तोड़ने की कोशिश में है। यहां भी कांग्रेस के साथ जाने की बजाय सपा और बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ी हैं।
इन चुनावों में भाजपा की ओर के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी ने ही चुनाव प्रचार का माेर्चा संभाला। इसलिए इस चुनाव में इन दोनों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। जिसके खाते में ज्यादा राज्य आएंगे, उसकी लोकसभा के महासमर में भी सिकंदर बनने की संभावना प्रबल हो जाएगी। 2014 के चुनाव में भी मोदी ने इन राज्यों में प्रचार किया था, क्योंकि भाजपा ने उन्हें 2013 में ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था। तब इन तीन राज्यों को जीतने का फायदा मोदी को लोकसभा चुनाव में मिला था।


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