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कर्ज माफी नाकाफी

Posted On December - 21 - 2018

आलोक पुराणिक
देश में कर्ज माफी की राजनीति नयी नहीं है, लेकिन यह किसानों के दुख-दर्द के स्थायी इलाज के बिना तात्कालिक दवा देने जैसी है। कर्ज माफी के इंजेक्शन के परिणाम फौरन आते हैं। छत्तीसगढ़ में करीब 61 हजार करोड़ रुपये के किसान कर्ज माफ होने की घोषणा की गई है। मध्यप्रदेश में करीब 38 हजार करोड़ रुपये के कर्ज माफ होने की बात है। राजस्थान में करीब 18 हजार करोड़ रुपये के कर्ज माफ होने हैं। कर्नाटक में करीब 42165 करोड़ रुपये के कर्ज माफ होने की योजना है। महाऱाष्ट्र का आंकड़ा 34500 करोड़ का है। उत्तर प्रदेश में करीब 36 हजार करोड़ रुपये के कर्ज माफ होने की घोषणा थी, पंजाब में भी घोषणा करीब दस हजार करोड़ रुपये के कर्ज माफ होने की थी।
हर महत्वपूर्ण राजनीतिक दल मानता है कि कर्जमाफी समस्या का समाधान नहीं है, लेकिन हर सियासी दल इसमें पीछे छूटता हुआ दिखायी नहीं देना चाहता। किसान प्रिय दिखने के चक्कर में ऐसा माहौल बन रहा है कि कर्ज माफी ही तमाम समस्याओं का हल है। प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति में क्या यह वाकई में सही है, इस सवाल पर कोई चर्चा नहीं करता। चर्चा इस बात की है कि उसने  पांच हजार करोड़ का कर्ज माफ किया है, तो  हम दस हजार करोड़ का कर्ज माफ करके इसका प्रचार करेंगे।
कर्ज माफी के ताजा परिणाम यह हैं कि असम की भाजपा सरकार ने करीब 600 करोड़ रुपये के किसान कर्ज माफ करने की घोषणा की है। गुजरात सरकार ने ग्रामीण उपभोक्ताओं के करीब 625 करोड़ रुपये माफ करने का एेलान किया है। उड़ीसा भाजपा ने राज्य में सत्ता का सपना देखते हुए वादा किया है कि अगर 2019 में भाजपा राज्य में सत्ता में आई तो किसानों के कर्ज माफ कर दिये जाएंगे।
किसानों के कर्ज माफ हों यह सवाल महत्वपूर्ण है। लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वे हालात कौन से हैं, जो किसान एक के बाद एक लगातार हर साल बार-बार कर्ज माफी के बावजूद कर्ज न चुकाने की हालत में आते जाते हैं। किसानों के दुख-दर्द राजनीति के तात्कालिक औजार बन जाते हैं। उनके दीर्घकालीन भले की चिंता लगभग अनुपस्थित है। यही वजह है कि किसानों की दुर्दशा राजनीतिक चीख चिल्लाहट का विषय बन गयी है। इस मोर्चे पर कुछ ठोस होता नहीं दिख रहा है।
कर्ज माफी की राजनीति व्यापक हो रही है। बहुत संभव है कि कोई राजनीतिक दल महिला उद्यमियों को अपना वोट बैंक मानकर घोषणा कर दे कि महिलाओं के कारोबारी कर्ज माफ होने चाहिए। या कोई राजनीतिक दल एक और कदम आगे जाकर यह भी घोषणा कर सकता है कि जिन नौजवानों ने कर्ज लेकर मोटरसाइकिल खरीदी हैं, उनके कर्ज माफ होने चाहिए। वोट के लिए कर्ज माफी एक बड़ा हथियार है। इस हथियार के इस्तेमाल में कोई राजनीतिक दल पीछे नहीं रहना चाहता।

कर्ज माफी का अर्थशास्त्र
अर्थशास्त्र गंभीर विषय है। आंकड़ों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि वाकई में कर्ज माफी का वास्तविक परिणाम हुआ क्या है। नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद के मुताबिक, जिन किसानों ने कोई संस्थागत कर्ज लिया है उनकी तादाद कुल किसानों की तादाद का 50 प्रतिशत भी नहीं है। यानी इन सारी कर्ज माफी योजनाओं का फायदा उन्हें ही मिल रहा है, जो किसी बैंक या को-आॅपरेटिव संस्था से कर्ज लेते हैं। बाकी के किसान तो कर्ज माफी की परिधि से ही बाहर हैं। यानी आधे से ज्यादा किसान तो कर्ज माफी के दायरे में आते ही नहीं हैं। जिन किसानों ने किसी साहूकार से कर्ज लिया है, वो तो कर्जमाफी के दायरे में आते ही नहीं है। और जमीन पर कर्ज माफी योजनाएं किस तरह से काम कर रही हैं, इसे देखकर साफ होता है कि कर्ज माफी की घोषणाएं भले ही तात्कालिक राजनीति को चमका देती हैं पर इनसे कोई ठोस हल नहीं मिलता। पंजाब का उदाहरण लें। 2017 के विधानसभा चुनावों में पंजाब में कांग्रेस ने वादा किया था कि किसानों का कर्ज पूरा माफ किया जाएगा। बाद में पंजाब सरकार ने घोषणा की कि सरकार किसानों का कर्ज अपने ऊपर ले लेगी और बैंकों से बात करेगी। जमीनी स्तर पर हुआ यह है कि पंजाब सरकार अब तक करीब 1750 करोड़ रुपये के कर्ज ही माफ कर पायी है। यह भी उन किसानों के, जिन्होने दो लाख तक के कर्ज लिये थे और जिनके पास ढाई एकड़ से कम की खेती थी।
यानी घोषणाएं कितनी जमीन पर उतरती हैं, यह देखना भी महत्वपूर्ण है। मध्यप्रदेश सरकार ने जो आदेश पारित किया है, उसकी भाषा का आशय है कि पात्र किसानों की ही कर्ज माफी होगी। अब पात्र कौन है और पात्रता की परिभाषा कितनी बदलेगी यह कुछ नहीं कहा जा सकता है। इसकी एक वजह है कि वादे तो थोक में राजनीति में कर दिये जाते हैं। मुंह से वादाई शब्द फेंकने की कोई सीमा नहीं है, लेकिन आर्थिक संसाधनों की सीमा है।
मध्यप्रदेश में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का 25 प्रतिशत कर्ज चढ़ा हुआ है। मध्यप्रदेश के पूरे बजट का आकार करीब 1 लाख 64 हजार करोड़ का है। इसमें अगर 38 हजार करोड़ कर्ज माफी में गया, तो बाकी के कामों के लिए क्या बचेगा, यह सवाल महत्वपूर्ण है। इसलिए सरकारें शुरुआती घोषणाओं के बाद कुछ ऐसी तरकीब निकालती हैं कि कर्ज माफी की घोषणाओं को पूरा न करना पड़े। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने घोषणा की, किसान की कर्ज माफी होगी। उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा करीब 36 हजार करोड़ का बनता है। उत्तर प्रदेश के पास संसाधनों का अभाव है। संसाधन असीमित नहीं हैं, वादे असीमित हो सकते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि तमाम सेक्टर अविकसित रह जाते हैं।

बनानी होगी व्यवस्था
हाल के आंकड़े बताते हैं कि अगस्त 2018 में एक वर्ष के हिसाब से देखें, तो सब्जियों के भाव में करीब 8 प्रतिशत की गिरावट आई है। दालों के भाव में करीब 7 प्रतिशत की गिरावट आई है। सब्जियों, फलों के भाव गिरें तो किसान खुश नहीं हो सकता। पर छोटा किसान अपने प्याज, लहसुन बहुत दिनों तक स्टोर करके भी नहीं रख सकता। इस चक्कर में होता यह है कि किसान तो नहीं कमाता पर बिचौलिये बहुत कमाते हैं। ऐसे बिचौलिये, जिनके पास स्टोर करने की क्षमता है, वे तमाम आइटम खऱीद कर बाद में उन्हें महंगे दामों पर बेच सकते हैं। इसलिए सब्जियों के आढ़तिये, बिचौलिये समस्या में नहीं रहते, समस्या किसान की होती है। उपभोक्ता को अगर 20 रुपये किलो आलू बाजार में मिल रहा है तो फिर उस आलू के 30 रुपये वह क्यों देगा। इसी तरह अगर थोक सब्जी कारोबारी को थोक बाजार में तमाम किसान तीन रुपये किलो लहसुन देने को तैयार हैं तो वह इस लहसुन के 20 रुपये किलो के भाव क्यों देगा, भले ही राज्य सरकार कानून पारित कर दे कि इसके न्यूनतम भाव 24 रुपये किलो होंगे, क्योंकि इसकी लागत सोलह रुपये किलो आती है। कानून बनाकर थोक कारोबारी से कीमत वसूलनी असंभव है, क्योंकि थोक कारोबारी खऱीदना ही बंद कर देता है। आप किसी को एक भाव पर खरीदने के लिए मजबूर करने का कानून बना सकते हैं, लेकिन उसे हर हाल में खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। ऐसे में इस तरह के इलाज काम नहीं करते। इलाज कुछ ऐसा होना चाहिए कि व्यवस्था ऐसी बने, जिससे किसान किसी फसल के आधिक्य का शिकार न हो, लेकिन ऐसी व्यवस्था बनाएगा कौन।

जरूरत कुरियन जैसे ईमानदारों की
सरकारी दायरे में बनने वाली तमाम व्यवस्थाएं बहुत समय लेती हैं और उनकी सफलता का दायरा कितना होगा, यह भी सवाल बना रहता है। क्या बड़ी कंपनियों के हवाले की जाये कृषि। यह सवाल अपने आप में बहुत पेचीदा है और राजनीतिक भी। बड़ी कंपनियों के खेती में आने की खबर से राजनीतिक विवाद शुरू होगा। खेती में बड़ी कंपनियां न आएं, इस बात के लिए कई राजनीतिक दल प्रतिबद्ध हैं। बड़े स्तर पर किसी ब्रांड को बनाकर बेचने की क्षमता कंपनियों में है या फिर अमूल जैसे सहकारी संगठन में। अमूल ने गुजरात के छोटे डेयरी कारोबारियों को संगठित करके ऐसा संगठन खड़ा किया, जो बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को टक्कर दे रहा है। लेकिन अमूल अपवाद है। उत्तर भारत की अधिकांश सहकारी संस्थाएं अपने सत्कर्मों के लिए नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक भ्रष्टाचार, राजनीतिक दखलंदाजियों के लिए कुख्यात हैं। सहकारी संस्था ठीक ठाक बन पाये, इसके लिए कुछ प्रतिबद्ध और ईमानदार लोग चाहिए होते हैं, कुरियन जैसे। प्रतिबद्ध और ईमानदार लोग कम होते हैं, जो अपने लिए मुनाफा देखे बिना एक लोक संगठन खड़ा कर पायें। धन और मुनाफे को अधिकतम किया जाये, ऐसा लालच सर्वसुलभ है। इस लालच के कारण मुनाफा केंद्रित कामयाब कंपनियां बहुत हैं। लेकिन समाज की सामूहिक सेवा को समर्पित सहकारी संगठन बहुत कम हैं। पर राजनीतिक वजहों से बड़ी कंपनियों को खेती में आने की छूट नहीं दी जा सकती। कुछ समय पहले किसानों के लिए कंपनी संगठन के तहत कारोबार करने की योजना आयी थी। प्रोड्यूसर कंपनी के नाम से कंपनी में तमाम किसान काम करें, ऐसी योजना थी। पर इस योजना की व्यापक सफलता की कथाओं का अभी इंतजार है। कुल मिलाकर किसानों के बाजार भाव से जुड़ी समस्याओं का निपटारा जब तक नहीं होता, तब तक यह समस्या सतत रहने वाली है। नियमित अंतराल पर किसान कर्ज माफी की मांग करेंगे और हर राजनीतिक दल को उनकी बात सुननी पड़ेगी। लेकिन यह खेती को सतत बैसाखी की आपूर्ति जैसी बात है। समस्या का हल यह नहीं है।
समस्या का हल बहुआयामी है और सबसे महत्वपूर्ण आयाम है कि किसान को उसकी फसल का बाजार आधारित मूल्य मिल सके। इसके लिए प्रोड्यूसर कंपनियों के बारे में किसानों को जानकारी, प्रशिक्षण और अमूल जैसे संगठनों का विकास किया जाना आवश्यक है। हाल ही में पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। इस सुझाव के मुताबिक, छोटे और सीमांत किसानों को 12 हजार रुपये प्रति वर्ष सरकार दे। इस पर साल में करीब एक लाख 84 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे। इस योजना का सत्तर प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार को और 30 प्रतिशत खर्च राज्य सरकारों को वहन करना चाहिए।
एक लाख 84 हजार करोड़ रुपये दो महीनों के जीएसटी संग्रह के बराबर है। केंद्र सरकार इस योजना पर काम कर सकती है, छोटे किसानों के दुख-दर्द इससे कम होंगे। मंझोले और बड़े किसानों को प्रोड्यूस कंपनियों और सहकारी संगठनों की ओर ईमानदारी से लाया जाये। तब बाजार की चुनौतियों को किसान झेल सकते हैं। वर्ना कर्ज माफी और भावों की कमजोरी के मसले कभी खत्म नहीं होंगे। बाजार से जुड़ी समस्याओं का इलाज बाजार से जुड़े हल लाकर ही हो सकता है। यह बात सभी को समझनी होगी, खास तौर पर उन राजनीतिक दलों को, जो बाजार के प्रति  दोहरा और फर्जी रवैया अपनाते हैं।

खेती और बाजार
हाल में नीति आयोग के नोट में भी साफ किया गया है कि खेती की समस्याओं का हल कर्ज माफी से नहीं निकल सकता। खेती किसानी से जुड़ी समस्याओं का विश्लेषण करें, तो साफ होता है कि उनकी समस्याओं का ताल्लुक बाजार से है, बाजार भावों से है। मध्य प्रदेश ऐसा राज्य है, जहां कृषि की विकास दर कई सालों तक 10 प्रतिशत से भी ज्यादा रही है। 2016-17 में मध्य प्रदेश में खेती की विकास दर 20 प्रतिशत से ज्यादा रही। फिर भी मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के लिए हाल के विधानसभा चुनाव में बड़ी चुनौती यह रही कि किस तरह से नाराज किसानों को मनाया जा सके। कृषि की विकास दर तेज होने का एक परिणाम यह होता है कि खेती से जुड़े तमाम आइटमों की आपूर्ति अधिक हो जाती है और उनके भाव गिर जाते हैं। हाल में प्याज और लहसुन के गिरे भावों से किसान नाराज हैं। इनके भाव जब बहुत ज्यादा हो जाते हैं तो किसान खुश होते हैं, उपभोक्ता नाराज हो जाते हैं। प्याज के बढ़े भावों पर गिरी सरकारें भी इस मुल्क ने देखी हैं। खेती की विकास दर 10 प्रतिशत से ऊपर रखने वाले राज्य में किसान नाराज हैं। समग्र देश के आंकड़े देखें, तो साफ होता है कि 10 प्रतिशत से आधी विकास दर भी खेती के लिए मुश्किल रही है। आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 के मुताबिक, खेती की विकास दर में अनिश्चितताएं रही हैं। 2012-13 में यह विकास दर 1.5 प्रतिशत रही, 2013-14 में यह दर 5.6 प्रतिशत रही। 2014-15 में यह निगेटिव जोन यानी माइनस दशमलव दो प्रतिशत पर चली गयी। 2015-16 में यह दशमलव सात प्रतिशत रही। 2016-17 में 4.9 प्रतिशत रही। खेती में जब विकास न हो तो समस्या और जब विकास हो तो भी समस्या।


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