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जांच करने वालों पर आंच

Posted On November - 1 - 2018

ओमप्रकाश तिवारी
सीबीआई का विवादों से पुराना नाता रहा है, कभी जांच के नाम पर तो कभी राजनैतिक लाभ के नाम पर इस जांच एजेंसी को इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि एजेंसी के दो शीर्ष अधिकारी भ्रष्टाचार को लेकर एक-दूसरे पर ही आरोप मढ़ रहे हैं। मामला सुप्रीमकोर्ट पहुंच गया। कोई कह रहा है कि ‘तोता’ बोलने लगा है, किसी ने कहा कि ‘तोता’ अपने मालिक को काटने वाला था तो किसी ने कहा कि यह पिंजरे में बंद दो ‘तोताें’ की आपसी जंग है, जो अपने-अपने स्वार्थों के लिए एक-दूसरे पर झपट रहे हैं।
सीबीआई के शीर्ष दो अधिकारियों सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच विवाद की शुरुआत मार्च-2017 में शुरू हो गयी थी। एक फरवरी 2017 को जब आलोक वर्मा दिल्ली पुलिस कमिश्नर से सीबीआई निदेशक बनकर पहुंचे तो कहा जाता है कि उन्होंने अपने कुछ चहेते अधिकारियों की एक सूची सीबीआई के तत्कालीन सयुंक्त निदेशक पाॅलिसी साई मनोहर को दी। सीबीआई में किसी भी अधिकारी को बाहर से लाने की सारी जिम्मेदारी संयुक्त निदेशक पालिसी के जिम्मे होती है, जो निदेशक की ओर से यह सारे काम करते हैं। जब इन अधिकारियों को सीबीआई में लाने से पहले की जांच हुई तो इनमें से कई नाम अयोग्य बताकर काट दिए गए। बताया जाता है कि इस पर सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने साई मनोहर को चंडीगढ़ ट्रांसफर कर दिया, जबकि वह विशेष निदेशक राकेश अस्थाना की विशेष जांच टीम (एसआईटी) में थे। सीबीआई के जानकार बताते है कि यहीं से दोनों अधिकारियों के बीच विवाद की शुरुआत हुई, जो बाद में ईगो की लड़ाई में बदल गई।
दरअसल, दोनों अधिकारियों आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना को ऊपर से ही लाया गया था। ऐसे में दोनों को अपने-अपने ‘आकाओं’ पर विश्वास था और दोनों ही एक दूसरे से पीछे हटने का नाम नहीं ले रहे थे। साई मनोहर के ट्रांसफर के बाद आलोक वर्मा ने एक के बाद एक कई ट्रांसफर किए और कई अधिकारियों को सीबीआई से बाहर का रास्ता दिखाया। कहा जाता है कि जिन लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया गया, उनमें कई राकेश अस्थाना के करीबी थे। यही नहीं आलोक वर्मा ने गुजरात काडर के ही अधिकारी एके शर्मा को संयुक्त निदेशक पाॅलिसी बना दिया, जिनका पहले से ही राकेश अस्थाना से मनमुटाव बताया जाता था।
बात यहीं खत्म नहीं हुई, दोनों अधिकारियों के बीच विवाद इस कदर बढ़ा कि जब राकेश अस्थाना को अतिरिक्त निदेशक से विशेष निदेशक बनाने की फाइल आगे बढ़ी तो आलोक वर्मा ने लिखित में सीवीसी के सामने विरोध दर्ज कराया और उन्हें विशेष निदेशक न बनाने को कहा। लेकिन राकेश अस्थाना को विशेष निदेशक बना दिया गया। इसके बाद लड़ाई बढ़ती चली गयी और दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे। सीबीआई निदेशक की तरफ से कहा गया कि राकेश अस्थाना की भूमिका कई ऐसे आरोपों में संदिग्ध पाई गई है, जिनकी जांच खुद सीबीआई कर रही है। इनमें 5 हजार करोड़ रुपये का संदेसारा मामला, पत्रकार उपेंद्र राय के उगाही जैसे मामले शामिल थे।
सीबीआई जानकारों का मानना है कि इस विवाद की पूरी जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय को थी, लेकिन बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक नहीं पहुंच पाई। मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब पीएमओ के एक आला अधिकारी इस चपेट में आ गए। इन पर कोयला घोटाले को लेकर जांच चल रही थी। कहा जा रहा है कि विशेष निदेशक रहते हुए राकेश अस्थाना ने इस जांच की फाइल को बंद कराने की सिफारिश की थी, लेकिन जैसे ही निदेशक आलोक वर्मा को इसका पता चला कि पीएमओ के ये अधिकारी राकेश अस्थाना का पक्ष ले रहे हैं तो उन्होंने कानूनी राय लेकर फाइल को फिर से खुलवा दिया। विवाद यहां भी खत्म नहीं हुआ।
मामले ने एक बार फिर तूल पकड़ा, जब आलोक वर्मा को एक बैठक में विदेश जाना था। इसी दौरान सीबीआई में अधिकारियों को बाहर से लाने के लिए बैठक होनी थी। वर्मा ने जाने से पहले सीवीसी को पत्र लिखकर राकेश अस्थाना को उनकी ओर से इस बैठक में न बुलाने को कहा, लेकिन उनकी अनुपस्थिति में अस्थाना सीबीआई के वरिष्ठम अधिकारी थे, इसलिए उन्हें बैठक में बुलाया गया।
इस पूरे मामले ने इस साल अगस्त में उस समय आखिरी रंग दिखा, जब राकेश अस्थाना ने 24 अगस्त को कैबिनेट सचिवालय और सीवीसी को पत्र लिखकर कहा कि सीबीआई निदेशक उनकी जांच में दखल दे रहे हैं और आरोपियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी पत्र में आरोप लगाया गया कि उन्हें संवेदनशील सूचना मिली है कि आलोक वर्मा ने इस मामले में करोड़ों रुपये की रिश्वत ली है। पत्र में लालू यादव के मामले आईआरसीटीसी केस का भी जिक्र किया गया और कहा गया कि इस मामले में सीबीआई निदेशक ने छापा मारने के निर्देश देने में आनाकानी की और आहलूवालिया कंस्ट्रक्शन नाम की कंपनी पर छापा नहीं मारने को कहा, क्योंकि वह सीबीआई निदेशक के दोस्त थे। अस्थाना के पत्र के आधार पर सरकार ने मामले की जांच सीवीसी को सौप दी। सीवीसी के मुताबिक, उसने कई बार आलोक वर्मा से मामले की फाइलें मांगी, लेकिन उन्हें नहीं मिलीं।
दिलचस्प यह है कि पीएमओ को इस पत्र की जानकारी थी, लेकिन उसने इस विवाद को रोकने की कोशिश नहीं की। इसके जवाब में सीबीआई निदेशक ने एक के बाद एक केस अस्थाना से वापस लेने शुरू कर दिए और मोइन कुरेशी केस भी उनसे वापस ले लिया। इस मामले की जांच पहले डीएसपी देंवेद्र कुमार कर रहे थे। आलोक वर्मा ने उनकी जगह जांच डीएसपी एके बस्सी को सौंप दी, जिन पर अस्थाना ने गंभीर आरोप लगाए थे। डीएसपी बस्सी की टीम ने मामले में 15 अक्तूबर को राकेश अस्थाना और उनके डीएसपी समेत 4 लोगों के खिलाफ रिश्वतखोरी की एफआईआऱ दर्ज कर डीएसपी समेत दो को गिरफ्तार कर लिया। यही नहीं दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में सीबीआई ने कहा कि जांच के नाम पर उगाही का रैकेट चल रहा था और फर्जी दस्तावेज बनाए जा रहे थे। इसके बाद राकेश अस्थाना की गिरफ्तारी और उन पर छापेमारी की बात की गई। सूत्र बताते हैं कि जब मामला दिल्ली हाईकोर्ट में गया तो सरकार ने भी सीवीसी से रिपोर्ट तलब की। सीवीसी ने कहा कि सीबीआई निदेशक जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। सीवीसी की रिपोर्ट मिलते ही सरकार ने सीबीआई में आपातकालीन स्थिति मानते हुए दोनों अधिकारियों के अधिकार वापस ले लिए और सीबीआई के वरिष्ठ संयुक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को सीबीआई का अंतरिम निदेशक बना दिया। उन्होंने चार्ज लेते ही कई फाइलों को अपने कब्जे में ले लिया और एक दर्जन से ज्यादा अधिकारियों का ट्रांसफर कर दिया।
अब सवाल यह उठता है कि सीबीआई के दोनों अधिकारियों के बीच ‘जंग’ को जब प्रधानमंत्री कार्यालय को पता था तो पहले ही कदम क्यों नहीं उठाए गए। तो क्या सरकार को भी किसी की हरी झंडी का इंतजार था? अगर सरकार उसी समय दोनों अधिकारियों को बुलाकर मामले को संभालने का प्रयास करती तो शायद सीबीआई और सरकार की इतनी छीछालेदारी न होती। साथ ही, जिस संस्था पर पूरा देश विश्वास करता है उस पर सवाल न उठते।
विपक्ष भी इस मामले में जमकर सियासत कर रहा है। कांग्रेस देशभर में प्रदर्शन कर रही है। उसका कहना है कि सीबीआई निदेशक राफेल मामले की जांच शुरू करने वाले थे, इसलिए उन्हें हटा दिया गया। जो विपक्षी दल सीबीआई के दुरुपयोग को लेकर आज गरज रहे हैं वह सत्ता में आते ही इससे अपने विरोधियों पर जोरदार प्रहार करेंगे। कोई एफबीआई की तर्ज पर सीबीआई की पूर्ण स्वायत्तता की बात नहीं करता। यह भी तय है कि अगर इस मामले में समय रहते उपयुक्त कदम उठाए जाते तो देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी पर ऐसी आंच नहीं आती।
ऐसे बनी थी सीबीआई
लाहौर में साल 1941 में स्पेशल पुलिस स्टब्लिशमेंट की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य दूसरे विश्वयुद्द के दौरान सप्लाई सामग्री में हुए भ्रष्टाचार की जांच करना था। 1946 में संस्था को दिल्ली लाया गया। एक अप्रैल 1963 को इसका नाम बदलकर केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई कर दिया गया। केंद्र सरकार के सभी विभाग इसके अधीन कर दिए गए। शुरुआत में यह केवल भ्रष्टाचार निरोधक मामले ही देखती थी, लेकिन बाद में बड़ी हत्याओं और दंगों की जांच भी यही करने लगी। अब सीबीआई में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा के अलावा आर्थिक अपराध शाखा और और विशेष अपराध शाखा भी है।
ऐसी थी साख
सीबीआई की साख 90 के दशक में ऐसी थी कि सीबीआई के एक अधिकारी आगरा में छापा मारने गए। दिन-रात कागजों की तलाशी हुई और उसी दौरान एक अधिकारी ने उस घर में आमलेट बनवा कर खा लिया। सीबीआई के बड़े अधिकारियों को जब इसकी जानकारी हुई तो उस अधिकारी के खिलाफ ही जांच शुरू कर दी गई। एक अधिकारी ने जांच एजेंसी के आज के हालात पर कहा कि सीबीआई 1 अप्रैल 1963 को बनी थी और 15 अक्तूबर 2018 को उसका देहांत हो गया।
निदेशकों पर केस की परंपरा
सीबीआई निदेशकों के खिलाफ एफआईआर की परंपरा रही है। अमर प्रताप सिंह के सीबीआई निदेशक पद से जाने के बाद यह सिलसिला शुरू हुआ। इसके बाद, सीबीआई के दूसरे निदेशक रंजीत सिन्हा के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई उन पर कोयला घोटाले के आरोपियों को फायदा पहुंचाने के आरोप लगे। एक अन्य निदेशक अनिल सिन्हा भी वीआईपी हेलीकाप्टर मामले में विवादों में आये। वर्तमान निदेशक आलोक वर्मा पर भी रिश्वतखोरी के आरोप हैं। यदि सीवीसी जांच में आरंभिक तौर पर आरोपों को सही मान लेता है तो उन पर भी एफआईआर की तलवार लटक सकती है।


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