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जरा याद उन्हें भी कर लो…

Posted On November - 15 - 2018

ले. जनरल बलजीत सिंह (रि.)
अच्छे युद्ध जैसा कभी कुछ नहीं रहा। प्रथम विश्व युद्ध के लिपिबद्ध इतिहास के मुताबिक अकेले भारत से 78,187 सैनिक हताहत और 67,000 जख्मी हुए थे। तथापि इस वीभत्स नरसंहार की याद मानव के मानसपटल से महज 21 सालों में मिट गई और द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में एक और महाविनाश शुरू हो गया था, जिसकी परिणति हिरोशिमा और नागासाकी में हुए परमाणु हमले में बड़े पैमाने पर मची तबाही के साथ हुई थी।
अगस्त, 1914 में महायुद्ध की खबर भारत पंहुची थी तो देश की ज्यादातर सेना उत्तर पश्चिम मोर्चे पर तैनात थी। 15वीं लुधियाना सिख बटालियन के लेफ्टिनेंट रैंक के अफसर के शब्दों में : ‘ज्यादातर सैनिकों को लगा था कि पूरी लड़ाई के दौरान हम जहां हैं, वहीं बने रहेंगे…और यूरोप में चल रहे संग्राम में सक्रिय भाग लेने का कोई मौका नहीं है’। लेकिन महज 48 घंटों बाद उन्हें एकत्र होने और 15 दिन में कराची बंदरगाह पंहुचने के आदेश मिल गए थे। लगभग सभी लिहाजों से यह एक असंभव-सा काम लग रहा था, क्योंकि चौकियां 60 मील से ज्यादा इलाके में फैली हुई थीं, उस पर सबसे नजदीकी रेल स्टेशन तक पंहुचने के लिए तकरीबन 80 मील चलकर पहुंचना था…मुझ तक रुपयों से भरा थैला पंहुचाया गया, जिससे मैं नजर पड़ने वाले तमाम उपलब्ध गधों-खच्चरों और ऊंटों को ढुलाई के लिए किराए पर ले सकूं …बटालियन की वफादारी और युद्ध करने का वलवला इससे झलकता है कि जो बीमार थे, वे भी मुझे आश्वस्त कर रहे थे कि लड़ाई के लिए वे एकदम स्वस्थ हैं।’
लेफ्टिनेंट रैंक के समकक्ष जॉन स्मिथ, जो आगे चलकर ब्रिगेडियर बने थे, उन्होंने एक सिपाही हरनाम सिंह का वर्णन अपनी किताब ‘द ओनली ऐनेमी’ में काफी भावविभोर होकर किया है। इस पुस्तक का पहला संस्करण 1959 में प्रकाशित हुआ था। वे लिखते हैं, ‘हरनाम सिंह उस वक्त मलेरिया से ग्रस्त होकर बिस्तर पर था, लेकिन महज तीन दिन बाद बहुत ज्यादा थका देने वाले पैदल मार्च के दौरान जब मैंने अपने बंदों की तरफ नजर घुमाई तो लगा कि पसीने और थकावट से क्लांत पड़ चुका हरनाम सिंह जैसा भी उनमें एक है, जो बड़े जोशो-खरोश से बाकियों के साथ मार्च कर रहा है…जब बाद में हम पड़ाव के लिए तम्बू में पंहुचे तो मैनें अपने मातहत भारतीय अधिकारी से पूछा कि मुझे जो आभास हुआ था क्या वह वाकई हरनाम सिंह ही है। मरीज होते हुए उसके लिए इतना थकाऊ मार्च कैसे संभव है? इस पर मिले जवाब से स्मिथ को आश्चर्य हुआ कि इसके पीछे का राज है अफीम! उक्त अफसर ने बताया कि हालांकि हरनाम ने कभी अफीम का सेवन नहीं किया, लेकिन इसका असर उसपर काफी रहा और पैदल सफर शुरू होने से पहले हम उसे इसकी खुराक देते थे और पड़ाव पर पहुंचते ही उसे आराम के लिए बिस्तर पर लिटा देते थे और अगले दिन फिर यही दोहराते थे। इस तरह हरनाम सिंह कराची पंहुच पाया। यही नहीं इसके बाद फ्रांस की खंदकों में युद्ध के एक साल को भी झेल गया!
फ्रांस के मारसिले तटों पर सबसे पहले उतरने वाले भारतीय सैनिकों में 15वीं लुधियाना सिख बटालियन एक थी। यह भारत से बाहर उनका पहला अभियान था, अलग किस्म के वातावरण में मार्च करते वक्त वे काफी विस्मृत थे, क्योंकि वहां का भौगोलिक परिदृश्य उनकी सोच से परे था, लेकिन कुमुक और अन्य सहायता सामग्री की सप्लाई बहुत कम थी और सफाई पंसद सिखों के लिए जब भी पहला मौका बनता वे नल के नीचे नहाने लगते थे। फिर चाहे मौसम या पानी कितना भी ठंडा क्यों न हो। धूल भरे पैदल मार्च के बाद वे अपने सिर और दाढ़ी के बाल खोल देते और इन्हें अच्छी तरह धोते थे। इस मंजर से स्थानीय नागरिकों को काफी आश्चर्य होता था और वे जोर से चिल्लाकर कहते थे ‘अरे वह देखो औरतों जैसे लंबे बालों वाली भारतीयता’! विस्मयकारी और साफ नीयत वाले इस तरह के जुमलों से बटालियन के जवान भले ही कुछ शरमा जाते थे, लेकिन वे सजीव रणभूमि पहुंचकर खुश थे।

गोपाल सरन सिंह

बटालियन के प्रत्येक सिपाही के लिए सूती यूनीफॉर्म और कंबल का इंतजाम किया गया था। तथापि सभी को जल्द ही एक-एक ऊनी बनियान और एक लंबा गर्म कच्छा दिया गया। पहले-पहल इस किस्म के अंतः वस्त्र दिए जाने का वे मतलब नहीं समझ पाए थे, जिस दिन पहली बार ये उन्हें मिले उस वक्त मैं संयोगवश ऐन समय पर अपने तंबू से बाहर था और अपने सूबेदार मेजर को मोटे गुलाबी बनियान-कच्छे में खुलेआम न घूमने की हिदायत दी थी !
24 अक्तूबर 1914 को बटालियन को एक सुरक्षा घेरे में रिक्त स्थान को भरने का आदेश मिला था। हमारे दाईं तरफ स्कॉटिश बटालियन थी और बाईं तरफ फ्रेंच। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय सैनिकों को पहले-पहल त्वचा के एक जैसे रंग की वजह से मित्र सेना फ्रेंच और दुश्मन जर्मनों में भेद करना मुश्किल था। उनकी इस दुविधा को मैं अच्छी तरह समझ सकता था और इसके लिए मैंने एक फ्रांसिसी और बंदी जर्मनी सैनिक को उधार मांगा और इन दोनों को प्रत्येक भारतीय सैनिक कंपनी के सामने से बहुत धीमी गति में चलवाया था, जिससे वे फर्क कर सकें। हालांकि, यह कहते हुए खेद है कि इस महायुद्ध में पहले-पहल जिन सैनिकों को मेरे बंदों ने मार गिराया था वे मुगालते में निशाना बने फ्रेंच थे।
संक्षेप में कहूं तो 18 मई 1915 को बटालियन पूरी तरह युद्ध के लहू में भीग चुकी थी। जब ले. स्मिथ ने 10 सैनिकों के साथ एक दुस्साहसी आत्मघाती मिशन को अंजाम दिया था, इस बहादुरी के लिए टुकड़ी को एक विक्टोरिया चक्र और 10 आईडीएसएम मेडल (मरणोपरांत) मिले थे (इनमें अफीम प्रकरण वाला सिपाही हरनाम सिंह भी था)। इसके दो दिन ज़ार (सम्राट) ने ले. स्मिथ को ‘वर्ष का सबसे ज्यादा बहादुरी वाला कारनामा’ अंजाम देने के लिए अतिविशिष्ट ‘जॉर्ज क्रॉस’ से नवाजा था। कुछ दिन बाद हमें एक संदेश मिला कि भारत के टिक्करी देश के राजा कुछ दिन हमारी खंदकों में गुजारने के लिए आ रहे हैं। वे चकाचक यूनिफॉर्म और अच्छी तरह चमकाए गए जूते पहने थे और किट उठाए अर्दली साथ था। उन्हें खाने के लिए डोनट दिया गया और वे जल्द ही सोने चले गए। अगली दिन सुबह-सवेरे नीले रंग का स्लिक पजामा पहने वे आए और पूछने लगे कि क्या कोई ऐसी जगह है, जहां से सुरक्षित रहते हुए वे छिपकर गोलियां चला सकते हैं। मैंने उन्हें खंदक का आखिरी बंद छोर सुझा दिया जो बाहर से किसी तरह के निशाने की लीक में नहीं था, लेकिन साथ यह ताकीद भी कर दी थी कि जर्मनों की खंदकें हमारी वाली से महज 40 गज दूर हैं और फिर मैं राजा साहिब को भूलकर अपनी गोलीबारी में मगन हो गया था।

जॉन स्मिथ वीसी

इसके कुछ समय बाद मैंने जर्मनों की खंदकों से गुस्सैल हुंकारों के बाद कराहने की धीमी आवाजें सुनीं, जब उचककर देखा तो उनके छह स्टीप लूप-होल धवस्त हुए पड़े थे। यह कुछ ज्यादा ही अचरज भरा दृश्य था, क्योंकि ज्यादातर ऐसा .303 की गोली से हुआ करता है। अचानक मुझे महाराजा का ख्याल आया और यह देखने गया कि
वे उस वक्त क्या कर रहे हैं। वे अपने उसी छबीले पजामे में हाथी का शिकार करने वाली 500 कैलीबर की राइफलें पकड़े हुए थे (इस हथियार का इस्तेमाल लड़ाई के तमाम स्थापित नियमों के विरुद्ध माना जाता था) और खुशी से मचलते हुए रेंज में पड़ते दुश्मनों के सभी लूपहोल को एक-एक कर निशाना बना रहे थे। उन्हें रोकना मुझे पसंद तो न था, लेकिन हम सबको आनन-फानन में खंदकें छोड़ खुले मैदान में भागना पड़ गया था, क्योंकि राजा साहिब की हरकत से बुरी तरह गुस्साए जर्मनों ने प्रतिकर्म में मोर्टार गोलों की झड़ी लगा दी थी!
बटालियन की तैनाती मिस्र में होने से पहले ले. स्मिथ को पांच दिन की छुट्टी मिली थी। जैसे ही वह विक्टोरिया स्टेशन से वापसी की रेलगाड़ी पकड़ने को थे तो उनके सामने 15वीं बटालियन में कार्यरत दो सिख सैनिकों की नववधुएं आईं और कहने लगीं कि क्या वे भी उसके साथ आ सकती हैं। कहना न होगा कि जवानी के अतिआत्मविश्वास भरे दुस्साहस ने स्मिथ से ‘हां’ कहलवा दी थी। सफर में उन महिलाओं लिए रेलवे वालों से झिकझिक की और फ्रांस में मिल्टरी पुलिस को गच्चा भी दिया। मारसिले पंहुचने तक उसने इस रोमांच का भरपूर आनंद लिया। जहां उसे कमांडिग ऑफिसर (सीओ) को अपनी आमद दर्ज करवानी थी। सीओ ने कहा, ‘कहो बच्चे छुटियां बढ़िया रहीं’? स्मिथ ने कहा, ‘सर…लेकिन एक स्वीकारोक्ति करना चाहता हूं। मुझे आपकी शान में एक बड़ी बात बताना है’। वह जानता था कि सीओ को चापलूसी पसंद है। उसने हलक साफ करते हुए कहा, ‘मैं समझता हूं सर। इन दो महिलाओं को लगता है आप उनके लिए जरूर कुछ न कुछ कर पाएंगे और फिर उसने सीओ की आंखों में चमक आती तो देखी, किंतु उन्होंने पूछा, ‘लेकिन सबसे पहले तो यह बताओ कि इस महायुद्ध के घनघोर रण में तुम जैसा लेफ्टिनेंट रैंक वाला, वह भी 15वीं सिख बटालियन का, इन दोनों को पूरा फ्रांस पार करवाकर यहां तक लेकर कैसे आया?’
उक्त किताब मैंने 1960 में पढ़ी थी, लेकिन यह नहीं बूझ पाया कि आखिर स्लिक पजामे वाला वह महाराजा था कौन? 1990 के दशक में हमारे घर कपूरथला के राजघराने के एक सज्जन अकसर आया करते थे, उन्होंने खोज निकाला कि इस प्रकरण का वह अनाम नायक टिक्करी का राजा गोपाल सरन सिंह होना चाहिए। लेकिन अब मसला यह कि टिक्करी कहां है? लेकिन संयोग से 2003 में फिर से जब मैंने ऑक्सफोर्ड स्कूल की नक्शे वाली एटलस खरीदी तो आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि यह टिक्करी तो बोध गया से ज्यादा दूर नहीं है! लेकिन वहां के महाराजा ने यूरोप के पश्चिमी मोर्चे पर 15वीं लुधियाना सिख बटालियन को ही क्यों चुना? इस रहस्य के बारे में उनके पोते रॉबिन टिक्करी को भी कुछ पता नहीं है।
रॉबिन के मुताबिक, टिक्करी की जागीर उनके परिवार को बंगाल के तत्कालीन मुगल गवर्नर अलीवरदी खान ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लड़ाई में शाही सल्तनत की सेवाओं की एवज में अता की थी और स्लिक पजामे में जो शख्स थे, वे उस वक्त फील्ड मार्शल डगलस हैग के मानद एडीसी थे। युद्ध के दौरान ब्रिटिश हुकूमत की माली इमदाद करने के लिए शांति स्थापना होने पर उनको सितंबर 1919 में सेंट जेम्स पैलेस में आयोजित एक समारोह में भारतीय सेना में मानद कप्तान की उपाधि प्रदान की गई थी। उनके परिवार के पास सम्राट के हस्ताक्षरों वाला प्रशस्तिपत्र आज भी मौजूद है।
बहरहाल एक सौ साल बाद, आज जब हम उन सैनिकों को याद कर रहे हैं, जो प्रथम विश्व युद्ध में लड़े थे, तो हम भयावह विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उनके उस जज्बे और बहादुरी को सलाम करते हैं जो ‘सम्मान, कर्तव्यपरायणता की शपथ और अपने साथियों के लिए वफादारी’ के प्रति एकमेव प्रतिबद्धता से चलायमान थे।


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